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साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा मानव जीवन एक अलभ्य अवसर एवं सुरदुर्लभ अवसर है, इसको तुच्छ बातों में बरबाद न करके ऐसा सदुपयोग करना चाहिए जिससे जीवनलक्ष्य की प्राप्ति हो, आनन्द उल्लास और संतोष के साथ जिया जाय तथा संसार को अच्छा संसार बनाने में सहायता मिले। यदि यह निष्कर्ष सच्चे मन से निकाला गया हो तो निस्संदेह उसकी पूर्ति होना, व्यवस्था बनना कुछ भी कठिन नहीं है। साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चार भागों में अध्यात्म विभक्त है। चारों को मिलाकर ही आत्मकल्याण की कोई सर्वांगपूर्ण व्यवस्था बन सकती है। इसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि हम विश्वासपूर्वक इस आदर्श पर निष्ठा रखें कि अन्य आवश्यक कार्यों की तरह आत्मकल्याण का कार्यक्रम भी उपेक्षणीय नहीं वरन अन्य साधारण कार्यों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है और महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए सोच विचार करते रहना पड़ता है, समय लगाना पड़ता है और श्रम करना पड़ता है। यह तीनों ही साधन जब तक आत्मकल्याण योजना में न लगेंगे, तब तक उसकी पूर्ति किसी भी प्रकार संभव न होगी। हमें अपने मस्तिष्क में आत्मकल्याण की आवश्यकता और योजना को अधिकाधिक स्थान देते चलना होगा और उसके लिए समय मिलते ही गहराई है सोच-विचार करते रहना होगा। दिन में ऐसा बहुत सा समय होता है जब शरीर आराम कर रहा होता है और मन खाली रहता है। ऐसा जितना भी समय मिले उसे आत्मकल्याण संबंधी समस्याओं को समझने और सुलझाने में लगाए रहना चाहिए है।।
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बहुत सुन्दर जिज्ञासा निर्गुण की परिभाषा क्या है, और उतना ही गम्भीर सार से ओत-प्रोत है इसका आशय । वास्तव में हम तीनों गुणों से युक्त हैं , अब वो बात अलग है कि की किसी में सतोगुण की प्रधानता होती है तो किसी में रजोगुण कूट कूट कर भरा हुआ है और किसी में तमोगुण प्रधान बना हुआ है । अर्थात सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण का आधिपत्य रहता है हमारे सम्पूर्ण जीवनकाल में । किन्तु हमारी जिज्ञासा है कि वास्तविक निर्गुणता किसे कहते हैं ? जो व्यक्ति इन तीनों गुणों का त्याग करके सदा सत्य अर्थात परमात्मा में अपनी मन ,बुद्धि, चित्त, अंहकार का विलय करते हुए अपने कर्त्तव्यों का वहन करता है तो कदाचित वह निर्गुणता की परिभाषा को सार्थक करता है । अर्थात जब कुछ प्राप्त करने की इच्छा या कुछ प्राप्त किए हुए का रक्षण करने का विचार न होकर केवल स्वयं की आत्मा को स्वतन्त्र करने का भाव हो तो वह कदाचित निर्गुणता है । किन्तु इन गुणों से मुक्त होना आसान नहीं होता साधारण व्यक्ति के लिए अर्थात जो व्यक्ति स्वाद से छूटने के लिए भोजन का ही त्याग कर देता है तो ऐसे व्यक्ति को दोहरी हानि होती है । एक तो वह निर्बल हो जाता है जिसके कारण परमात्मा को प्राप्त करने के लिए जो प्रयत्न अनिवार्य है उसे वो नहीं कर पाता । और दूसरा सदा ही उसका मन स्वाद की लालसा से भरा रहता है । क्या ये सत्य नहीं ? इसलिए भोजन का त्याग करने से उत्तम है की स्वाद की लालसा का ही त्याग कर दिया जाय । इसलिए जो व्यक्ति कर्मयोगी होता है वह अपने मन की प्रत्येक लालसाओं को खींच लेता है वह जीवन को कर्तव्य मानकर कार्य तो अवश्य करता है किन्तु उन कार्यों से जुड़े रहना उसे नहीं भाता है । नियति का सिद्धान्त भी यही है कि जो व्यक्ति अपने कार्य से आशाएं और इच्छा नहीं रखता उसी के कार्य ही पूर्ण होते हैं । एक असफलता से जिसका मन डोलता नहीं तथा श्रेष्ठता से आनन्दित होकर जो स्वयं को सर्वश्रेष्ठ नहीं मानता कदाचित ऐसा व्यक्ति ही कर्मयोगी कहलाता है । और ऐसा व्यक्ति जीवन में बार बार सफल होता है । अर्थात सतोगुण रजोगुण और तमोगुण से मुक्त होकर स्वयं को हर प्रकार के द्वंद से मुक्त करके केवल परमात्मा का चिन्तन मनन और विचार करने का भाव ही कदाचित निर्गुणता है । क्या ये सत्य नहीं …स्वयं विचार कीजिएगा ।।
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