Pravachan 22 February 2021

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🔷जीवन बड़ा अनंत है, कुछ भी तो ऐसा नहीं जिसे प्राप्त ना किया जा सके। प्रत्येक जीवन ईश्वर की अनुपम देन और कृपा प्रसाद है।

🔷यहाँ हर कोई साधारण से असाधारण होने की पात्रता रखता है। यहाँ अनेकों ऐसे उदाहरण है जिन्होंने शून्य से यात्रा प्रारम्भ की और फिर शिखर तक जा पहुंचे। उन्हें भगवान ने कोई अलग से शक्ति नहीं दी ये सब करने के लिए। परन्तु वो प्रत्येक क्षण अपने उद्देश्य में सतत लगे रहे।

🔷मानव जीवन अपने आप में बड़ा शक्ति संपन्न है। आवश्यकता है स्वयं की शक्तियों को पहचानने की, एक दृण संकल्प की, जूनून की। नकारात्मक विचारों को त्यागकर अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करो। देखो सफलता तुम्हारा आलिंगन करने को तैयार खड़ी है।

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मानवीय गुणों में एक प्रमुख गुण है “क्षमा” और क्षमा जिस भी मनुष्य के अन्दर है वो किसी वीर से कम नही है। तभी तो कहा गया है कि- ” क्षमा वीरस्य भूषणं और क्षमा वाणीस्य भूषणं ” क्षमा साहसी लोगों का आभूषण है और क्षमा वाणी का भी आभूषण है। यद्यपि किसी को दंडित करना या डाँटना आपके वाहुबल को दर्शाता है।
बलवान वो नहीं जो किसी को दण्ड देने की सामर्थ्य रखता हो अपितु बलवान वो है जो किसी को क्षमा करने की सामर्थ्य रखता हो। अगर आप किसी को क्षमा करने का साहस रखते हैं तो सच मानिये कि आप एक शक्तिशाली सम्पदा के धनी हैं और इसी कारण आप सबके प्रिय बनते हो।
आजकल परिवारों में अशांति और क्लेश का एक प्रमुख कारण यह भी है कि हमारे जीवन से और जुवान से क्षमा नाम का गुण लगभग गायब सा हो गया है। दूसरों को क्षमा करने की आदत डाल लो जीवन की कुछ समस्याओं से बच जाओगे। निश्चित ही अगर आप जीवन में क्षमा करना सीख जाते हैं तो आपके कई झंझटों का स्वत:निदान हो जाता है।

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📕मित्रों, अपने आपको, अपनी चेतन सत्ता को पहचानना आसान बात नहीं है । विद्यमान परिस्थितियाँ ही धोखा देने के लिए पर्याप्त होती है, फिर जन्म-जन्मान्तरों के प्रारब्ध इतने भले नहीं होते जो मनुष्य को आसानी से क्षमा कर दें । हमारा असली व्यक्तित्व इतना स्पष्ट है कि उसकी भावानुभूति एक क्षण में हो जाती है, वह परदों में नहीं रहता, फिर भी वह इतना जटिल और कामनाओं के परदे में छुपा हुआ है कि उसके असली स्वरूप को जानना टेढ़ा पड़ जाता है । साधना, उपासना करते हुए भी बार-बार पथ से विचलित होना पड़ता है । ऐसी असफलताएँ ही जीवन लक्ष्य में बाधक हैं ।
📕श्रद्धा वह प्रकाश है जो आत्मा की, सत्य की प्राप्ति के लिए बनाए गए मार्ग को दिखाता रहता है । जब भी मनुष्य एक क्षण के लिए लौकिक चमक-दमक, कामिनी और कंचन के लिए मोहग्रस्त होता है तो माता की तरह ठंडे जल से मुँह धोकर जगा देने वाली शक्ति यह श्रद्धा ही होती है ।
📕सत्य के सद्गुण, ऐश्वर्यस्वरूप ज्ञान की थाह अपनी बुद्धि से नहीं मिलती, उसके प्रति सविनय प्रेम भावना विकसित होती है, उसी को श्रद्धा कहते हैं ।
📕श्रद्धा के बल पर ही मलिन चित्त, अशुद्ध चिंतन का परित्याग करके बार-बार परमात्मा के चिंतन में लगा रहता है । बुद्धि भी जड़ पदार्थो में तन्मय न रहकर परमात्म-ज्ञान में अधिक से अधिक सूक्ष्मदर्शी होकर दिव्यभाव में बदल जाती है ।✍🏼
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