Ancient Science of The Vedas

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आज से हजारों वर्ष पूर्व विश्व में एक ही धर्म था वो था वैदिक धर्म। आसान भाषा में बोले तो पुरे विश्व में आज के भारत का राज था।
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ये ही समय था जब वेदों को संस्कृत में लिखा गया उस से पहले ये कंठ में होती थी। केवल श्रुति से ही एक दुसरे को दी जाती थी, वेदों में ही Quantum_Physics_रसायनविज्ञानअर्थशास्त्रऔरमेडिकल सब कुछ है । एटॉमिक थ्योरी वेदांत से ली गयी है । आज कल की फाइबर ऑप्टिकल जो इन्टरनेट में इस्तेमाल होती है वो भी वेदों से ली हुयी है।

इस ज्ञान को समझने वाले अंतिम व्यक्ति थे आदि शंकराचार्य जी, उस के बाद एक व्यक्ति और हुआ अमेरिका में निकोल टेस्ला, इस के अलावा कोई इस वेदांत को समझ नहीं पाया। जितने भी आये मेरे जैसे आधे अधूरे आय।

आदि शंकराचार्य जी ने उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर काफी टीकाएँ लिखी । ये ही टीकाएँ विश्व में लोगो ने पड़ी और बड़े बड़े आविष्कार किये। भारत को उलझा दिया द्वैत_अद्वैत में। द्वैत मतलब सब को अलग अलग देखना, अद्वैत मतलब सब को एक देखना।

किस को देखना ?

पदार्थ को ! किसी भी पदार्थ को, फिर इस में भक्ति का तड़का और लगा दो तो गुरु, ईश्वर और भक्त कभी द्वैत हैं कभी अद्वैत। बस इतने भी ही उलझे रहे भारतवासी, ये उलझाने का काम किया विवेकानंद राजाराम मोहन टैगोर के बाप दादा ने जैसे हजारो भारत के हीरो लोगो ने । समझ तो इन को भी नहीं आया मगर आर्डर मिला हुआ था इन को :- करते रहो कुछ भी बकवास लोगो को उल्लू बनाते रहो।

इस द्वैत अद्वैत को समझने वाले मेरी नजर में अंतिम (शायद और भी हो) व्यक्ति निकोल_टेस्ला थे। जिन को उतना सम्मान नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था। आज की मोर्डेन साइंस जितनी भी है ये सब निकोल टेस्ला की देन है। विद्युत हो या विद्युत तरंग या इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन या हार्प या उपग्रह ये सब निकोल टेस्ला की देन है।

1893 में विवेकानंद का शिकागो भाषण, वेदांत पर, जिस में प्राण आकाश और उर्जा शब्दों के प्रयोग हुआ, जिस से निकोल टेस्ला बहुत प्रभावित हुए। प्राण आकाश और उर्जा सर्वत्र व्यप्त है। ब्राहमण में भी दलित में भी।

निकोला टेस्ला ने इस आकाश, प्राण और उर्जा के वैज्ञानिक प्रारूप को समझना शुरू किया मगर समझ नहीं पाए। विज्ञान के गूढ़ रहस्य जो आदि शंकराचार्य जी दे गए थे उन को समझना इतना आसान भी नहीं था। इन रहस्यों को ही माया कहा गया इस ही माया से पदार्थ उत्पन होता है, इस को जानने वाला ब्राह्मण कहलाता है।

निकोला टेस्ला ने 1893 में विवेकानंद की स्पीच सुनी और अधिक जानने की इच्छा हुयी 10 साल तक वेदों का गहन अध्यन किया संस्कृत सीखी एक योगी जैसा जीवन बिताया अपने साथ एक ताम्बे का लोटा भी रखने लगे और 108 का जाप भी शुरू कर दिया ।

तब जा कर वो पूर्ण ब्रहामण बने और माया को समझा, माया मतलब द्रव्य(Matter), उर्जा (Energy), अल्बर्ट आइंस्टीन से पहले ही द्रव्य और उर्जा में संबंध की परिकल्पना टेस्ला कर चुके थे | लेकिन बाद में आइंस्टीन को सूत्र लिखने के लिए (E=mc2) इस बात का पूरा श्रेय मिला, एडिसन के सारे काम निकोला टेस्ला के ही किये हुए हैं । निकोला टेस्ला का नाम गायब करना ही था क्यूँ की उस ने वेदों के अध्यन से ये सब किया था उस की जगह ये फर्जी आइंस्टीन, एडिसन जैसे चोरो को ले आये।

108 का जाप :- 108 का योग होता है 9, और 9 गृह भी होते हैं 12 राशि 9 गृह गुणनफल 108. 108 पीरियाडिक टेबल, 108 उपनिषद भी खैर 108 से बहुत कुछ होता है, 9 को अगर मैं यहाँ ब्रह्मा जी समझूँ तो

छोड़ो आगे बड़ते हैं निकोला टेस्ला का एक सूत्र था 3, 6 और 9, ये सूत्र है ये ब्रह्मांडीय संख्याएं होती हैं जिन को टेस्ला ने समझा।

3, 6 और 9 ये ही वो सूत्र है जो एक परमाणु से ले कर ब्रह्माण्ड तक की रचना में इतेमाल होते है। जिस को गोल्डन रेश्यो कहा जाता है।

1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 इस में से 3 6 9 को अलग करते हैं तो 1, 2, 4, 5, 7, 8 बचते हैं ।
1+2=3,
2+4=6,
4+5=9,
5+7=12, 1+2=3,
7+8=15, 1+5=6

इन संख्या को योग करने पर 9 नहीं आता केवल 3 और 6 आता है। मतलब ब्रह्मा जी नहीं केवल शिव और विष्णु जी।

ऐसे ही जब 3 6 और 9 का योग करते है तो 3, 6 और 9 आता है ।

(3+3=9), (6+6=12, 1+2=3) (9+9=18, 1+8=9) (3+6=9) (6+9=15, 5+1=6) (3+9=12, 1+2=3)

3,6,9 के टेबल में कितनी ही बड़ी संख्या ले लो उस का अंतिम योग 3,6,9 ही आयेगा।

इस योग का जिक्र पुराणों में है जब पुछा जाता है की शिव के पिता कोन विष्णु जी के पिता कोन या ब्रह्मा के पिता कोन ये वो ही सूत्र है 3,6,9.

ये सूत्र श्री यंत्र में हैं इस ही सूत्र से सूरज चाँद की दुरी, गति, व्यास निकली गयी थी, मिस्र के पिरमिड भी इस ही सूत्र पर बने हैं 5 हज़ार वर्ष पूर्व।

Tesla’s said: “If you want to find the secrets of the universe, think in terms of energy, frequency and vibration.

ये था वेदों का शुद्ध ज्ञान। कभी समय मिले तो विवेकानंद की शिकागो की स्पीच सुनना किस संदर्भ में कहा है समझ आएगा ब्राह्मण दलित शरणर्थी नर सेवा से आगे कुछ नहीं मिलेगा।

ॐ साउंड जो ब्रहमांड में हर समय रहती है उस की frequency 7.83 hz है 7+8+3= 18, 1+8= 9,

साउंड की एक #frequency_432hz होती थी जो की एक प्राकृतिक ध्वनी होती है इस frequency को सुने के बाद शरीर में vibration होती है उस से प्राप्त energy (उर्जा) से शरीर दिमाग मन स्वस्थ रहता है। बीमारियाँ दूर रहती हैं

4+3+2 = 9.

1940 के आस पास इस को बड़ा दिया गया 440hz कर दिया गया । जो की मानव शरीर दिमाग और मन के लिए बिलकुल भी सही नहीं है इस को सुनने से गुस्सा बेचनी तनाव होता है। अब ISO ने 440 hz को स्टैण्डर्ड मान लिया है। ये एक अप्राकृतिक frequency होती है। इस का रिजल्ट :- रोड रेज, लड़ाई झगडा, मार पिटाई BP शुगर जैसे मुफ्त की बीमारियाँ घेर लेती हैं।

432hz को डिवाइड किया जाये 3, 6, 9 से और योग किया जाये तो आंसर भी 3, 6, 9 ही आता है 432/9=48 4+8=12 1+2=3, 432/6=72 7+2=9, 432/3=144 1+4+4=9,

अब 440 hz को करेंगे तो क्या मिलता है ?

3,6,9 was the key to the universe … Nikola tesla और ये सब ज्ञान मिला वेदों से उपनिषदों और वेदांतसूत्रों से द्वैत और अद्वैत से।

    

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