Ayurvedic tips 2 August 2020

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🌹कमरकश / गोंद 🌹

👉पलाश के वृक्ष का गोंद पड़ता है, उसको कमरकश भी बोलते है, गोंद भी बोलते है | उससे कमरकश औषोधि अथवा टॉनिक बनती है |

👉१ ग्राम कमरकश को दूध में डाल के दूध उबाल के दे देते हो तो नपुंसक भी मर्द होने लगेगा | नपुंसक भी पुरुषत्व हो जाता तो पुरुष तो पुरुष है वो वीर्यवान हो जाये तो क्या बात है |

👉जिनको संतान नहीं होती, स्त्री की खराबी, पुरुष की खराबी उनको १ – १ ग्राम दूध में दे दो अपने आप बच्चा होता है | स्त्री की खराबी, पुरुष की खराबी ये सभी भाग जायेगी | १ – ३ ग्राम तक उस गोंद का उपयोग कर सकते है |

👉आँवले के रस के साथ लेने से बल, वीर्य की वृद्धि होती है तथा अस्थियाँ / हड्डियाँ मजबूत होती है |
ये गोंद गर्भवती के लिए भी वरदान है | थोडा-सा गोंद २ – ३ ग्राम पानी में घोल के फिर दूध में डाल के दो किसी को जुलाब हो गया, संग्रहणी हो गई उसमे भी आराम मिलता है |🌱🍑🍐🍑🍑🍑🌿🌿🌿🙏🌿

“तुलसी के 15 फायदे (तुलसी)
(1) उपचार करने की शक्ति:
तुलसी (तुलसी) के पौधे में कई औषधीय गुण होते हैं। पत्ते एक तंत्रिका टॉनिक हैं और स्मृति को भी तेज करते हैं। वे ब्रोन्कियल ट्यूब से कैटरल पदार्थ और कफ को हटाने को बढ़ावा देते हैं। पत्तियां पेट को मजबूत करती हैं और प्रचुर मात्रा में पसीना उत्पन्न करती हैं। पौधे का बीज श्लैष्मिक होता है।

(2) बुखार और सामान्य जुकाम:
तुलसी की पत्तियां कई बुखार के लिए विशिष्ट हैं। बरसात के मौसम में, जब मलेरिया और डेंगू बुखार व्यापक रूप से प्रचलित होता है, चाय के साथ उबला हुआ, पत्तियों को छोड़ दिया जाता है, जो कि रोग से बचाव का काम करता है। तीव्र बुखार के मामले में, पत्तियों के काढ़े को आधा लीटर पानी में पिसी हुई इलायची के साथ उबाला जाता है और चीनी और दूध के साथ मिलाकर तापमान में कमी लाई जाती है। तुलसी के पत्तों के रस का उपयोग बुखार को कम करने के लिए किया जा सकता है। ताजे पानी में तुलसी के पत्तों का अर्क हर 2 से 3 घंटे दिया जाना चाहिए। बीच-बीच में ठंडे पानी के घूंट देते रह सकते हैं। बच्चों में, यह तापमान को नीचे लाने में हर प्रभावी है।

(3) खांसी:
तुलसी कई आयुर्वेदिक खांसी की दवाईयों और एक्सफोलिएंट्स का एक महत्वपूर्ण घटक है। यह ब्रोंकाइटिस और अस्थमा में बलगम को जुटाने में मदद करता है। तुलसी के पत्ते चबाने से सर्दी और फ्लू से राहत मिलती है।

(4) गले में खराश:
गले में खराश की स्थिति में तुलसी के पत्तों के साथ उबला हुआ पानी पीया जा सकता है। इस पानी का उपयोग गार्गल के रूप में भी किया जा सकता है।

(5) श्वसन विकार:
श्वसन प्रणाली विकार के उपचार में जड़ी बूटी उपयोगी है। शहद और अदरक के साथ पत्तियों का काढ़ा ब्रोंकाइटिस, अस्थमा, इन्फ्लूएंजा, खांसी और सर्दी के लिए एक प्रभावी उपाय है। पत्तियों, लौंग और आम नमक का काढ़ा भी इन्फ्लूएंजा के मामले में तत्काल राहत देता है। उन्हें आधा लीटर पानी में उबाला जाना चाहिए जब तक कि केवल आधा पानी शेष न हो जाए और फिर जोड़ा जाए।

(6) गुर्दे की पथरी:
तुलसी का किडनी पर प्रभाव मजबूत होता है। गुर्दे की पथरी के मामले में तुलसी के पत्तों का रस और शहद, यदि 6 महीने तक नियमित रूप से लिया जाए तो यह मूत्र मार्ग से बाहर निकल जाएगा।

(7) हृदय विकार:
हृदय रोग और उनसे उत्पन्न कमजोरी में तुलसी का लाभकारी प्रभाव पड़ता है। यह रक्त कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करता है।

(8) बच्चों की बीमारी:
सामान्य बाल चिकित्सा समस्याएं जैसे खांसी जुकाम, बुखार, दस्त और उल्टी तुलसी के पत्तों के रस के अनुकूल हैं। यदि चिकन पॉक्स के कारण उनकी उपस्थिति में देरी होती है, तो केसर के साथ ली गई तुलसी की पत्तियां उन्हें जल्दबाजी में डाल देंगी।
(9) तनाव:
तुलसी के पत्तों को ‘एडाप्टोजेन’ या एंटी-स्ट्रेस एजेंट माना जाता है। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि पत्तियां तनाव के खिलाफ महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करती हैं। यहां तक ​​कि स्वस्थ व्यक्ति तनाव को रोकने के लिए, तुलसी की 12 पत्तियों को दिन में दो बार चबा सकते हैं। यह रक्त को शुद्ध करता है और कई सामान्य तत्वों को रोकने में मदद करता है।

(10) मुंह में संक्रमण:
मुंह में छाले और संक्रमण के लिए पत्तियां प्रभावी होती हैं। चबाये गए कुछ पत्ते इन स्थितियों को ठीक कर देंगे।

(11) दंश:
जड़ी बूटी कीट के डंक या काटने के लिए एक रोगनिरोधी या निवारक और उपचारात्मक है। पत्तियों के रस का एक चम्मच लिया जाता है और कुछ घंटों के बाद दोहराया जाता है। प्रभावित भागों पर ताजा रस भी लगाना चाहिए। कीड़े और लीची के काटने के मामले में ताजा जड़ों का एक पेस्ट भी प्रभावी है।

(12) त्वचा संबंधी विकार:
स्थानीय रूप से लागू, तुलसी का रस दाद और अन्य त्वचा रोगों के उपचार में फायदेमंद है। ल्यूकोडर्मा के उपचार में कुछ प्राकृतिक चिकित्सकों द्वारा भी इसे सफलतापूर्वक आजमाया गया है।

(13) दांत विकार:
दांतों के विकारों में हरड़ उपयोगी है। इसके पत्तों को धूप में सुखाकर पाउडर बनाया जाता है, इसका इस्तेमाल दांतों को ब्रश करने के लिए किया जा सकता है। इसे पेस्ट बनाने के लिए सरसों के तेल में मिलाकर टूथपेस्ट के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह दंत स्वास्थ्य को बनाए रखने, खराब सांस का मुकाबला करने और मसूड़ों की मालिश करने के लिए बहुत अच्छा है। यह पायरिया और दांतों के अन्य विकारों में भी उपयोगी है।

(14) सिर दर्द:
तुलसी सिर दर्द के लिए एक अच्छी दवा है। इस विकार के लिए पत्तियों का काढ़ा दिया जा सकता है। चंदन के पेस्ट के साथ मिश्रित पत्तों को भी माथे पर लगाया जा सकता है ताकि गर्मी, सिरदर्द से राहत मिल सके और सामान्य रूप से ठंडक प्रदान की जा सके।

(15) नेत्र विकार:
तुलसी का रस गले की खराश और रतौंधी के लिए एक प्रभावी उपाय है, जो आमतौर पर विटामिन ए की कमी के कारण होता है। रोजाना रात में सोते समय काले तुलसी के रस की दो बूंदें आंखों में डाली जाती हैं।
[🌹वर्षा ऋतु में लाभदायी अजवायन🌹

🌹अजवायन उष्ण, तीक्ष्ण, जठराग्निवर्धक, उत्तम वायु व कफनाशक, आमपाचक व पित्तवर्धक है। वर्षा ऋतु में होने वाले पेट के विकार, जोड़ों के दर्द, कृमिरोग तथा कफजन्य विकारों में अजवायन खूब लाभदायी है।

🌹अजवायन में थोड़ा-सा काला नमक मिलाकर गुनगुने पानी के साथ लेने से मंदाग्नि, अजीर्ण, अफरा, पेट का दर्द एवं अम्लपित्त (एसिडिटी) में राहत मिलती है।

🌹भोजन के पहले कौर के साथ अजवायन खाने से जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है। संधिवात और गठिया में अजवायन के तेल की मालिश खूब लाभदायी है।

🔹तेल बनाने की विधिः 250 ग्राम तिल के तेल को गर्म करके नीचे उतार लें। उसमें 15 से 20 ग्राम अजवायन डालकर कुछ देर तक ढक के रखें फिर छान लें, अजवायन का तेल तैयार ! इससे दिन में दो बार मालिश करें।

🌹अधिक मात्रा में बार-बार पेशाब आता हो तो अजवायन और तिल समभाग मिलाकर दिन में एक से दो बार खायें।

🌹मासिक धर्म के समय पीड़ा होती हो तो 15 से 30 दिनों तक भोजन के बाद या बीच में गुनगुने पानी के साथ अजवायन लेने से दर्द मिट जाता है। मासिक अधिक आता हो, गर्मी अधिक हो तो यह प्रयोग न करें। सुबह खाली पेट 2-4 गिलास पानी पीने से अनियमित मासिक स्राव में लाभ होता है।

🌹उलटी में अजवायन और एक लौंग का चूर्ण शहद में मिलाकर चाटना लाभदायी है।

🔹सभी प्रयोगों में अजवायन की मात्राः आधा से दो ग्राम।

🔹सावधानीः शरद व ग्रीष्म ऋतु में तथा पित्त प्रकृतिवालों को अजवायन का उपयोग अत्यल्प मात्रा में करना चाहिए।

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