Reality of Shree Satyanarayan Katha

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सत्यनारायणकथाका_सत्य

स्कंद पुराण में दी गई सत्यनारायण की कथा तथा लोक में प्रचलित सत्यनारायण की कथा में बहुत कम अन्तर है । स्कंध पुराण के अनुसार साधु वणिक् ने मणिपुर के राजा चन्द्रचूड द्वारा पारित सत्यनारायण व्रत को देखा और उसका प्रसाद ग्रहण किया जिससे उसे कलावती नामक कन्या प्राप्त हुई । कालान्तर में कलावती का विवाह शंखपति से हुआ । शेष कथा लोक में प्रचलित कथा जैसी ही है । लेकिन स्कंध पुराण में इस कथा के स्रोत के संकेत भी दिए गए हैं । एक स्थान पर कहा गया है कि मख और धर्म, यह दो मुख्य रूप से करणीय हैं । मख का अर्थ दिया गया है – स्वधा और स्वाहा द्वारा देवों का यजन करना और धर्म का अर्थ दिया गया है – विप्र और अतिथि को दान । यह कथन इस कथा के मूल को उद्घाटित करता है । नारायण नामक ऋषि वाले ऋग्वेद ( पुरुष सूक्त) की ऋचा है –
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमान: सचन्ते यत्र पूर्वे साध्या: सन्ति देवा: ।।
इससे पहली ऋचा देवों द्वारा यज्ञ हेतु पुरुष पशु को बांधने की है । उपरोक्त ऋचा में भी सत्यनारायण की कथा की भांति यज्ञ और धर्म दो मुख्य शब्द हैं । जैसा कि यम शब्द की टिप्पणी में स्पष्ट किया जा चुका है, श्रौत स्तर पर यम का अस्तित्व होता है तो स्मार्त्त स्तर पर धर्म का । स्कंध पुराण की कथा में इस तथ्य को कलावती – पति शंखपति द्वारा इंगित किया गया है । याज्ञिक परम्परा में पहले सामवेद के अनुसार स्तोत्र का गायन होता है, फिर ऋग्वेद आदि के अनुसार उसका शंसन होता है । शंसन की प्रक्रिया मर्त्य स्तर से जबकि स्तोत्र गान की प्रक्रिया अमर्त्य स्तर से सम्बन्धित होती है । दूसरे शब्दों में यह श्रौत और स्मार्त्त से सम्बन्धित है । शंसन को ही पुराणों में शंख कहते हैं । अतः जब कलावती के पति का नाम शंखपति – शंख की रक्षा करने वाला रखा गया है तो उसका अर्थ होगा कि उसकी पहुंच श्रुति तक है । बिना श्रुति के शंसन या शंस सुरक्षित नहीं रह पाएगा । कथा में शंसन और श्रवण/श्रुति हेतु दो मार्गों का उल्लेख किया गया है – धर्म और यज्ञ । धर्म का अर्थ बताया गया है – विप्रों और अतिथियों को दान । पौराणिक तथा वैदिक परम्परा में दान का अर्थ होता है किसी वस्तु विशेष के संदर्भ में दक्षता प्राप्त करके उसे अपने लिए तथा दूसरों के लिए भी सुलभ कराना । उदाहरण के लिए, यदि निर्देश दिया जाता है कि यव का दान करो तो उसका अर्थ यह नहीं है कि पार्थिव यव को ग्रहण करके उसको दूसरे को दे दिया जाए । उसका वास्तविक अर्थ होगा अपने स्वयं के तप द्वारा यव का जनन और इतना ही नहीं, उस यव को इतना सबल बनाना है कि उसका प्रभाव हमारे विप्र भाग तक, शुद्ध सात्विक भाग तक भी पहुंच सके ।
सत्यनारायण कथा में नारायण के साथ सत्य शब्द को जोडना महत्त्वपूर्ण है । पहले नारायण शब्द को समझना होगा । पौराणिक साहित्य का एक सार्वत्रिक श्लोक है :
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनव: ।
अयनं मम तत् पूर्वमतो नारायणो ह्यहम् ।। – महाभारत शान्ति पर्व
दूसरा श्लोक है :
आपो नारास्तत्तनव इत्यपां नाम शुश्रुम ।
अयनं तेन चैवास्ते तेन नारायण: स्मृतः ।। – महाभारत वन पर्व

पद्म पुराण में नारायण शब्द की विभिन्न प्रकार से व्याख्या का प्रयास किया गया है । उनमें से एक व्याख्या यह है कि नर से उत्पन्न तत्त्व नार हैं । उस(नारायण) का अयन वही नार हैं, अतः : उसका नाम नारायण है । अन्य व्याख्याओं को साथ मिलाकर यह निष्कर्ष निकलता है कि नर तत्त्व ऐसा है कि उसमें परस्पर संघात नहीं है( पुराणों में राजा नल की कथा में नल अक्ष विद्या/अपने को केन्द्रीभूत करने, अन्तर्मुखी होने की विद्या को नहीं जानता है लेकिन सार्वत्रिक रूप से अपने को फैलाने की अश्व विद्या को जानता है ) । नर से अगला विकास नार या आपः का है जिसमें परस्पर संघात है, वह परस्पर मिला हुआ सा है । लेकिन यह संघात पूर्ण नहीं है । इससे अगली स्थिति नारायण की है । वहां संघात की पूर्णता है । वहां कार्य और कारण मिलकर एक हो जाते हैं । ब्रह्माण्ड पुराण का कथन है कि सूर्यों द्वारा अपनी किरणों से प्रलय करने के पश्चात् आपः, जल की स्थिति आती है । प्रकृति की इस अव्यक्त स्थिति में नारायण की विद्यमानता रहती है । यह नारायण की स्थिति तीन प्रकार की हो सकती है – सत्त्व, रज और तम ।
पुराणों में प्रायः वर्णन आता है कि आरम्भ में जल ही जल था । उस जल से एक पुष्कर का प्रादुर्भाव हुआ । उस पुष्कर पर ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ । ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार यह ब्रह्मा रजोगुण वाले नारायण का परिचायक है जो सृष्टि करता है ( इस कथन के अनुसार ऋग्वेद के पुरुष सूक्त की प्रथम ऋचा सहस्रशीर्षा पुरुष: इत्यादि इसी रजोगुणी नारायण या ब्रह्मा के लिए है ) । इसी प्रकार तमोगुण वाले नारायण को समझ सकते हैं। अतः सत्यनारायण की कथा यह संकेत करती है कि सत्त्व गुण वाले नारायण का प्राकट्य अभीष्ट है । सत्य का दूसरा अर्थ यह हो सकता है कि वह नारायण जिसका प्रभाव अमर्त्य व मर्त्य दोनों स्तरों पर फैल गया हो । पुरुष सूक्त की कुछ ऋचाओं में तीन और एक पादों का उल्लेख आता है । यह संदेह उत्पन्न करता है कि कहीं यह धर्म के चार पादों से सम्बन्धित तो नहीं है ? ऐसी स्थिति में सत्य नारायण सत्ययुग का परिचायक होगा । यह कहा जा सकता है कि धर्म के तीन पादों को ऊर्ध्वगामी बनाना तो सरल है लेकिन जड पदार्थ में संघात उत्पन्न करना सरल नहीं है । पुरुष सूक्त की चौथी ऋचा में साशना ( क्षुधा रखने वाले भूत) और अनशना( ऐसे भूत जिनमें क्षुधा उत्पन्न नहीं होती ) का उल्लेख है । ऋचा के अनुसार पुरुष ने इन दोनों प्रकार के भूतों में अपना विस्तार किया ।
स्कंध पुराण की कथा में मणिपुर के राजा चन्द्रचूड का उल्लेख है जबकि लौकिक कथा में राजा उल्कामुख का नाम आता है । यहां मणिपुर शब्द महत्त्वपूर्ण है । मणिपूर नाभि चक्र का नाम भी है । यहां अग्नि की स्थिति है जो दस कलाओं में विद्यमान रहती है । इन कलाओं के नाम क्षुधा, तृष्णा आदि आते हैं ( नारद पुराण ) । इससे अगली स्थिति अनाहत चक्र की है जहां सूर्य की 12 कलाएं विद्यमान रहती हैं । इससे अगली स्थिति विशुद्धि चक्र की है जहां चन्द्रमा की 16 कलाएं विद्यमान रहती हैं जिनके नाम अमृता, मानिनी, पूषा, पुष्टि, तुष्टि, रति – – – – – -पूर्णा व पूर्णामृता हैं ।
सत्यनारायण की कथा में साधु – पुत्री कलावती के नाम का समावेश यह संकेत करता है कि अब साधक ने मणिपूर आदि चक्रों की कलाओं का अलग – अलग अभिज्ञान करना सीख लिया है । यह कलाएं मर्त्य स्तर का प्रतीक हैं । इससे ऊपर की स्थिति होगी कलावती के पति शंखपति की, जो शंसन की रक्षा कर सके, उसे श्रुति के अनुसार ढाल सके । और कलाओं के घटने की स्थिति में विभिन्न कलाओं के बीच अधिक तादात्म्य नहीं होता । यह तादात्म्य तो नारायण की स्थिति में, सत्यनारायण की स्थिति में ही पूर्णता प्राप्त करता है ।
स्कंद पुराण की कथा में साधु वणिक् के समावेश के संदर्भ में यह अन्वेषणीय है कि यह साधु पुरुष सूक्त के साध्य देवों का कोई रूपान्तर तो नहीं है ?
पुराणों में प्रायः नर व नारायण का उल्लेख साथ – साथ आता है । वैदिक साहित्य में नारायण के साथ नर का उल्लेख नहीं मिलता । आपस्तम्ब श्रौत सूत्र में आपस्या इष्टकाओं के चयन के संदर्भ में पहले मा, प्रमा, प्रतिमा व अस्रीवयः छन्द इष्टकाओं का उल्लेख आता है और उसके पश्चात् पंक्ति आदि छन्द इष्टकाओं का । इसके पश्चात् नारायण का उल्लेख आता है । शतपथ ब्राह्मण में मा, प्रमा आदि छन्दों को अनिरुक्त और पंक्ति आदि छन्दों को निरुक्त छन्द कहा गया है । मा का अर्थ होता है मित, सीमित । अतः यह कहा जा सकता है कि पुराणों में जो तथ्य नर के द्वारा इंगित किया गया है, वही वैदिक साहित्य में मा, प्रमा आदि के द्वारा इंगित किया गया है ।

        

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