Ancient Indian Hydroscience 19 January 2021

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#भारतीय_जलविज्ञान

जलविज्ञान (Hydrology)
विज्ञान की वह शाखा है जो जल के उत्पादन, आदान-प्रदान, स्रोत, सरिता, विलीनता, वाष्पता, हिमपात, उतार-चढ़ाव, प्रपात, बाँध, संभरण तथा मापन आदि से सम्बन्धित है।

जल विज्ञान सहस्त्राब्दि से इंजीनियरी और खोज का विषय रहा है। उदाहरण के लिए करीब 4000 ईसा पूर्व बंजर भूमि की कृषि उत्पादकता में सुधार के लिए नील पर बांध बनाया गया था।

ऊंची दीवारों के साथ बाढ़ से मेसोपोटेनियम कस्बों की सुरक्षा की गई।
यूनानी और प्राचीन रोमन्‌स द्वारा जलसेतुओं का निर्माण किया गया,
जबकि चीन का इतिहास दर्शाता है कि उन्होंने सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण से जुड़े निर्माण कार्य किए हैं।

प्राचीन सिंहलियों ने श्रीलंका में जटिल सिंचाई निर्माण कार्यों में जल विज्ञान का इस्तेमाल किया।
इन्हें वाल्व पिट के अन्वेषण के लिए भी जाना जाता है जिससे बड़े जलाशयों और नहरों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ जो आज भी काम कर रहे हैं।

ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में मार्क्स वितरुवियस ने जल-वैज्ञानिक चक्र के दार्शनिक सिद्वांत की व्याख्या की जिसके अनुसार पहाड़ियों में होने वाले वृष्टिपात से पृथ्वी के तल में पानी का रिसाव हुआ और इससे निचलीभूमि में नदियाँ और झरने आदि बन गए।

अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ लिओनार्डो द विन्सी और बर्नाड पॉलिस्सी स्वतंत्र रूप से जल-वैज्ञानिक चक्र के सही निरूपण तक पहुंचे।

17वीं शताब्दी तक ऐसा कुछ नहीं था कि जल-वैज्ञानिक परिवर्तनों का परिमाणन शुरू हो गया हो।

जब भी हम पश्चिमी देशों की तरफ देखते हैं तो उनकी टाइम लाइन ईसा मसीह की टाइम लाइन के आसपास ही रहती है ,
लम्बे समय तक विदेशी शासकों के प्रभुत्व ने संस्कृत और अन्य साहित्यों की वैज्ञानिक लेखन को आगे नहीं बढ़ने दिया।

आजादी के बाद भी, इस स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ और इसका स्पष्ट कारण यह है कि
आधुनिक वैज्ञानिकों तथा संस्कृत विद्वानों के बीच पारस्परिक अन्तःक्रिया एवं संवाद की कमी है।

वैज्ञानिकों ने प्राचीन संस्कृत साहित्य में उपलब्ध वैज्ञानिक सामग्री के बारे में कभी भी ध्यान नहीं दिया✔️

और संस्कृत विद्वानों ने संस्कृत कार्यों में उपलब्ध वैज्ञानिक प्रकृति की समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करने की परवाह नहीं की।

वे स्वयं “व्याकरण” मिमांशा इत्यादि जैसी समस्याओं में उलझ कर रह गए।

इसलिए आज तक प्राचीन कार्यों की वैज्ञानिक सामग्री लगभग पूरी तरह से अज्ञात और अविश्लेषित बनी हुई है।

चाउ (1964) ने जलविज्ञान के इतिहास के वर्णन में ग्रीस में होमर, थेल्स, प्लेटो, अरस्तु, रोम में प्लिनी और उस समय के कई बाइबल विद्वानों के कार्यों का उल्लेख किया है

लेकिन किसी ने भी भारतीय विद्वान, साहित्य, और उनके महान योगदान का जिक्र नहीं किया गया है |

इनमें से
अधिकांश पश्चिमी विद्वानों ने जल की उत्पत्ति के बारे में बेबुनियाद सिद्धांतों पर विश्वास किया।

उदाहरण के लिए थेल्स, एक आयनियन दार्शनिक, गणितज्ञ और खगोलशास्त्री ने कहा कि समुद्र का पानी हवा से चट्टानों में चला जाता है यही भूजल का कारक है।

प्लेटो (427-347 ईसा पूर्व), एक महान एथेनियन दार्शनिक ने कहा है कि समुद्रों, नदियों, झरनों आदि का पानी एक बड़े भूमिगत जलाशय से आता है और वही वापस चला जाता है।

अरस्तु (384-322 ईसा पूर्व) ने कहा कि झरनों आदि का पानी भूमिगत जल से भूमिगत ओपनिंग के माध्यम से प्राप्त होता है ।

प्रसिद्ध दार्शनिक लुसियस एनाकस सेनक्का (4 ईसा पूर्व) ने घोषणा की कि वर्षा, स्प्रिंग और भूमिगत जल का स्रोत नहीं हो सकती क्योंकि यह पृथ्वी में केवल कुछ ही फुट तक प्रवेश करता है ।
(प्रसाद, 1980)।

दूसरी ओर
समकालीन भारतीय विद्वानों ने जलविज्ञान के विभिन्‍न पहलुओं के उन्‍नत स्तर के ज्ञान का विकास किया था जैसा कि प्राचीन भारतीय साहित्य में परिलक्षित होता है जिसमें जलविज्ञान और उनके व्यावहारिक अनुप्रयोगों पर बहुत मूल्यवान और महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारियां दी गई हैं ।

इस बात के प्रमाण के लिए पर्याप्त पुरातात्विक तथ्य हैं कि सिंधु घाटी के हड़प्पाकालीन लोग (2500 और 700 ईसा पूर्व) मौसमी वर्षा और सिंधु नदी की बाढ़ से संबंधित घटनाओं के बारे में अच्छी जानकारी रखते थे जो आधुनिक मौसम संबंधी जांच (श्रीनिवासन, 1975) द्वार अनुमोदित है। वैदिक ग्रन्थ में जलविज्ञानीय चक्र” के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ शामिल है।

जलविज्ञान की महत्वपूर्ण अवधारणाएं विभिन्‍न श्लोकों और वेदों में विभिन्‍न देवताओं की अराधनाओं और प्रार्थनाओं में दी गई हैं।

इसी तरह अन्य संस्कृत साहित्य में भी जलविज्ञान से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां समाहित हैं ।

भारत के क्षेत्रों में तथा दुनिया में कहीं भी कृषि की उत्पत्ति और विकास और सिंचाई में अनुभव अलग-अलग प्रक्रियाएं नहीं हैं, जैसा कि यजुर्वेद के निम्नलिखित श्लोक से स्पष्ट है:-

कृषिश्चमें यज्ञेनकलपंताम।
वृष्टश्चमें यज्ञेनकलपंताम ।। यजुर्वेद, 18-9 ।।

मारूतश्चमें यज्ञेनकलपंताम ।। यजुर्वेद, 18-17 ।।

ये श्लोक वर्षा, कृषि और वायु या पर्यावरण और उनके अंतर्संबंध के लिए यज्ञ के महत्व को दर्शाते हैं ।

जलविज्ञानीय चक्र की विभिन्‍न प्रक्रियाओं जैसे कि वाष्पीकरण, संक्षेपण, वर्षा, धारा प्रवाह आदि के दौरान जल का क्षय नहीं होता है बल्कि एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित हो जाता है ।

इसका वैदिक एवं बाद के समय काल के लोगों को पूर्णतः ज्ञान था।
पौधों द्वारा पानी का अंत:ग्रहण, विभिन्‍न प्रकार के बादलों, उनकी ऊंचाई वर्षा क्षमता, सूर्य की किरणों और हवा द्वारा सूक्ष्म कणों में पानी का विभाजन तथा पिछले वर्षा के प्राकृतिक परिदृश्यों के पूर्वानुमान के प्रेक्षणों के आधार पर वर्षा की मात्रा के पूर्वानुमान पुराणों, वृहतसंहिता , मेघमाला आदि में भी उपलब्ध है।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा पाणिनी की अष्टाध्यायी में वर्षा मान/वर्षा यंत्रों का संदर्भ उपलब्ध है।
भारत के विभिन्‍न भागों में वर्षा की मात्रा की भविष्यवाणी भी कौटिल्य ने की थी।

भारतीय लोग वर्षा पर चक्रवाती प्रभाव, भौगोलिक प्रभाव, विकिरण तथा पृथ्वी के संवहन हीटिंग के प्रभाव से भली-भाँति परिचित थे।

उस काल में विभिन्‍न अन्य पहलुओं जैसे कि अंतःस्यंदन, अवरोधन, धारा प्रवाह, भूआकृतिकी विज्ञान तथा वर्षा की अपरदन क्रिया की भी जानकारी उपलब्ध थी ।

महाकाव्य रामायण और महाभारत में आर्टिफिसीयल कुओं के संदर्भ भी उपलब्ध हैं।प्राचीन भारत में भूमि जल विकास और जल की गुणवत्ता पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जाता था जैसा कि वृहतसंहिता (550 ए.डी.) से स्पष्ट है।

विशेष –

भारत में शुष्कतम मौसम और पानी की कमी ने जल प्रबंधन के क्षेत्रों में कई अन्वेषी कार्यों को मूर्तरूप दिया है।

सिंधु घाटी सभ्यता के समय से इस पूरे क्षेत्र में सिंचाई प्रणाली, भिन्न-भिन्न प्रकार के कूपों, जल भण्डारण प्रणाली तथा न्‍यून लागत और अनवरत जल संग्रहण तकनीकें विकसित की गई थी।

3000 ईसा पूर्व में गिरनार में बने जलाशय तथा पश्चिमी भारत में प्राचीन स्टेप-वैल्स कौशल के कुछ उदाहरण हैं।

प्राचीन भारत में जल पर आधारित तकनीकें भी प्रचलन में थीं। कौटिल्य के सदियों पुराने लिखे अर्थशास्त्र (400 ईसा पूर्व) में हस्तचालित कूलिंग उपकरण “वारियंत्र” (हवा को ठंडा करने के लिए घूमता हुआ जल स्प्रे) का संदर्भ दिया गया है।

पाणिनी (700 ईसा पूर्व) के “अर्थशास्त्र” और “अष्टाध्यायी” में वर्षामापी (नायर, 2004) यंत्रों का विधिवत संदर्भ उपलब्ध है।।

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