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: हंसी है हर मर्ज की दवा
हंसी से शरीर को क्या -क्या फायदे होते है?


  1. तनाव कम करने में मदद करे: एक अध्ययन के अनुसार, हंसी तनावपूर्ण स्तिथियों में बेहतरीन इलाज का काम करती है। हंसने से शरीर में कोर्टिसोल और एपिनेफ्रीन नामक स्ट्रेस होर्मोनेस का उत्पादन कम हो जाता है, जिससे दिमागी सेहत पर सकारत्मक प्रभाव पड़ता है।
  2. सांसों के लिए फायदेमंद: क्या आपने दिल खोलकर हंसने के बाद राहत का अनुभव किया है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि, हंसने के दौरान हम गहरी सांसें लेते हैं। जिससे ह्रदय गति और ब्लड प्रेशर का स्तर कम हो करके आपको सुकून का एहसास दिलाने में मदद करता हैं। गहरी सांस लेने की तरह, हंसी में भी अंदरूनी सफाई के तत्व होते हैं, जिनसे इम्फीसेमा और सांसों से जुड़ी अन्य बीमारियों से पीड़ित लोगों को मदद मिलती है।
  3. प्राकृतिक व्यायाम: हंसने के अंदरूनी फायदों के अलावा, हंसने से शरीर में मांसपेशियों की एक्सरसाइज भी होती है। जब आप हंसते हैं तो आपके मसल्स में हरकत होती है। हंसने से चेहरे के मसल्स और पेट में कॉन्ट्रैक्शन होता है, यही वजह है, कि देर तक हंसने के बाद हम अपने जबड़ों और पेट में हल्का दर्द महसूस करते हैं। जोर से हंसने से पैरों, पीठ, कांधों और बाजुओं की एक्सरसाइज हो जाती है। हंसने से काफी कैलोरीज भी बर्न करने में मदद मिलती हैं।
  4. इम्युनिटी को बेहतर बनाए: रिसर्च के द्वारा पता चलता है, कि हंसने से शरीर में उन एंटीबॉडीज का उत्पादन होता है जिनसे बीमारियों और इंफेक्शन से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है। सकारात्मक विचार न्यूरोपैप्टाइड रिहा कर देते है, जिससे तनाव से बाहर आने में और बहुत गंभीर बीमारी से लड़ने मदद करते है।
  5. अनिद्रा की शिकायत दूर करे: अगर नींद की कमी का शिकार हैं या आपको रात में आसानी से नींद नहीं आती तो खुलकर हंसने की आदत दाल लें। हंसने से शरीर में मेलाटोनिन नाम के हार्मोन उत्पादन बढ़ जाता है जिसके कारण हम सुकून भरी नींद ले पाते हैं।

इन सब खूबियों के अलावा हंसने से याददाश्त को बेहतर बनाने, ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने, मूड को बेहतर करने और शरीर को ऊर्जा प्रदान करने में मदद मिलती है। यही वजह है, कि सेहत के एक्सपर्ट्स अक्सर आपको हंसते-मुस्कुराते रहने की सलाह देते हैं।
[: सुप्रभात मित्रों … ॐ नमः शिवाय !
आज का दिन आप सभी के लिये शुभ हो।

🌷केदारादीनि लिंगानी पृथ्वियं यानि कानिचित
तानि दृष्टिवाच यत्पुण्य तत्पुण्यं रसदर्शनात !🌷

  • इस पृथ्वी पर केदारनाथ से लेकर जितने भी महादेव जी के लिंग हैं,
    उन सबसे दर्शन से जो पुण्य होता है, वह पुण्य केवल पारद शिवलिंग के दर्शन करने मात्र से ही मिल जाता है।

🌷
पारद संहिता मे भी लिखा हुआ है कि
पारद शब्द मे
प: विष्णु,
आ: कालिका,
र: शिव,
द: ब्रह्मा,
इस तरह सभी विद्यमान है।

🌷
पारद से बने लिंग की पूजा की जाए तो धन, ज्ञान, सिद्धि और ऐश्वर्य प्राप्त होता है।

पारा एकमात्र तरल धातु है , जिसे शिव का वीर्य माना गया है।
पारद का शोधन अत्यन्त कठिन कार्य है और इसे ठोस बनाने के लिए मुर्छित खेचरित, कीलित, शम्भू विजित और शोधित जैसी कठिन प्रक्रियाओं मे से गुजरना पड़ता है,
तब कहीं पारा ठोस आकार ग्रहण करता है और उससे शिवलिंग का निर्माण होता है।

शिवलिंग निर्माण के बाद कई वैदिक क्रियाओं से गुजरने पर ही पारद शिवलिंग रस-सिद्ध एवं चैतन्य हो पाता है जिससे वह पूर्ण सक्षम एवं प्रभावयुक्त बनता है।

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सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मे पारद ही एकमात्र तत्व है जिसके द्वारा मोक्ष और ऐश्वर्य दोनों ही पाए जा सकते हैं।

इसी विद्या के द्वारा कलयुग मे भी जगत गुरु आदिशंकराचार्य ने स्वर्ण वर्षा करवा कर दिखाया था।
उनके गुरुदेव श्री गोविन्द पादाचार्य का पारद व लोह सिद्धि पर लिखा रस ह्रदय तंत्र ग्रन्थ विख्यात है…
जिसमे दी गयी क्रियाये आज भी उतनी ही सत्य हैं जितनी तब रही होंगी।

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यदि व्यक्ति ब्रह्म हत्या का भी दोषी हो या कैसे भी पाप उसने किए हो तब भी पारद का स्पर्श , दर्शन व पूजन सभी दोषों से मुक्त कर देता है।

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रावण रससिद्ध योगी था,
उसने पारद शिवलिंग की पूजा कर शिव को पूर्ण प्रसन्न किया ।
जीवन मे जो मनुष्य सर्वश्रेष्ट बने रहना चाहते हैं,
जो व्यक्ति सामान्य घर से जन्म लेकर विपरीत परिस्थितियों मे बडे होकर सभी प्रकार की बाधाओं, कष्टों और समस्याओं के होते हुए भी जीवन मे अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते है अथवा
जो व्यक्ति आर्थिक, व्यापारिक और भौतिक दृष्टि से पूर्ण सुख प्राप्त करना चाहते है उन्हें अपने घर मे अवश्य ही पारद शिवलिंग की स्थापना करनी चाहिए।

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जिसके घर मे पारद शिवलिंग है उस घर मे सर्वसिद्धियॉं परमात्मा के सहित उपस्थिति रहती है …
वह अगली पीढियों तक के लिए रिद्धी सिद्धि एवं स्थायी लक्ष्मी को स्थापित कर लेता है।
उस घर मे रहने वालों पर किसी भी प्रकार का कोई तांत्रिक अभिचार नहीं हो पाता।

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शिवपुराण मे कहा गया है कि इसकी अर्चना से यमराज का दूत भी शांत होकर वापिस चला जाता है।
ये सभी बातें तथ्यों पर आधारित तथा मेरे स्वयं के अनुभव के आधार पर भी सच हैं।

🌷
घर मे पारद शिवलिंग सौभाग्य, शान्ति, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के लिए अत्यधिक सौभाग्यशाली है।
जो व्यक्ति पारद शिवलिंग का पूजन करता है उसे शिव की कृपा से सुख समृद्धि आदि की प्राप्ति होती है ।

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पंचामृत बनाकर पारद शिवलिंग पर अर्पित करते हुये निम्न मंत्र का जप करते जायें ,

” ॐ ह्रीम तेजसे श्रीं कामसे क्रीं पूर्णत्व सिद्धिं देहि पारदेश्वराय क्रीं श्रीं ह्रीम ॐ ”

यह मंत्र समस्त कामनाओं को पूर्ण करता है ।

!! ॐ सुरभ्यै नमः !!
[ कुंङली में #बाधाकारकग्रह और उसका

उपाएदान

कई बार देखा जाता है कि जन्म पत्री में शुभ ग्रह, उच्च के ग्रह, मित्र के ग्रह होने पर भी हमें आशातीत सफलता नहीं मिलती तब हमें यह जानना पड़ेगा कि जन्मपत्री का कोई ग्रह सफलता या कार्य में बाधा तो नहीं कर रहा है।

जन्म पत्री के ग्रहो से यदि कार्य ना हो तो समझ लेना चाहिए कि जन्म पत्री के ग्रह काम नहीं कर रहे है। इसका मतलब है कि कोई ग्रह पत्री में बाधाकारक अर्थात बाधा कर रहा है क्योकि बाधाकारक ग्रह के कारण शुभ ग्रह फल नहीं देते है पता लगने पर बाधाकारक ग्रह की पूजा किसी विद्वान ब्राम्हण से करा कर शांति करे जिससे सभी कार्य सफल हो व ग्रहो का शुभ फल मिले। इस समय उस ग्रह का दान भी किया जा सकता है।

यहाँ पर हम सभी लग्नो की जन्म पत्रियो के बाधाकारक ग्रह आपकी सुविधा के लिए बता रहे है जिनकी पूजा करके शांति व शुभ फल पा सके।

1 : मेष लग्न होने पर ग्यारहवें भाव का स्वामी बाधाकारक होता है यदि शुभ ग्रह होने पर शुभ फल या मनोरथ पुरे नहीं होते, कार्य में अड़चन आती है तो ग्यारहवें भाव के स्वामी का जाप व पूजन करने से सभी कार्य निर्विध्न पुरे होगे। यहाँ पर ग्यारहवें भाव का स्वामी शनि होगा इस कारण शनि की पूजा करे, पीपल पर साम को जोत जलाये व काली वस्तु का दान शनिवार को करे।

2 : वृष लग्न होने पर नवम भाव का स्वामी बाधाकारक होता है नवम भाव में मकर राशि(10) पड़ती है। इसका स्वामी शनि होता है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है इस कारण यदि शुभ फल या कार्यो में बाधा आ रही हो तब जानना चाहिए कि शनि के कारण बाधा आ रही है तो शनिवार को शनि पर सरसो का तेल चढ़ाये व शनि चालीसा का पाठ करे।

3 : यदि जातक व जातिका की जन्म कुंडली में मिथुन लग्न हो तो सप्तम भाव का स्वामी बाधाकारक होता है इस लग्न में सप्तम भाव का स्वामी गुरु(बृहस्पति) होता है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। जब विवाह आदि शुभ कार्यो में अड़चन आ रही हो तो सप्तम भाव के स्वामी गुरु(बृहस्पति) की पूजा किसी विद्वान ब्राह्मण से कराये और पीली वस्तुओ का दान गुरुवार को करे, गुरु मंत्र का जाप करे जिससे सभी बाधा दूर होकर शुभ फल मिले।

4 : यदि जातक व जातिका की जन्म कुंडली में कर्क लग्न होने पर ग्यारहवे(11) भाव का स्वामी बाधाकारक होता है यहाँ पर कर्क लग्न में ग्यारहवे(11) भाव का स्वामी शुक्र होगा जिससे सभी भौतिक सुखो में कमी होना, सुख कम मिलना, भोग की वस्तुओ की कमी रहती है इस कारण शुक्र ग्रह की पूजा करने से सभी मनोरथ पूरे होंगे। लक्ष्मी चालीसा का पाठ व सफ़ेद वस्तुओ का दान शुक्रवार करे।

5 : यदि जातक व जातिका की जन्म कुंडली में सिंह लग्न होने पर नवम भाव का स्वामी बाधाकारक होता है जो जन्म पत्री के अनुसार मंगल होगा। इससे झगड़ा, वाद-विवाद, तनाव, मुकदमा आदि होते है इस कारण बाधाकारक ग्रह मंगल का जाप व दान करे यहाँ पर आप हनुमान चालीसा का पाठ करना शुभ रहेगा जिससे शांति रहेगी।

6 : यदि जातक व जातिका की जन्म कुंडली में कन्या लग्न होने पर सप्तम भाव का स्वामी बाधाकारक होता है यहाँ पर सप्तम भाव का स्वामी गुरु(बृहस्पति) होगा। जिससे वैवाहिक जीवन में तनाव, झगड़ा, खर्च आदि होना तब जानना चाहिए कि ये सब गुरु(बृहस्पति) के कारण बाधा आ रही है तो गुरु(बृहस्पति) की पूजा करे, ब्राह्मण को प्रणाम करे, गुरुवार का व्रत करे तो सुख-शांति रहेगी।

7 : यदि जातक व जातिका की जन्म कुंडली में तुला लग्न होने पर सभी ग्रह शुभ होते हुए फल नहीं दे रहे हो तो जानना चाहिए कि ग्यारहवे(11) भाव का स्वामी बाधा कर रहा है जो यहाँ पर बाधाकारक गृह सूर्य है जिससे मान, अपमान और यश न मिलना, आमदनी में परेशानी होती है इस समय सूर्य की पूजा करना व सूर्य को जल देना, पिता का सम्मान करना और गायत्री मंत्र का जाप करना शुभ रहेगा।

8 : यदि जातक व जातिका की जन्म कुंडली में वृश्चिक लग्न होने पर यदि कार्य नहीं हो रहे हो तो समझ ले कि नवम भाव का स्वामी बाधा कर रहा है जो यहाँ पर नवम भाव का स्वामी चन्द्रमा है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। जिससे मानसिक परेशानी होना, ब्लड प्रेशर होना, धन खर्च होना, किसी कार्य या भगवन की पूजा में मन न लगना तब यहाँ पर चन्द्रमा की पूजा शुभ फल देगी। यहाँ पर आप सफ़ेद वस्तु का दान सोमवार को करे व शिवलिंग पर दूध चढ़ावे तो सभी कार्य पुरे होंगे और शांति मिलेगी।

9 : यदि जातक व जातिका की जन्म कुंडली में धनु लग्न हो तब बाधाकारक ग्रह सप्तम भाव का स्वामी होता है यहाँ पर सप्तम भाव का स्वामी बुध बाधाकारक होगा तब जानना चाहिए कि बुध के कारण ग्रह शुभ फल नहीं दे रहे है बुध एक नपुंसक ग्रह भी है इसकी शांति के लिए बुध का जाप, दुर्गा का पाठ, हिजड़ो को हरी वस्तु का दान बुधवार को करे।

10 : यदि जातक व जातिका की जन्म कुंडली में मकर लग्न होने पर ग्यारहवे(11) भाव ,का स्वामी बाधाकारक होता है यहाँ पर ग्यारहवे(11) भाव में वृश्चिक राशि पड़ती है इसका स्वामी मंगल होता है इस कारण मंगल ही बाधाकारक ग्रह हुआ जिससे धन का नुकसान होना, आमदनी में तनाव, उदर रोग तथा संतान सबंधी परेशानी होने पर मंगल ग्रह की शांति करे। मंगल का जाप, गाये को गुड़ खिलाये और हनुमान चालीसा का पाठ करे तो सुख-शांति रहेगी याद रखे कि मंगलवार को कभी कर्ज ना ले।

11 : यदि जातक व जातिका की जन्म कुंडली में कुम्भ लग्न होने पर नवम भाव का स्वामी बाधाकारक होता है यहाँ पर नवम भाव का स्वामी शुक्र होगा जिससे भौतिक सुख में कमी, धर्म-कर्म में कमी तथा मन परेशान रहना तब यहाँ पर शुक्र ग्रह की शांति करे लक्ष्मी चालीसा का पाठ, सफ़ेद वस्तु का दान करना, शुक्रवार को जंडी का पूजन करना शुभ रहेगा।

12 : यदि जातक व जातिका की जन्म कुंडली में मीन लग्न होने पर सप्तम भाव का स्वामी बाधाकारक होता है यहाँ पर बाधाकारक ग्रह बुध होगा जैसा की चित्र में दर्शाया गया है जिससे वैवाहिक जीवन में परेशानी, शादी में विधन होना, व्यापार में नुकसान होना तब बुध ग्रह की शांति करे यहाँ पर दुर्गा का पाठ करना, हिजड़ो को दान देना शुभ रहेगा।
[शिवलिंग पर दूध क्यों चढ़ाया जाता है ?
क्या है इसमें वैज्ञानिक पक्ष ?

भगवान शिव को विश्वास का प्रतीक माना गया है क्योंकि उनका अपना चरित्र अनेक विरोधाभासों से भरा हुआ है जैसे शिव का अर्थ है जो शुभकर व कल्याणकारी हो, जबकि शिवजी का अपना व्यक्तित्व इससे जरा भी मेल नहीं खाता, क्योंकि वे अपने शरीर में इत्र के स्थान पर चिता की राख मलते हैं तथा गले में फूल-मालाओं के स्थान पर विषैले सर्पों को धारण करते हैं। वे अकेले ही ऐसे देवता हैं जो लिंग के रूप में पूजे जाते हैं। सावन में शिवलिंग पर दूध चढ़ाने का विशेष महत्व माना गया है। इसीलिए शिव भक्त सावन के महीने में शिवजी को प्रसन्न करने के लिए उन पर दूध की धार अर्पित करते हैं।

पुराणों में भी कहा गया है कि इससे पाप क्षीण होते हैं। लेकिन सावन में शिवलिंग पर दूध चढ़ाने का सिर्फ धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक महत्व भी है। सावन के महीने में दूध का सेवन नहीं करना चाहिए। शिव ऐसे देव हैं जो दूसरों के कल्याण के लिए हलाहल भी पी सकते हैं। इसीलिए सावन में शिव को दूध अर्पित करने की प्रथा बनाई गई है क्योंकि सावन के महीने में गाय या भैस घास के साथ कई ऐसे कीड़े-मकोड़ो को भी खा जाती है। जो दूध को स्वास्थ्य के लिए गुणकारी के बजाय हानिकारक बना देती है। इसीलिए सावन मास में दूध का सेवन न करते हुए उसे शिव को अर्पित करने का विधान बनाया गया है।

आयुर्वेद कहता है कि वात-पित्त-कफ इनके असंतुलन से बीमारियाँ होती हैं और श्रावण के महीने में वात की बीमारियाँ सबसे ज्यादा होती हैं. श्रावण के महीने में ऋतू परिवर्तन के कारण शरीर मे वात बढ़ता है. इस वात को कम करने के लिए क्या करना पड़ता है ?ऐसी चीज़ें नहीं खानी चाहिएं जिनसे वात बढे, इसलिए पत्ते वाली सब्जियां नहीं खानी चाहिएं !और उस समय पशु क्या खाते हैं ?

सब घास और पत्तियां ही तो खाते हैं. इस कारण उनका दूध भी वात को बढाता है ! इसलिए आयुर्वेद कहता है कि श्रावण के महीने में दूध नहीं पीना चाहिए.इसलिए श्रावण मास में जब हर जगह शिव रात्रि पर दूध चढ़ता था तो लोग समझ जाया करते थे कि इस महीने मे दूध विष के सामान है, स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है, इस समय दूध पिएंगे तो वाइरल इन्फेक्शन से बरसात की बीमारियाँ फैलेंगी और वो दूध नहीं पिया करते थे !

बरसात में भी बहुत सारी चीज़ें होती हैं लेकिन हम उनको दीवाली के बाद अन्नकूट में कृष्ण भोग लगाने के बाद ही खाते थे (क्यूंकि तब वर्षा ऋतू समाप्त हो चुकी होती थी). एलोपैथ कहता है कि गाजर मे विटामिन ए होता है आयरन होता है लेकिन आयुर्वेद कहता है कि शिव रात्रि के बाद गाजर नहीं खाना चाहिए इस ऋतू में खाया गाजर पित्त को बढाता है !तो बताओ अब तो मानोगे ना कि वो शिवलिंग पर दूध चढाना समझदारी है ?

ज़रा गौर करो, हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है ! ये इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारी परम्पराओं को समझने के लिए जिस विज्ञान की आवश्यकता है वो हमें पढ़ाया नहीं जाता और विज्ञान के नाम पर जो हमें पढ़ाया जा रहा है उस से हम अपनी परम्पराओं को समझ नहीं सकते !

जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है वो सनातन है, विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक के पक्षपात मे रहे

जय हिंदुत्व
[: राम

शिव जी ने अपने कंठ में राम नाम क्यों धारण किया है।

राम जी के सबसे बड़े भक्त शिवजी है।शिवजी निरन्तर राम ,नाम का जप करते है।
रामायण के सबसे प्राचीन आचार्य भगवान शिव है।इन्होंने राम नाम श्लोक का वर्णन सौ करोड़ श्लोक में किया।शिवजी ने दैत्य ,देवता,ऋषि ,मुनियों में इसका समान बंटवारा किया।सबके हिस्से में तैंतीस करोड़ ,तैंतीस लाख,तैंतीस हजार,तीन सौ श्लोक आए।

एक श्लोक शेष बचा । देवता, दैत्य और ऋषि-ये तीनों एक श्लोक के लिए लड़ने-झगड़ने लगे । यह श्लोक बत्तीस अक्षर वाले अनुष्टुप छन्द में था । शिवजी ने देवता, दैत्य और ऋषि-मुनियों-प्रत्येक को दस-दस अक्षर दे दिए । तीस अक्षर बंट गए और दो अक्षर शेष रह गए । तब भगवान शिव ने देवता, दैत्य और ऋषियों से कहा-

‘मैं ये दो अक्षर मैं किसी को भी नहीं दूंगा । इन्हें मैं अपने कण्ठ में रखूंगा ।’

ये दो अक्षर ‘रा’ और ‘म’ अर्थात् ‘राम-नाम’ हैं । यह ‘राम-नाम’ रूपी अमर-मन्त्र शिवजी के कण्ठ और जिह्वा के अग्रभाग में विराजमान है ।

भगवान शिव को ‘र’ और ‘म’ अक्षर क्यों प्रिय हैं ?

ऐसा माना जाता है कि सती के नाम में ‘र’कार अथवा ‘म’कार नहीं है, इसलिए भगवान शिव ने सती का त्याग कर दिया । जब सती ने पर्वतराज हिमाचल के यहां जन्म लिया, तब उनका नाम ‘गिरिजा’ (पार्वती) हो गया । इतने पर भी ‘शिवजी मुझे स्वीकार करेंगे या नहीं’-ऐसा सोचकर पार्वतीजी तपस्या करने लगीं । जब उन्होंने सूखे पत्ते भी खाने छोड़ दिए, तब उनका नाम ‘अपर्णा’ हो गया । ‘गिरिजा’ और ‘अपर्णा’-दोनों नामों में ‘र’कार आ गया तो भगवान शिव इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने पार्वतीजी को अपनी अर्धांगिनी बना लिया । इसी तरह शिवजी ने गंगा को स्वीकार नहीं किया परन्तु जब गंगा का नाम ‘भागीरथी’ पड़ गया, (इसमें भी ‘र’कार है) तब शिवजी ने उनको अपनी जटा में धारण कर लिया । इस प्रकार राम-नाम में विशेष प्रेम के कारण भगवान शिव दिन-रात राम-नाम का जप करते रहते हैं।

तुम्ह पुनि राम राम दिन राती।
सादर जपहु अनंग आराती।। (मानस १।१०८।४)

राम-नाम प्रेमी भगवान शिव को राख (भस्म) और मसान (श्मशान) क्यों प्रिय हैं ?

भगवान शिव को राख और मसान इसलिए प्रिय हैं क्योंकि राख में ‘रा’ और मसान में ‘म’ अक्षर है जिनको जोड़ देने से ‘राम’ बन जाता है और भगवान शिव का राम-नाम पर बहुत स्नेह है ।

एक बार कुछ लोग एक मुरदे को श्मशान ले जा रहे थे और ‘राम-नाम सत्य है’ ऐसा बोल रहे थे । शिवजी ने राम-नाम सुना तो वे भी उनके साथ चल दिए । जैसे पैसों की बात सुनकर लोभी आदमी उधर खिंच जाता है, ऐसे ही राम-नाम सुनकर भगवान शिव का मन भी उन लोगों की ओर खिंच गया । अब लोगों ने मुरदे को श्मशान में ले जाकर जला दिया और वहां से लौटने लगे । शिवजी ने विचार किया कि बात क्या है ? अब कोई आदमी राम-नाम ले ही नहीं रहा है । उनके मन में आया कि उस मुरदे में ही कोई करामात थी, जिसके कारण ये सब लोग राम-नाम ले रहे थे, अत: मुझे उसी के पास जाना चाहिए । शिवजी ने श्मशान में जाकर देखा कि वह मुरदा तो जलकर राख हो गया है । अत: शिवजी ने उस मुरदे की राख अपने शरीर में लगा ली और वहीं मसान में रहने लगे । किसी कवि ने कहा है-

बार-बार करत रकार व मकार ध्वनि,
पूरण है प्यार राम-नाम पे महेश को।।

कण्ठ में ‘राम-नाम’ की शक्ति से भगवान शिव द्वारा हलाहल का पान

नाम प्रभाव जान सिव नीको ।
कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।

जब देवताओं और असुरों के द्वारा समुद्र-मंथन किया गया तो सर्वप्रथम उसमें से हलाहल विष प्रकट हुआ, जिससे सारा संसार जलने लगा । देवता और असुर भी उस कालकूट विष की ज्वाला से दग्ध होने लगे । इस पर भगवान विष्णु ने भगवान शिव से कहा कि ‘आप देवाधिदेव और हम सभी के अग्रणी महादेव हैं । इसलिए समुद्र-मंथन से उत्पन्न पहली वस्तु आपकी ही होती है, हम लोग सादर उसे आपको भेंट कर रहे हैं ।’
भगवान शिव सोचने लगे-‘यदि सृष्टि में मानव-समुदाय में कहीं भी यह विष रहे तो प्राणी अशान्त होकर जलने लगेगा । इसे सुरक्षित रखने की ऐसी जगह होनी चाहिए कि यह किसी को नुकसान न पहुंचा सके । लेकिन, यदि हलाहल विष पेट में चला गया तो मृत्यु निश्चित है और बाहर रह गया तो सारी सृष्टि भस्म हो जाएगी, इसलिए सबसे सुरक्षित स्थान तो स्वयं मेरा ही कण्ठप्रदेश है ।’

भगवान विष्णु की प्रार्थना पर जब शिवजी उस महाविष का पान करने लगे तो शिवगणों ने हाहाकार करना प्रारम्भ कर दिया । तब भगवान भूतभावन शिव ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा-

‘भगवान श्रीराम का नाम सम्पूर्ण मन्त्रों का बीज-मूल है, वह मेरा जीवन है, मेरे सर्वांग में पूर्णत: प्रविष्ट हो चुका है, अत: अब हलाहल विष हो, प्रलय की अग्नि की ज्वाला हो या मृत्यु का मुख ही क्यों न हो, मुझे इनका किंचित भय नहीं है ।’

इस प्रकार राम-नाम का आश्रय लेकर महाकाल ने महाविष को अपनी हथेली पर रखकर आचमन कर लिया किन्तु उसे मुंह में लेते ही भगवान शिव को अपने उदर में स्थित चराचर विश्व का ध्यान आया और वे सोचने लगे कि जिस विष की भयंकर ज्वालाओं को देवता लोग भी सहन नहीं कर सके, उसे मेरे उदरस्थ जीव कैसे सहन करेंगे? यह ध्यान आते ही भगवान शिव ने उस विष को अपने गले में ही रोक लिया, नीचे नहीं उतरने दिया जिससे उनका कण्ठ नीला हो गया, जो दूषण (दोष) न होकर उनके लिए भूषण हो गया ।
कुछ लोगों का कहना है कि भगवान शिव द्वारा हलाहल विष का पान करना पार्वतीजी के स्थिर सौभाग्य के कारण हुआ और कुछ अन्य लोगों के अनुसार यह भगवान शिव के कण्ठ में राम-नाम है, उसी के प्रभाव के कारण संभव हुआ था ।

जय शिव शंकर ,राम राम
[: सुख पदार्थ में नही, सुख परमार्थ में है ।

अगर पदार्थों में सुख होता तो जिनके घर पदार्थों से भरे पड़े हैं, वे ही दुनियांँ में सबसे सुखी होते।

इस दुनियाँ का एक नियम है , जहाँ जिसके पास जो वस्तु है वह उस वस्तु के बदले पैसा कमाना चाहते हैं और जिनके पास पैसा है वे पैसा देकर वस्तु को अर्जित करना चाहते हैं ।

मतलब साफ है कि एक को पदार्थ विक्रय में सुख नजर आ रहा है तो दूसरे को उसी पदार्थ को क्रय करने में सुख नज़र आ रहा है । जबकि दोनों ही भ्रम में हैं। स्थायी सुख तो भगवद् शरणागति में है, त्याग में हैं।
[ये छः सुगंध चमत्कारिक रूप से बदल देंगी आपका भविष्य… ?

हिन्दू धर्म में सुगंध या खुशबू का बहुत महत्व माना गया है। वह इसलिए कि सात्विक अन्न से शरीर पुष्ट होता है तो सुगंध से सूक्ष्म शरीर। यह शरीर पंच कोष वाला है। जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद। सुगंध से प्राण और मनोमय कोष पुष्ट होता है। इसलिए जिस व्यक्ति के जीवन में सुगंध नहीं उसके जीवन में शांति भी नहीं। शांति नहीं तो सुख और समृद्धि भी नहीं।

सुगंध का असर : सुगंध से आपना मस्तिष्क बदलता है, सोच बदलती और सोच से भविष्य बदल जाता है। सुगंध आपके विचार की क्षमता पर असर डालती है। यह आपकी भावनाओं को बदलने की क्षमता रखती है।

सुगंध के लाभ : सुगंध के चमत्कार से प्राचीनकाल के लोग परिचि‍त थे तभी तो वे घर और मंदिर आदि जगहों पर सुगंध का विस्तार करते थे। यज्ञ करने से भी सुगंधित वातावरण निर्मित होता है। सुगंध के सही प्रयोग से एकाग्रता बढ़ाई जा सकती है। सुगंध से स्नायु तंत्र और डिप्रेशन जैसी बीमारियों को दूर किया जा सकता है। जानिए सुगंध का सही प्रयोग कैसे करें और साथ ही जानिए सुगंध का जीवन में महत्व।

मनुष्य का मन चलता है शरीर के चक्रों से। इन चक्रों पर रंग, सुगंध और शब्द (मंत्र) का गहरा असर होता है। यदि मन की अलग-अलग अवस्थाओं के हिसाब से सुगंध का प्रयोग किया जाए तो तमाम मानसिक समस्याओं को दूर किया जा सकता है।

सावधानी : ध्यान रहे कि परंपरागत सुगंध को छोड़कर अन्य किसी रासायनिक तरीके से विकसित हुई सुगंध आपकी सेहत और घर के वातावरण को नुकसान पहुंचा सकती है। बहुत से लोग घर में मच्छर मारने की दवा छिड़कते हैं या कोई बाजारू प्रॉडक्ट जलाते हैं। यह एक ओर जहां आपकी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है, वहीं यह आपके घर के वातावरण को बिगाड़कर वास्तुदोष निर्मित भी कर सकता है। हालांकि मच्छरदानी इसका अच्छा विकल्प हो सकता है।

सुगंध का उपयोग : यदि आप सुगंध के रूप में धूपबत्ती या अगल बत्ती जला रहे हैं या घर में कहीं पर इत्र का उपयोग कर रहे हैं तो ध्यान रहे कि सुगंध प्राकृतिक और हल्की होना चाहिए। बहुत तीखी सुगंध का विपरित असर हो सकता है। भीनी-भीन सुगंध ही असरकारक होती है। और यदि शरीर पर सुगंध का उपयोग कर रहे हैं तो कलाइयों पर, गर्दन के पीछे और नाभि पर लगाकर इसका उपयोग करें। अगर आप चाहें तो जल में भी सुगंध डालकर इससे स्नान कर सकते हैं।

विद्यार्थियों, अविवाहितों को केवल चंदन का इस्तेमाल करना चाहिए। काम करने या पूजा करने के पहले ही सुगंध का उपयोग करना चाहिए। कार्यस्थल या पूजा स्थल पर चंदन और गुग्गल की सुगंध का ही उपयोग करना चाहिए इससे कार्य और पूजा में मन लगा रहता है। ध्यना करते वक्त भी इसी सुगंध का प्रयोग करना चाहिए। मानसिक तनाव को दूर करने और अच्छी सेहत के लिए अपने बैडरूम में और नहाने के दौरान गुलाब, रातरानी और मोगरे की सुगंध का उपयोग करना चाहिए। सोने के पहले अपनी नाभि पर चंदन या गुलाब की सुगंध लगाकर सो जाइये।

कर्पूर और अष्टगंध : कर्पूर अति सुगंधित पदार्थ होता है तथा इसके दहन से वातावरण सुगंधित हो जाता है। कर्पूर जलाने से देवदोष व पितृदोष का शमन होता है। प्रतिदिन सुबह और शाम घर में संध्यावंदन के समय कर्पूर जरूर जलाएं। हिन्दू धर्म में संध्यावंदन, आरती या प्रार्थना के बाद कर्पूर जलाकर उसकी आरती लेने की परंपरा है।

पूजन, आरती आदि धार्मिक कार्यों में कर्पूर का विशेष महत्व बताया गया है। रात्रि में सोने से पूर्व कर्पूर जलाकर सोना तो और भी लाभदायक है। इसके अलावा प्रतिदिन घर में अष्टगंध की सुगंध भी फैलाएं। बाजार से अष्टगंध का एक डिब्बा लाकर रखें और उसे देवी और देवताओं को लगाएं।

घर के वास्तुदोष को मिटाने के लिए कर्पूर का बहुत‍ महत्व है। यदि सीढ़ियां, टॉयलेट या द्वार किसी गलत दिशा में निर्मित हो गए हैं, तो सभी जगह 1-1 कर्पूर की बट्टी रख दें। वहां रखा कर्पूर चमत्कारिक रूप से वास्तुदोष को दूर कर देगा। रात्रि में सोने से पहले पीतल के बर्तन में घी में भीगा हुआ कर्पूर जला दें। इसे तनावमुक्ति होगी और गहरी नींद आएगी

अष्टगंध : अष्टगंध को 8 तरह की जड़ी या सुगंध से मिलाकर बनाया जाता है। अष्टगंध 2 प्रकार का होता है- पहला वैष्णव और दूसरा शैव। यह प्रकार इसके मिश्रण के अनुसार है।

शैव अष्टगंध :

कुंकुमागुरुकस्तूरी चंद्रभागै: समीकृतै।
त्रिपुरप्रीतिदो गंधस्तथा चाण्डाश्व शम्भुना।। -कालिका पुराण

कुंकु, अगुरु, कस्तूरी, चंद्रभाग, गोरोचन, तमाल और जल को समान रूप में मिलाकर बनाया जाता है।

वैष्णव अष्टगंध :

चंदनागुरुह्रीबेकरकुष्ठकुंकुसेव्यका:।
जटामांसीमुरमिति विषणोर्गन्धाष्टकं बिन्दु।। -कालिका पुराण

चंदन, अगुरु, ह्रीवेर, कुष्ट, कुंकुम, सेव्यका, जटामांसी और मुर को मिलाकर बनाया जाता है।

जो भी हो अष्टगंध की सुगंध अत्यंत ही प्रिय होती है। इसका घर में इस्तेमाल होते रहने से चमत्कारिक रूप से मानसिक शांति मिलती है और घर का वास्तुदोष भी दूर हो जाता है। इसके इस्तेमाल से ग्रहों के दुष्प्रभाव भी दूर हो जाते हैं।

गुग्गुल की सुगंध : गुग्गुल एक वृक्ष का नाम है। इससे प्राप्त लार जैसे पदार्थ को भी ‘गुग्गल’ कहते हैं। इसका उपयोग सुगंध, इत्र व औषधि में भी किया जाता है

इसकी महक मीठी होती है और आग में डालने पर वह स्थान सुंगध से भर जाता है। गुग्गल की सुगंध से जहां आपके मस्तिष्क का दर्द और उससे संबंधित रोगों का नाश होगा वहीं इसे दिल के दर्द में भी लाभदायक माना गया है।

घर में साफ-सफाई रखते हुए पीपल के पत्ते से 7 दिन तक घर में गौमूत्र के छींटे मारें एवं तत्पश्चात शुद्ध गुग्गल की धूप जला दें। इससे घर में किसी ने कुछ कर रखा होगा तो वह दूर हो जाएगा और सभी के मस्तिष्क शांत रहेंगे। हफ्ते में 1 बार किसी भी दिन घर में कंडे जलाकर गुग्गल की धूनी देने से गृहकलह शांत होता है।

गुड़-घी की सुगंध : इसे धूप सुगंध या अग्निहोत्र सुगंध भी कह सकते हैं। गुरुवार और रविवार को गुड़ और घी मिलाकर उसे कंडे पर जलाएं। चाहे तो इसमें पके चावल भी मिला सकते हैं।

इससे जो सुगंधित वातावरण निर्मित होगा, वह आपके मन और मस्तिष्क के तनाव को शांत कर देगा। जहां शांति होती है, वहां गृहकलह नहीं होता और जहां गृहकलह नहीं होता वहीं लक्ष्मी वास करती हैं।

रातरानी: इसके फूल रात में ही खिलकर महकते हैं। एक टब पानी में इसके 15-20 फूलों के गुच्छे डाल दें और टब को शयन कक्ष में रख दें। कूलर व पंखे की हवा से टब का पानी ठंडा होकर रातरानी की ठंडी-ठंडी खुशबू से महकने लगेगा।

सुबह रातरानी के सुगंधित जल से स्नान कर लें। दिनभर बदन में ताजगी का एहसास रहेगा व पसीने की दुर्गंध से भी छुटकारा मिलेगा। रातरानी की सुगंध से सभी तरह की चिंता, भय, घबराहट आदि सभी मिट जाती है। सुगंध में इसे सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। अधिकतर लोग इसे अपने घर आंगन में इसलिए नहीं लगाते हैं क्योंकि यह सांप को आकर्षित करती है।

गुलाब : गुलाब के इत्र से शायद दुनिया की हर संस्कृति वाकिफ है। गुलाब बहुत ही गुणकारी फूल है, लेकिन केवल देशी गुलाब, जो सिर्फ गुलाबी और लाल रंग का होता है और जो बहुत ही खुशबूदार होता है। गुलाब का इत्र लगाने से देह के संताप मिट जाते हैं।

इन फूलों का गुलकंद गर्मी की कई बीमारियों को शांत करता है। गुलाब जल से आंखों को धोने से आंखों की जलन में आराम मिलता है। गुलाब का इत्र मन को प्रसन्नता देता है। गुलाब का तेल मस्तिष्क को ठंडा रखता है और गुलाब जल का प्रयोग उबटनों और फेस पैक में किया जा सकता है।

चंदन की सुगंध : हम यहां चंदन की अगरबत्ती की सुगंध की बात नहीं कर रहे हैं। पूजन सामग्री वाले के यहां चंदन की एक बट्टी या टुकड़ा मिलता है। उस बट्टी को पत्थर के बने छोटे से गोल चकले पर घिसा जाता है। प्रतिदिन चंदन घिसते रहने से घर में सुगंध का वातावरण निर्मित होता है।

सिर पर चंदन का तिलक लगाने से शांति मिलती है। जिस स्थान पर प्रतिदिन चंदन घीसा जाता है और गरूड़ घंटी की ध्वनि सुनाई देती है, वहां का वातावरण हमेशा शुद्ध और पवित्र बना रहता है। चंदन के प्रकार : हरि चंदन, गोपी चंदन, सफेद चंदन, लाल चंदन, गोमती और गोकुल चंदन।

सीक्रेट : भीनी-भीनी और मनभावन खुशबू वाले चंदन को न सिर्फ इत्र के रूप में प्रयोग किया जाता है बल्कि इसके तेल को गुलाब, चमेली या तुलसी के साथ मिलाकर उपयोग करने से कामेच्छा भी प्रबल होती है। चंदन की तरह की खस की सुगंध भी अति महत्वपूर्ण होती है। हालांकि इन दोनों ही तरह की सुगंध का उपयोग गर्मी में किया जाता है।
[ किन किन लग्नों के लिए कौन कौन से ग्रह मारक होते हैं ?

  • मेष लग्न – शुक्र और बुध
  • वृष लग्न – बृहस्पति और चन्द्र
  • मिथुन लग्न – मंगल और चन्द्र
  • कर्क लग्न – बुध और शनि
  • सिंह लग्न – शनि और बुध
  • कन्या लग्न – मंगल और चन्द्र
  • तुला – बृहस्पति और मंगल
  • वृश्चिक – बुध और शुक्र
  • धनु लग्न – शुक्र और शनि
  • मकर लग्न – चन्द्र और सूर्य
  • कुम्भ लग्न – सूर्य और बृहस्पति
  • मीन लग्न – शुक्र और शनि

ज्योतिष का एक सामान्य नियम है कि जब कोई ग्रह , शुभ हो या अशुभ, किसी भाव में बैठते हैं तो अपनी शुभता या अशुभता उस भाव को प्रदान करते हैं साथ ही वे उस भाव के शुभता या अशुभता को ग्रहण कर लेते हैं । अतः मारक भाव में बैठे शुभ ग्रह उस भाव को शुभता प्रदान करते है जबकि उस भाव का मारकत्व ग्रहण करते है। ऐसे में यदि क्रूर ग्रह मारक स्थान पर वैठ जाएं तो वो भी मारक की भूमिका निभाते है और यदि मृत्यु नही तो मृत्युतुल्य कष्ट तो अपनी दशा/अन्तर्दशा में प्रदान करते ही है।
[: उच्च, नीच, वक्री और अस्त ग्रह
उच्च ग्रह और नीच ग्रह

भारतीय ज्योतिष में 9 ग्रह बताए गए हैं। इसमें 2 छाया ग्रह हैं। सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि ग्रह हैं जो आकाशीय मंडल में दृष्टमान हैं। राहु-केतु छाया ग्रह हैं, जो ग्रह नहीं हैं क्योंकि ये आकाशीय मंडल में दिखाई नहीं देते हैं। सूर्य ग्रहों के राजा हैं तो मंगल सेनापति , शनि न्यायाधीश हैं. शुक्र दानवों और बृहस्पति देवताओं के गुरु हैं। ये सभी ग्रह कभी उच्च-नीच नही होते , केवल ग्रहों की युतियों के कारण शुभ -अशुभ फल प्रदान करते हैं। हर ग्रह अपनी उच्‍च राशि में तीव्रता से परिणाम देता है और नीच राशि में मंदता के साथ। अगर वह ग्रह आपकी कुण्‍डली में अकारक है तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह उच्‍च का है या नीच का।

उच्च ग्रह

नवग्रहों में से प्रत्येक ग्रह को किसी एक राशि विशेष में स्थित होने से अतिरिक्त बल प्राप्त होता है जिसे इस ग्रह की उच्च की राशि कहा जाता है।

नीच ग्रह

इसी तरह अपनी उच्च की राशि से ठीक सातवीं राशि में स्थित होने पर प्रत्येक ग्रह के बल में कमी आ जाती है तथा इस राशि को इस ग्रह की नीच की राशि कहा जाता है। ग्रह कोई भी हो नीच नही होता बस उनका फल शुभ -अशुभ होता है। नीच ग्रह से मतलब शब्द के अर्थ में नहीं होता अपितु उस ग्रह में ताकत कम होती है और वो ग्रह कमजोर होता है। उच्च और नीच ग्रह दो ग्रहों की युतियां होने पर भिन्न भिन्न तत्व की प्रधानता होने से उनके फल शुभ अथवा अशुभ हो जाते हैं। जब दो ग्रहों की युति हो जाती है और दोनों ग्रहो में विपरीत तत्वों की प्रधानता हो तो उसे नीच कहा जाता है।

इस सम्पूर्ण चराचर जगत में दो तत्वों की प्रधानता है -पहला अग्नि और दूसरा वायु। यदि इन दोनों तत्वों के ग्रह एक ही घर या भाव में उपस्थित हो जाते हैं तो वे नीच ग्रह के और जब समान तत्व वाले ग्रह एक ही घर या भाव में आ जाये तो वे उच्च ग्रह के कहलाते हैं। जो ग्रह जिस राशि में उच्च का होगा , उससे सातवीं राशि मे जाकर वह नीच का हो जायेगा।

सूर्य मेष में उच्च, तुला में नीच का होता है। चंद्रमा वृषभ में उच्च, वृश्चिक में नीच, मंगल मकर में उच्च, कर्क में नीच, बुध कन्या में उच्च, मीन में नीच का होता है। गुरु कर्क में उच्च, मकर में नीच, शनि तुला में उच्च, मेष में नीच का होता है। राहु मिथुन मतांतर से, वृषभ में उच्च का धनु मतांतर से वृश्चिक में नीच का होता है। केतु धनु मतांतर से वृश्चिक में उच्च का, मिथुन मतांतर से वृषभ में नीच का होता है।

उच्च राशि में स्थित ग्रह द्वारा सदा शुभ फल देने और अपनी नीच राशि में स्थित ग्रह सदा नीच फल देने की बात प्रचलित है। किंतु यह बात सत्य न होकर एक झूठ से अधिक कुछ नहीं है। ये बात वास्तविकता से बहुत परे है। उच्च या नीच की राशि में ग्रह के होने का संबंध उसके स्वाभाव से ना होकर उसके बल से होता है अर्थार्त वो बलवान है या बलहीन। उसके शुभ या अशुभ होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

कभी-कभी उच्च और नीच ग्रह अपने शाब्दिक अर्थ या स्वभाव से परे प्रभाव देने लगते हैं। बहुत सी कुंडलियों में उच्च राशि में स्थित ग्रह बहुत अशुभ फल दे रहा होता है और अशुभ होने की स्थिति में अधिक बलवान होने के कारण सामान्य से बहुत अधिक हानि करता है। बहुत सी कुंडलियों में नीच राशि में स्थित ग्रह स्वभाव से शुभ फल दे रहा होता है और बलहीन होने के कारण शुभ फलों में कुछ न कुछ कमी रह जाती है। कुंडली में नीच ग्रह के प्रभाव को कम करने के लिए राशि में स्थित शुभ फलदायी ग्रहों के रत्न धारण करने से बहुत लाभ होता है। राशि में शामिल ग्रहों के रत्न धारण करने से अतिरिक्त बल से अधिक बलवान होकर ग्रह अपने शुभ फलों में वृद्धि करने में सक्षम हो जाते हैं।

सभी ग्रहों की अपनी उच्च व नीच राशियां हैं और ग्रहों की अपनी मूलत्रिकोण राशि भी होती है। किसी भी ग्रह की सबसे उत्तम स्थिति उसका अपनी उच्च राशि में होना माना गया है। उसके बाद मूलत्रिकोण राशि में होना उच्च राशि से कुछ कम प्रभाव देता है। यदि ग्रह स्वराशि का है तब मूल त्रिकोण से कुछ कम प्रभावी होगा लेकिन ग्रह की स्थिति तब भी शुभ ही मानी जाती है।

अस्त गृह

जन्म कुंडली का अध्ययन बिना अस्त ग्रहों के अध्ययन के बिना अधूरा है और कुंडली धारक के विषय में की गई कई भविष्यवाणियां गलत हो सकती हैं। जन्म कुंडली में अस्त ग्रहों का अपना एक विशेष महत्व होता है। आकाश मंडल में कोई भी ग्रह जब सूर्य से एक निश्चित दूरी के अंदर आ जाता है तो सूर्य के तेज से वह ग्रह अपनी आभा तथा शक्ति खोने लगता है जिसके कारण वह आकाश मंडल में दिखाई देना बंद हो जाता है तथा इस ग्रह को अस्त ग्रह का नाम दिया जाता है। किसी भी ग्रह के अस्त हो जाने की स्थिति में उसके बल में कमी आ जाती है तथा वह किसी कुंडली में सुचारू रुप से कार्य करने में सक्षम नहीं रह जाता। किसी भी अस्त ग्रह की बलहीनता का सही अनुमान लगाने के लिए उस ग्रह का किसी कुंडली में स्थिति के कारण बल, सूर्य का उसी कुंडली विशेष में बल तथा अस्त ग्रह की सूर्य से दूरी देखना आवश्यक होता है।

जिस मापदंड से हर ग्रह की सूर्य से समीपता नापी जाती है वो डिग्रियों में मापी जाती है। इस मापदंड के अनुसार हर ग्रह सूर्य से निश्चित दूरी पर आते ही अस्त हो जाता है। आइये जाने सूर्य से कब-कब अस्त होते हैं ग्रह:

• चन्द्रमा सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
• गुरू सूर्य के दोनों ओर 11 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
• शुक्र सूर्य के दोनों ओर 10 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। किन्तु यदि शुक्र अपनी सामान्य गति की बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हों तो वह सूर्य के दोनों ओर 8 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
• बुध सूर्य के दोनों ओर 14 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं। किन्तु यदि बुध अपनी सामान्य गति की बनिस्पत वक्र गति से चल रहे हों तो वह सूर्य के दोनों ओर 12 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
• शनि सूर्य के दोनों ओर 15 डिग्री या इससे अधिक समीप आने पर अस्त माने जाते हैं।
• राहु-केतु छाया ग्रह होने के कारण कभी भी अस्त नहीं होते।

अस्त ग्रह का प्रभाव कैसे कम करे :

अस्त ग्रहों को सुचारू रूप से चलने के लिए अतिरिक्त बल की आवश्यकता होती है तथा कुंडली में किसी अस्त ग्रह का स्वभाव देखने के बाद ही यह निर्णय किया जाता है कि उस अस्त ग्रह को अतिरिक्त बल कैसे प्रदान किया जा सकता है।

• यदि किसी कुंडली में कोई ग्रह अस्त है और स्वभाव से उसका फल शुभ है तो उसे अतिरिक्त बल प्रदान करना चाहिए। अतिरिक्त बल देने का सबसे आसान तथा प्रभावशाली उपाय है रत्न धारण करना। कुंडली धारक को उस ग्रह विशेष का रत्न धारण करवा देने से ग्रह को अतिरिक्त बल मिल जाता है।

• यदि किसी कुंडली में कोई ग्रह अस्त है और स्वभाव से उसका फल अशुभ है तो उसे अतिरिक्त बल प्रदान करना चाहिए। बल देने के लिए रत्न का प्रयोग सर्वथा वर्जित है भले ही वह ग्रह कितना भी बलहीन हो। अतिरिक्त बल देने का सबसे आसान तथा प्रभावशाली उपाय है उस ग्रह का मंत्र जपना-बीज मंत्र अथवा वेद मंत्र । उस ग्रह के मंत्र का निरंतर जाप करने से या उस ग्रह के मंत्र से पूजा करवाने से ग्रह को अतिरिक्त बल तो मिलता है और साथ ही साथ उसके स्वभाव में भी परिवर्तन आता है। उसका स्वभाव अशुभ से शुभ फल हो जाता है।

वक्री ग्रह

वक्री ग्रहों को लेकर कई धारणायें है लेकिन लगभग हर दूसरे व्यक्ति की जन्म कुंडली में एक या इससे अधिक वक्री ग्रह पाये जाते हैं। समस्त ग्रह घड़ी की सुई की विपरीत दशा में सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं, किन्तु कभी-कभी देखने पर इनकी गति विपरीत दिशा में अर्थात पश्चिम से पूर्व प्रतीत होती है जिसे ग्रह की वक्री अवस्था कहते हैं | कोई भी ग्रह विशेष जब अपनी सामान्य दिशा की बजाए उल्टी दिशा यानि विपरीत दिशा में चलना शुरू कर देता है तो ऐसे ग्रह की इस गति को वक्र गति कहा जाता है तथा वक्र गति से चलने वाले ऐसे ग्रह विशेष को वक्री ग्रह कहा जाता है। इस वक्री अवस्था के कारण ही ग्रहों का परिभ्रमण पथ (कक्षा) पूर्णरुपेण वृत्ताकार न होकर अंडाकार होता है जिसके कारण इनकी पृथ्वी से दूरी परिवर्तित होती रहती है |

उदाहरण के लिए शनि यदि अपनी सामान्य गति से कन्या राशि में भ्रमण कर रहे हैं तो इसका अर्थ यह होता है कि शनि कन्या से तुला राशि की तरफ जा रहे हैं, किन्तु वक्री होने की स्थिति में शनि उल्टी दिशा में चलना शुरू कर देते हैं अर्थात शनि कन्या से तुला राशि की ओर न चलते हुए कन्या राशि से सिंह राशि की ओर चलना शुरू कर देते हैं और जैसे ही शनि का वक्र दिशा में चलने का यह समय काल समाप्त हो जाता है, वे पुन: अपनी सामान्य गति और दिशा में कन्या राशि से तुला राशि की तरफ चलना शुरू कर देते हैं। वक्र दिशा में चलने वाले अर्थात वक्री होने वाले बाकी के सभी ग्रह भी इसी तरह का व्यवहार करते हैं।

वक्री ग्रहों के प्रभाव

वक्री ग्रहों के प्रभाव बिल्कुल सामान्य गति से चलने वाले ग्रहों की तरह ही होते हैं तथा उनमें कुछ भी अंतर नहीं आता। नवग्रहों में सूर्य तथा चन्द्र सदा सामान्य दिशा में ही चलते हैं तथा यह दोनों ग्रह कभी भी वक्री नहीं होते। इनके अतिरिक्त राहु-केतु सदा उल्टी दिशा में ही चलते हैं अर्थात हमेशा ही वक्री रहते हैं। इसलिए सूर्य-चन्द्र तथा राहु-केतु के फल तथा व्यवहार सदा सामान्य ही रहते हैं तथा इनमें कोई अंतर नहीं आता।

हर ग्रह सामान्य से उल्टी दिशा में भ्रमण करने में सक्षम नहीं होता इसलिए केवल सामान्य दिशा में ही भ्रमण करता है। अधिकतर मामलों में किसी ग्रह के वक्री होने से कुंडली में उसके शुभ या अशुभ होने की स्थिति में कोई फर्क नही पड़ता अर्थात सामान्य स्थिति में किसी कुंडली में शुभ फल प्रदान करने वाला ग्रह वक्री होने की स्थिति में भी शुभ फल ही प्रदान करेगा तथा सामान्य स्थिति में किसी कुंडली में अशुभ फल प्रदान करने वाला ग्रह वक्री होने की स्थिति में भी अशुभ फल ही प्रदान करेगा। अधिकतर मामलों में ग्रह के वक्री होने की स्थिति में उसके स्वभाव में कोई फर्क नहीं आता किन्तु उसके व्यवहार में कुछ बदलाव अवश्य आ जाते हैं।

वक्री ग्रह को लेकर विभिन्न धारणाएं

• वक्री ग्रह उल्टी दिशा में चलने के कारण किसी भी कुंडली में सदा अशुभ फल ही प्रदान करते हैं।
• वक्री ग्रह किसी कुंडली विशेष में स्वभाव से विपरीत आचरण करते हैं। किसी कुंडली में सामान्य रूप से शुभ फल देने वाला ग्रह वक्री होने की स्थिति में अशुभ फल देना शुरू कर देता है या फिर अगर किसी कुंडली में सामान्य रूप से अशुभ फल देने वाला वक्री होने की स्थिति में शुभ फल देना शुरू कर देता है। वक्री ग्रह उल्टी दिशा में चलने के कारन कुंडली में शुभ या अशुभ का प्रभाव भी उल्टा कर देता है।
• अगर कोई ग्रह अपनी उच्च की राशि में स्थित होने पर वक्री हो जाता है तो उसके फल अशुभ हो जाते हैं तथा यदि कोई ग्रह अपनी नीच की राशि में वक्री हो जाता है तो उसके फल शुभ हो जाते हैं।
• प्रत्येक ग्रह केवल सामान्य दिशा में ही भ्रमण करता है तथा कोई भी ग्रह सामान्य से उल्टी दिशा में भ्रमण करने में सक्षम नहीं होता इसलिए वक्री ग्रहों के प्रभाव बिल्कुल सामान्य गति से चलने वाले ग्रहों की तरह ही होते हैं तथा उनमें कुछ भी अंतर नहीं आता।
बंधन अर्थात्‌ बांधना। जिस प्रकार रस्सी से बांध देने से व्यक्ति असहाय हो कर कुछ कर नहीं पाता, उसी प्रकार किसी व्यक्ति, घर, परिवार, व्यापार आदि को तंत्र-मंत्र आदि द्वारा अदृश्य रूप से बांध दिया जाए तो उसकी प्रगति रुक जाती है और घर परिवार की सुख शांति बाधित हो जाती है। ये बंधन क्या हैं और इनसे मुक्ति कैसे पाई जा सकती है जानने केलिए पढ़िए यह आलेख…
मानव अति संवेदनशील प्राणी है। प्रकृति और भगवान हर कदम पर हमारी मदद करते हैं। आवश्यकता हमें सजग रहने की है। हम अपनी दिनचर्या में अपने आस-पास होने वाली घटनाओं पर नजर रखें और मनन करें। यहां बंधन के कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं।
किसी के घर में ८-१० माह का छोटा बच्चा है। वह अपनी सहज बाल हरकतों से सारे परिवार का मन मोह रहा है। वह खुश है, किलकारियां मार रहा है। अचानक वह सुस्त या निढाल हो जाता है। उसकी हंसी बंद हो जाती है। वह बिना कारण के रोना शुरू कर देता है, दूध पीना छोड़ देता है। बस रोता और चिड़चिड़ाता ही रहता है। हमारे मन में अनायास ही प्रश्न आएगा कि ऐसा क्यों हुआ?
किसी व्यवसायी की फैक्ट्री या व्यापार बहुत अच्छा चल रहा है। लोग उसके व्यापार की तरक्की का उदाहरण देते हैं। अचानक उसके व्यापार में नित नई परेशानियां आने लगती हैं। मशीन और मजदूर की समस्या उत्पन्न हो जाती है। जो फैक्ट्री कल तक फायदे में थी, अचानक घाटे की स्थिति में आ जाती है। व्यवसायी की फैक्ट्री उसे कमा कर देने के स्थान पर उसे खाने लग गई। हम सोचेंगे ही कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
किसी परिवार का सबसे जिम्मेदार और समझदार व्यक्ति, जो उस परिवार का तारणहार है, समस्त परिवार की धुरी उस व्यक्ति के आस-पास ही घूम रही है, अचानक बिना किसी कारण के उखड़ जाता है। बिना कारण के घर में अनावश्यक कलह करना शुरू कर देता है। कल तक की उसकी सारी समझदारी और जिम्मेदारी पता नहीं कहां चली जाती है। वह परिवार की चिंता बन जाता है। आखिर ऐसा क्यों हो गया?
कोई परिवार संपन्न है। बच्चे ऐश्वर्यवान, विद्यावान व सर्वगुण संपन्न हैं। उनकी सज्जनता का उदाहरण सारा समाज देता है। बच्चे शादी के योग्य हो गए हैं, फिर भी उनकी शादी में अनावश्यक रुकावटें आने लगती हैं। ऐसा क्यों होता है?
आपके पड़ोस के एक परिवार में पति-पत्नी में अथाह प्रेम है। दोनों एक दूसरे के लिए पूर्ण समर्पित हैं। आपस में एक दूसरे का सम्मान करते हैं। अचानक उनमें कटुता व तनाव उत्पन्न हो जाता है। जो पति-पत्नी कल तक एक दूसरे के लिए पूर्ण सम्मान रखते थे, आज उनमें झगड़ा हो गया है। स्थिति तलाक की आ गई है। आखिर ऐसा क्यों हुआ?
हमारे घर के पास हरा भरा फल-फूलों से लदा पेड़ है। पक्षी उसमें चहचहा रहे हैं। इस वृक्ष से हमें अच्छी छाया और हवा मिल रही है। अचानक वह पेड़ बिना किसी कारण के जड़ से ही सूख जाता है। निश्चय ही हमें भय की अनुभूति होगी और मन में यह प्रश्न उठेगा कि ऐसा क्यों हुआ?
हमें अक्सर बहुत से ऐसे प्रसंग मिल जाएंगे जो हमारी और हमारे आसपास की व्यवस्था को झकझोर रहे होंगे, जिनमें ‘क्यों” की स्थिति उत्पन्न होगी।
विज्ञान ने एक नियम प्रतिपादित किया है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। हमें निश्चय ही मनन करना होगा कि उपर्युक्त घटनाएं जो हमारे आसपास घटित हो रही हैं, वे किन क्रियाओं की प्रतिक्रियाएं हैं? हमें यह भी मानना होगा कि विज्ञान की एक निश्चित सीमा है। अगर हम परावैज्ञानिक आधार पर इन घटनाओं को विस्तृत रूप से देखें तो हम निश्चय ही यह सोचने पर विवश होंगे कि कहीं यह बंधन या स्तंभन की परिणति तो नहीं है ! यह आवश्यक नहीं है कि यह किसी तांत्रिक अभिचार के कारण हो रहा हो। यह स्थिति हमारी कमजोर ग्रह स्थितियों व गण के कारण भी उत्पन्न हो जाया करती है। हम भिन्न श्रेणियों के अंतर्गत इसका विश्लेषण कर सकते हैं। इनके अलग-अलग लक्षण हैं। इन लक्षणों और उनके निवारण का संक्षेप में वर्णन यहां प्रस्तुत है।

कार्यक्षेत्र का बंधन, स्तंभन या रूकावटें

दुकान/फैक्ट्री/कार्यस्थल की बाधाओं के लक्षण :- किसी दुकान या फैक्ट्री के मालिक का दुकान या फैक्ट्री में मन नहीं लगना। ग्राहकों की संख्या में कमी आना। आए हुए ग्राहकों से मालिक का अनावश्यक तर्क-वितर्क-कुतर्क और कलह करना। श्रमिकों व मशीनरी से संबंधित परेशानियां। मालिक को दुकान में अनावश्यक शारीरिक व मानसिक भारीपन रहना। दुकान या फैक्ट्री जाने की इच्छा न करना। तालेबंदी की नौबत आना। दुकान ही मालिक को खाने लगे और अंत में दुकान बेचने पर भी नहीं बिके।
कार्यालय बंधन के लक्षण :- कार्यालय बराबर नहीं जाना। साथियों से अनावश्यक तकरार। कार्यालय में मन नहीं लगना। कार्यालय और घर के रास्ते में शरीर में भारीपन व दर्द की शिकायत होना। कार्यालय में बिना
गलती के भी अपमानित होना

घर-परिवार में बाधा के लक्षण

परिवार में अशांति और कलह। बनते काम का ऐन वक्त पर बिगड़ना। आर्थिक परेशानियां। योग्य और होनहार बच्चों के रिश्तों में अनावश्यक अड़चन। विषय विशेष पर परिवार के सदस्यों का एकमत न होकर अन्य मुद्दों पर कुतर्क करके आपस में कलह कर विषय से भटक जाना। परिवार का कोई न कोई सदस्य शारीरिक दर्द, अवसाद, चिड़चिड़ेपन एवं निराशा का शिकार रहता हो। घर के मुख्य द्वार पर अनावश्यक गंदगी रहना। इष्ट की अगरबत्तियां बीच में ही बुझ जाना। भरपूर घी, तेल, बत्ती रहने के बाद भी इष्ट का दीपक बुझना या खंडित होना। पूजा या खाने के समय घर में कलह की स्थिति बनना।

व्यक्ति विशेष का बंधन

हर कार्य में विफलता। हर कदम पर अपमान। दिल और दिमाग का काम नहीं करना। घर में रहे तो बाहर की और बाहर रहे तो घर की सोचना। शरीर में दर्द होना और दर्द खत्म होने के बाद गला सूखना।सर का भारी रहना |घर बाहर हर स्थान पर उद्विग्नता |स्त्रियों की संतान न होना ,अपमान होना |संतान का गर्भ में ही क्षय अथवा गर्भ ही न ठहरना |आय होने पर भी पता न चलना की धन गया कहाँ |अनावश्यक शारीरिक कष्ट |मन चिडचिडा होना |निर्णयों का गलत होना |हानि और पराजय

हमें मानना होगा कि भगवान दयालु है। हम सोते हैं पर हमारा भगवान जागता रहता है। वह हमारी रक्षा करता है। जाग्रत अवस्था में तो वह उपर्युक्त लक्षणों द्वारा हमें बाधाओं आदि का ज्ञान करवाता ही है, निद्रावस्था में भी स्वप्न के माध्यम से संकेत प्रदान कर हमारी मदद करता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम होश व मानसिक संतुलन बनाए रखें। हम किसी भी प्रतिकूल स्थिति में अपने विवेक व अपने इष्ट की आस्था को न खोएं, क्योंकि विवेक से बड़ा कोई साथी और भगवान से बड़ा कोई मददगार नहीं है। इन बाधाओं के निवारण हेतु हम निम्नांकित उपाय कर सकते हैं

उपाय

पूजा एवं भोजन के समय कलह की स्थिति बनने पर घर के पूजा स्थल की नियमित सफाई करें और मंदिर में नियमित दीप जलाकर पूजा करें। एक मुट्ठी नमक पूजा स्थल से वार कर बाहर फेंकें, पूजा नियमित होनी चाहिए। इष्ट पर आस्था और विश्वास रखें। स्वयं की साधना पर ज्यादा ध्यान दें। गलतियों के लिये इष्ट से क्षमा मांगें। इष्ट को जल अर्पित करके घर में उसका नित्य छिड़काव करें। जिस पानी से घर में पोछा लगता है, उसमें थोड़ा नमक डालें। कार्य क्षेत्र पर नित्य शाम को नमक छिड़क कर प्रातः झाडू से साफ करें। घर और कार्यक्षेत्र के मुख्य द्वार को साफ रखें। हिंदू धर्मावलंबी हैं, तो गुग्गुल की और मुस्लिम धर्मावलम्बी हैं, तो लोबान की धूप दें।
व्यक्तिगत बाधा निवारण के लिए
————————————— व्यक्तिगत बाधा के लिए एक मुट्ठी पिसा हुआ नमक लेकर शाम को अपने सिर के ऊपर से तीन बार उतार लें और उसे दरवाजे के बाहर फेंकें। ऐसा तीन दिन लगातार करें। यदि आराम न मिले तो नमक को सिर के ऊपर वार कर शौचालय में डालकर फ्लश चला दें। निश्चित रूप से लाभ मिलेगा। हमारी या हमारे परिवार के किसी भी सदस्य की ग्रह स्थिति थोड़ी सी भी अनुकूल होगी तो हमें निश्चय ही इन उपायों से भरपूर लाभ मिलेगा। अपने पूर्वजों की नियमित पूजा करें। प्रति माह अमावस्या को प्रातःकाल ५ गायों को फल खिलाएं

गृह बाधा की शांति के लिए पश्चिमाभिमुख होकर ॐ नमः शिवाय मंत्र का २१ बार या २१ माला श्रद्धापूर्वक जप करें। यदि बीमारी का पता नहीं चल पा रहा हो और व्यक्ति स्वस्थ भी नहीं हो पा रहा हो, तो सात प्रकार के अनाज एक-एक मुट्ठी लेकर पानी में उबाल कर छान लें। छने व उबले अनाज (बाकले) में एक तोला सिंदूर की पुड़िया और ५० ग्राम तिल का तेल डाल कर कीकर (देसी बबूल) की जड़ में डालें या किसी भी रविवार को दोपहर १२ बजे भैरव स्थल पर चढ़ा दें। बदन दर्द हो, तो मंगलवार को हनुमान जी के चरणों में सिक्का चढ़ाकर उसमें लगी सिंदूर का तिलक करें। पानी पीते समय यदि गिलास में पानी बच जाए, तो उसे अनादर के साथ फेंकें नहीं, गिलास में ही रहने दें। फेंकने से मानसिक अशांति होगी क्योंकि पानी चंद्रमा का कारक है

विशेष

उपरोक्त समस्त उपाय सामान्य उपाय और टोटके हैं जो टोटकों द्वारा उत्पन्न की गई बंधन को रोक अथवा हटा सकते हैं ,किन्तु यदि टोना अथवा अनुष्ठान करके बंधन किया गया है तो यह सामान्य टोटके उसे नहीं हटा सकते |आप विभिन्न टोटके कर चुके हों और लाभ न मिला हो तो किसी अच्छे और योग्य तांत्रिक से संपर्क करना चाहिए और उसके बताये उपाय करने चाहिए अथवा उसके द्वारा बंधन हटवाना चाहिए |साथ ही आपको बगलामुखी ,काली जैसी उग्र शक्तियों के यन्त्र कवच धारण करने चाहिए जिससे बंधन का प्रभाव रुके अथवा हटे |आपके शरीर को बंधन प्रभावित न करे और आप कम से कम किसी प्रभाव से मुक्त रहकर कार्य कर सके |घर का बंधना हटाने के लिए या प्रतिष्ठान का बंधन हटाने के लिए तो विशेष प्रयास ही करने होंगे
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“संसार में दो प्रकार के वृक्ष हैं..

एक वो जो अपना फल स्वयं दे देते हैं जैसे आम, अमरुद, केला इत्यादि।

दूसरे वो जो अपना फल छिपाकर रखते हैं – जैसे आलू, अदरक, प्याज इत्यादि।

जो अपना फल अपने आप दे देते हैं उन वृक्षों को सभी खाद-पानी देकर सुरक्षित रखते हैं किन्तु जो अपना फल छिपाकर रखते है, वे जड़ सहित खोद लिए जाते हैं।

ठीक इसी प्रकार जो अपनी विद्या, धन, शक्ति स्वयं ही समाज सेवा में, समाज के उत्थान में लगा देते हैं, उनको सभी मान-सम्मान देते है, किन्तु जो अपनी विद्या, धन, शक्ति स्वार्थवश छिपाकर रखते हैं, किसी की सहायता नही करते है वे जड़ सहित खोद लिए जाते हैं, अर्थात् समय रहते ही भुला दिये जाते है।”
जय श्री कृष्णा🙏🙏
[ 🌹🌹वास्तु टिप्स 🌹🌹
ध्यान दीजिये——-

यदि आपके मकान के किसी भी कोने में दोष हो,तो वहां शंख बजाना चाहीये, दोष निवारण होगा।।

.• घर में दुध वाले वृक्ष से गृहस्वामी फेफडे एवं किडनी के रोग से ग्रस्त होते है ।

.• घर में बंद पडी घडी भाग्य को अवरुद्ध करती है ।

.• पूजा स्थल में सुबह शाम दीपक जलाना सौभाग्य वर्धक है ।

.• पलंग के नीचे सामान या चप्पल रखने से ऊर्जा का बहाव अधिक होता है ।

.• ओफिस में पीठ के पीछे पुस्तक की अलमारी न रखे ।

.• मुकदमे या विवाह से संबंघित फाईल तिजोरी या लोकर में न रखे ।

.• पूजा स्थल के उपर कोई भी वस्तु न रखे ।

.• पूर्वज के चित्र पूजा कक्ष में रखने से घर में क्लेश एवं रोग होता है ।

.• घर में पूर्वज के चित्र नैऋत्य कोने या पश्चिम में रखे ।

• प्रस्थान के वक्त जुत्ते-चप्पल का नाम लेना अशुभ है ।

.• तुटा हुआ दर्पण ( आयना ) घर में न रखे ।

.• बेड रुम में डबल बेड पर दो अलग-अलग गद्दे रखने से तनाव एवं दंपति में दरार पडती है

.• बीम के नीचे डाईनींग टेबल रखने से उधार रकम वापस नही आती ।

.• शयन कक्ष में जल तथा दर्पण अशुभ है ।

.• छत पर उल्टा मटका रखने से राहु ग्रह कुपित होता है परेशानी आती है ।

.• भारी अलमारी या फर्निचर घर में दक्षिण या पश्चिम में रखे

.• शयनकक्ष, रसोई गृह एवं भोजन कक्ष बीम रहित होना चाहिए ।

.• तेजस्वी संतान प्राप्ति के इच्छुक दंपत्ति को एक थाली में भोजन नही करना ।

.उत्तर या पूर्व दिशा की ओर तिजोरी का पल्ला खुलना सबसे उत्तम है I

.• किसीभी कक्ष या शयन कक्ष में दरवाजे के पीछे कपडे आदि कुछ भी लटकाना नही चाहीये ।

.• सीढीयों के नीचे बैठकर कोइ भी काम न करे ।

.• प्रत्येक रविवार को बच्चों को दूध-रोटी और शक्कर अलग अलग या मिलाकर खिलाने से मेघा शक्ति बढती है

.• मुकदमा–विवाद या झघडे के कागजात उत्तर, पूर्व या ईशान दिशामें रखने से फैसले जल्दी आते है ।

.• शयन कक्ष में झुठे बर्तन रखने से कारोबार में कमी आती है और कर्ज बढता है ।

.• ईशान कोने में कचरा जमा होता है, तो शत्रु वृद्धि होती है ।

.• इशान कोने में वजन रखना अशुभ है एवं नैऋत्यमें जितना भार हो उतना अच्छा है ।

.• रसोई घरमें पूजा स्थान रखने से गृह स्वामी धोखा खाता है ।

.• नये बर्तनो को घर पर खाली नही ले जाना, फल-फुल या मिठाइयां डालना, कुछ न हो तो सिक्के डालकर ले आनI

.• दो अंगुली से पकडकर नोट लेना अशुभ है, लेन-देन पांचो अंगुलीओ से करनी चाहीए ।

.• कार्यालय या ओफिस में आगन्तुको की कुर्सीयो से अपनी कुर्सी कुछ उंची रखे ।

.• हंमेशा शिकायत करने से – रोने से घर में हानिकारक नकारात्मक उर्जा पैदा होती है

.• घरकी देहली के अंदर खडे रहकर दान देना चाहिये ।

.• स्नान कीये बिना दुकान नही जाना चाहीये ।

.• किसी भी शुभ चोघडीये में पीसी गई हल्दी में गंगा-जल मिलाकर मुख्य द्वार के दोनो तरफ ॐ बनाने से अनर्थ संभावना समाप्त हो जाती हैI

.• ईशान या उत्तर में तुलसी का पौधा लगाने से उधारी दूर होती है

.• धन प्राप्त करना हो तो दरवाजो को पैर से खोल-बंध न करे ।

.• शीशम के पन्नो को (पत्ते) सिरहाने रखने से स्वप्न दोष समाप्त हो जाता है ।

.• बुधवार को पुस्तक उधार देना नही चाहिये ।

.• दो दर्पण आमने सामने नही रखने चाहिये ।

.• अनजाने कुत्ते का पीछे आना शुभ सूचक है ।

.• चाय देते समय केतली या जग की नली महेमानो की तरफ रखने से आपस में गलतफहमी हो जाती है ।

.• नूतन घर में पुराना झाडु ले जाना अशुभ है ।

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Vyayam Slokas(व्यायाम श्लोक)

व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखं। आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम् ॥

भावार्थ :

व्यायाम से स्वास्थ्य, लम्बी आयु, बल और सुख की प्राप्ति होती है। निरोगी होना परम भाग्य है और स्वास्थ्य से अन्य सभी कार्य सिद्ध होते हैं ।


व्यायामं कुर्वतो नित्यं विरुद्धमपि भोजनम् । विदग्धमविदग्धं वा निर्दोषं परिपच्यते ॥

भावार्थ :

व्यायाम करने वाला मनुष्य गरिष्ठ, जला हुआ अथवा कच्चा किसी प्रकार का भी खराब भोजन क्यों न हो, चाहे उसकी प्रकृति के भी विरुद्ध हो, भलीभांति पचा जाता है और कुछ भी हानि नहीं पहुंचाता ।


शरीरोपचयः कान्तिर्गात्राणां सुविभक्तता । दीप्ताग्नित्वमनालस्यं स्थिरत्वं लाघवं मृजा ॥

भावार्थ :

व्यायाम से शरीर बढ़ता है । शरीर की कान्ति वा सुन्दरता बढ़ती है । शरीर के सब अंग सुड़ौल होते हैं । पाचनशक्ति बढ़ती है । आलस्य दूर भागता है । शरीर दृढ़ और हल्का होकर स्फूर्ति आती है । तीनों दोषों की (मृजा) शुद्धि होती है।


न चैनं सहसाक्रम्य जरा समधिरोहति । स्थिरीभवति मांसं च व्यायामाभिरतस्य च ॥

भावार्थ :

व्यायामी मनुष्य पर बुढ़ापा सहसा आक्रमण नहीं करता, व्यायामी पुरुष का शरीर और हाड़ मांस सब स्थिर होते हैं ।


श्रमक्लमपिपासोष्णशीतादीनां सहिष्णुता । आरोग्यं चापि परमं व्यायामदुपजायते ॥

भावार्थ :

श्रम थकावट ग्लानि (दुःख) प्यास शीत (जाड़ा) उष्णता (गर्मी) आदि सहने की शक्ति व्यायाम से ही आती है और परम आरोग्य अर्थात् स्वास्थ्य की प्राप्ति भी व्यायाम से ही होती है ।


न चास्ति सदृशं तेन किंचित्स्थौल्यापकर्षणम् । न च व्यायामिनं मर्त्यमर्दयन्त्यरयो भयात् ॥

भावार्थ :

अधिक स्थूलता को दूर करने के लिए व्यायाम से बढ़कर कोई और औषधि नहीं है, व्यायामी मनुष्य से उसके शत्रु सर्वदा डरते हैं और उसे दुःख नहीं देते ।


समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः । प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ॥

भावार्थ :

जिस मनुष्य के दोष वात, पित्त और कफ, अग्नि (जठराग्नि), रसादि सात धातु, सम अवस्था में तथा स्थिर रहते हैं, मल मूत्रादि की क्रिया ठीक होती है और शरीर की सब क्रियायें समान और उचित हैं, और जिसके मन इन्द्रिय और आत्मा प्रसन्न रहें वह मनुष्य स्वस्थ है ।


[ भगवान शिव ने मातापार्वती को बताए थे जीवन के ये पांच रहस्य, आप भी जानिए!!!!!

भगवान शिव ने देवी पार्वती को समय-समय पर कई ज्ञान की बातें बताई हैं। जिनमें मनुष्य के सामाजिक जीवन से लेकर पारिवारिक और वैवाहिक जीवन की बातें शामिल हैं। भगवान शिव ने देवी पार्वती को 5 ऐसी बातें बताई थीं जो हर मनुष्य के लिए उपयोगी हैं, जिन्हें जानकर उनका पालन हर किसी को करना ही चाहिए-

  1. क्या है सबसे बड़ा धर्म और सबसे बड़ा पाप
    देवी पार्वती के पूछने पर भगवान शिव ने उन्हें मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा धर्म और अधर्म मानी जाने वाली बात के बारे में बताया है। भगवान शंकर कहते है-

श्लोक- नास्ति सत्यात् परो नानृतात् पातकं परम्।।

अर्थात- मनुष्य के लिए सबसे बड़ा धर्म है सत्य बोलना या सत्य का साथ देना और सबसे बड़ा अधर्म है असत्य बोलना या उसका साथ देना।

इसलिए हर किसी को अपने मन, अपनी बातें और अपने कामों से हमेशा उन्हीं को शामिल करना चाहिए, जिनमें सच्चाई हो, क्योंकि इससे बड़ा कोई धर्म है ही नहीं। असत्य कहना या किसी भी तरह से झूठ का साथ देना मनुष्य की बर्बादी का कारण बन सकता है।

  1. काम करने के साथ इस एक और बात का रखें ध्यान,,,,,
    श्लोक- आत्मसाक्षी भवेन्नित्यमात्मनुस्तु शुभाशुभे।

अर्थात- मनुष्य को अपने हर काम का साक्षी यानी गवाह खुद ही बनना चाहिए, चाहे फिर वह अच्छा काम करे या बुरा। उसे कभी भी ये नहीं सोचना चाहिए कि उसके कर्मों को कोई नहीं देख रहा है।

कई लोगों के मन में गलत काम करते समय यही भाव मन में होता है कि उन्हें कोई नहीं देख रहा और इसी वजह से वे बिना किसी भी डर के पाप कर्म करते जाते हैं, लेकिन सच्चाई कुछ और ही होती है। मनुष्य अपने सभी कर्मों का साक्षी खुद ही होता है। अगर मनुष्य हमेशा यह एक भाव मन में रखेगा तो वह कोई भी पाप कर्म करने से खुद ही खुद को रोक लेगा।

  1. कभी न करें ये तीन काम करने की इच्छा,,,,,

श्लोक-मनसा कर्मणा वाचा न च काड्क्षेत पातकम्।

अर्थात- आगे भगवान शिव कहते है कि- किसी भी मनुष्य को मन, वाणी और कर्मों से पाप करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि मनुष्य जैसा काम करता है, उसे वैसा फल भोगना ही पड़ता है।

यानि मनुष्य को अपने मन में ऐसी कोई बात नहीं आने देना चाहिए, जो धर्म-ग्रंथों के अनुसार पाप मानी जाए। न अपने मुंह से कोई ऐसी बात निकालनी चाहिए और न ही ऐसा कोई काम करना चाहिए, जिससे दूसरों को कोई परेशानी या दुख पहुंचे। पाप कर्म करने से मनुष्य को न सिर्फ जीवित होते हुए इसके परिणाम भोगना पड़ते हैं बल्कि मारने के बाद नरक में भी यातनाएं झेलना पड़ती हैं।

  1. सफल होने के लिए ध्यान रखें ये एक बात
    संसार में हर मनुष्य को किसी न किसी मनुष्य, वस्तु या परिस्थित से आसक्ति यानि लगाव होता ही है। लगाव और मोह का ऐसा जाल होता है, जिससे छूट पाना बहुत ही मुश्किल होता है। इससे छुटकारा पाए बिना मनुष्य की सफलता मुमकिन नहीं होती, इसलिए भगवान शिव ने इससे बचने का एक उपाय बताया है।

श्लोक-दोषदर्शी भवेत्तत्र यत्र स्नेहः प्रवर्तते। अनिष्टेनान्वितं पश्चेद् यथा क्षिप्रं विरज्यते।।

अर्थात- भगवान शिव कहते हैं कि- मनुष्य को जिस भी व्यक्ति या परिस्थित से लगाव हो रहा हो, जो कि उसकी सफलता में रुकावट बन रही हो, मनुष्य को उसमें दोष ढूंढ़ना शुरू कर देना चाहिए। सोचना चाहिए कि यह कुछ पल का लगाव हमारी सफलता का बाधक बन रहा है। ऐसा करने से धीरे-धीरे मनुष्य लगाव और मोह के जाल से छूट जाएगा और अपने सभी कामों में सफलता पाने लगेगा।

  1. यह एक बात समझ लेंगे तो नहीं करना पड़ेगा दुखों का सामना,,,,,
    श्लोक-नास्ति तृष्णासमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्।
    सर्वान् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते।।

अर्थात- आगे भगवान शिव मनुष्यो को एक चेतावनी देते हुए कहते हैं कि- मनुष्य की तृष्णा यानि इच्छाओं से बड़ा कोई दुःख नहीं होता और इन्हें छोड़ देने से बड़ा कोई सुख नहीं है।

मनुष्य का अपने मन पर वश नहीं होता। हर किसी के मन में कई अनावश्यक इच्छाएं होती हैं और यही इच्छाएं मनुष्य के दुःखों का कारण बनती हैं। जरुरी है कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं में अंतर समझे और फिर अनावश्यक इच्छाओं का त्याग करके शांत मन से जीवन बिताएं।

शिवोहम 🚩🙋🏻‍♂🙏
[हनुमान जी के पाठ से करें अपनी सभी समस्याओं का हल
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हनुमानजी की प्रार्थना में तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमान बहुक आदि अनेक स्तोत्र लिखे, लेकिन हनुमानजी की पहली स्तुति किसने की थी? तुलसीदासजी के पहले भी कई संतों और साधुओं ने हनुमानजी की श्रद्धा में स्तुति लिखी है। लेकिन क्या आप जानते हैं सबसे पहले हनुमानजी की स्तुति किसने की थी?

जब हनुमानजी लंका का दहन कर रहे थे तब उन्होंने अशोक वाटिका को इसलिए नहीं जलाया, क्योंकि वहां सीताजी को रखा गया था। दूसरी ओर उन्होंने विभीषण का भवन इसलिए नहीं जलाया, क्योंकि विभीषण के भवन के द्वार पर तुलसी का पौधा लगा था। भगवान विष्णु का पावन चिह्न शंख, चक्र और गदा भी बना हुआ था। सबसे सुखद तो यह कि उनके घर के ऊपर ‘राम’ नाम अंकित था। यह देखकर हनुमानजी ने उनके भवन को नहीं जलाया।

विभीषण के शरण याचना करने पर सुग्रीव ने श्रीराम से उसे शत्रु का भाई व दुष्ट बताकर उनके प्रति आशंका प्रकट की और उसे पकड़कर दंड देने का सुझाव दिया। हनुमानजी ने उन्हें दुष्ट की बजाय शिष्ट बताकर शरणागति देने की वकालत की। इस पर श्रीरामजी ने विभीषण को शरणागति न देने के सुग्रीव के प्रस्ताव को अनुचित बताया और हनुमानजी से कहा कि आपका विभीषण को शरण देना तो ठीक है किंतु उसे शिष्ट समझना ठीक नहीं है।

इस पर श्री हनुमानजी ने कहा कि तुम लोग विभीषण को ही देखकर अपना विचार प्रकट कर रहे हो मेरी ओर से भी तो देखो, मैं क्यों और क्या चाहता हूं…। फिर कुछ देर हनुमानजी ने रुककर कहा- जो एक बार विनीत भाव से मेरी शरण की याचना करता है और कहता है- ‘मैं तेरा हूं, उसे मैं अभयदान प्रदान कर देता हूं। यह मेरा व्रत है इसलिए विभीषण को अवश्य शरण दी जानी चाहिए।’

इंद्रा‍दि देवताओं के बाद धरती पर सर्वप्रथम विभीषण ने ही हनुमानजी की शरण लेकर उनकी स्तुति की थी। विभीषण को भी हनुमानजी की तरह चिरंजीवी होने का वरदान मिला है। वे भी आज सशरीर जीवित हैं। विभीषण ने हनुमानजी की स्तुति में एक बहुत ही अद्भुत और अचूक स्तोत्र की रचना की है। विभीषण द्वारा रचित इस स्तोत्र को ‘हनुमान वडवानल स्तोत्र’ कहते हैं।

श्री हनुमान् वडवानल-स्तोत्र,,,,,यह स्तोत्र सभी रोगों के निवारण में, शत्रुनाश, दूसरों के द्वारा किये गये पीड़ा कारक कृत्या अभिचार के निवारण, राज-बंधन विमोचन आदि कई प्रयोगों में काम आता है ।

रावण के भाई श्री विभीषण जो की भगवान राम व हनुमान जी के अनन्य भक्त थे, अपनी पूजा में वो निरंतर दोनों की पूजा किया करते थे।

विधि:- सरसों के तेल का दीपक जलाकर 108 पाठ नित्य 41 दिन तक करने पर सभी बाधाओं का शमन होकर अभीष्ट कार्य की सिद्धि होती है।

विनियोग:-

ॐ अस्य श्री हनुमान् वडवानल-स्तोत्र मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषि:, श्रीहनुमान् वडवानल देवता, ह्रां बीजम्, ह्रीं शक्तिं, सौं कीलकं, मम समस्त विघ्न-दोष निवारणार्थे, सर्व-शत्रुक्षयार्थे सकल- राज- कुल- संमोहनार्थे, मम समस्त- रोग प्रशमनार्थम् आयुरारोग्यैश्वर्याऽभिवृद्धयर्थं समस्त- पाप-क्षयार्थं श्रीसीतारामचन्द्र-प्रीत्यर्थं च हनुमद् वडवानल-स्तोत्र जपमहं करिष्ये।

ध्यान:-
मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
वातात्मजं वानर-यूथ-मुख्यं श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये ।।

वडवानल स्तोत्र :-

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते प्रकट-पराक्रम सकल- दिङ्मण्डल- यशोवितान- धवलीकृत- जगत-त्रितय वज्र-देह रुद्रावतार लंकापुरीदहय उमा-अर्गल-मंत्र उदधि-बंधन दशशिर: कृतान्तक सीताश्वसन वायु-पुत्र अञ्जनी-गर्भ-सम्भूत श्रीराम-लक्ष्मणानन्दकर कपि-सैन्य-प्राकार सुग्रीव-साह्यकरण पर्वतोत्पाटन कुमार- ब्रह्मचारिन् गंभीरनाद सर्व- पाप- ग्रह- वारण- सर्व- ज्वरोच्चाटन डाकिनी- शाकिनी- विध्वंसन ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महावीर-वीराय सर्व-दु:ख निवारणाय ग्रह-मण्डल सर्व-भूत-मण्डल सर्व-पिशाच-मण्डलोच्चाटन भूत-ज्वर-एकाहिक-ज्वर, द्वयाहिक-ज्वर, त्र्याहिक-ज्वर चातुर्थिक-ज्वर, संताप-ज्वर, विषम-ज्वर, ताप-ज्वर, माहेश्वर-वैष्णव-ज्वरान् छिन्दि-छिन्दि यक्ष ब्रह्म-राक्षस भूत-प्रेत-पिशाचान् उच्चाटय-उच्चाटय स्वाहा ।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्र: आं हां हां हां हां ॐ सौं एहि एहि ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-
हनुमते श्रवण-चक्षुर्भूतानां शाकिनी डाकिनीनां विषम-दुष्टानां सर्व-विषं हर हर आकाश-भुवनं भेदय भेदय छेदय छेदय मारय मारय शोषय शोषय मोहय मोहय ज्वालय ज्वालय प्रहारय प्रहारय शकल-मायां भेदय भेदय स्वाहा ।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते सर्व-ग्रहोच्चाटन परबलं क्षोभय क्षोभय सकल-बंधन मोक्षणं कुर-कुरु शिर:-शूल गुल्म-शूल सर्व-शूलान्निर्मूलय निर्मूलय नागपाशानन्त- वासुकि- तक्षक- कर्कोटकालियान् यक्ष-कुल-जगत-रात्रिञ्चर-दिवाचर-सर्पान्निर्विषं कुरु-कुरु स्वाहा ।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते राजभय चोरभय पर-मन्त्र-पर-यन्त्र-पर-तन्त्र पर-विद्याश्छेदय छेदय सर्व-शत्रून्नासय नाशय असाध्यं साधय साधय हुं फट् स्वाहा ।

उपरोक्त हनुमद वडवानल स्तोत्र का निरंतर एक से ग्यारह पाठ करने से सभी समस्याओ का हल निश्चित मिलता है।
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नव ग्रहों से सम्बंधित रोग,रत्न व दान।

सूर्य।
रोग : सिरदर्द , ज्वर , नैत्रविकार , मधुमेय , पित्त रोग , हैजा , हिचकी आदि |
रत्न उपरत्न : माणिक्य , लालड़ी , तामडा , महसूरी |
जड़ी बूटिया : बेलपत्र की जड़
दान : गेंहू , लाल और पीले मिले हुए रंग के वस्त्र , लाल फल लाल मिठाई , सोने के कण , गाय, गुड और तांबा।

चन्द्रमा से सम्बंधित :
रोग : तिल्ली , पांडू , यकृत , कफ , उदार सम्बन्धी विकार , मनोविकार
रत्न उपरत्न : मोती , निमरू , चंद्रमणि ,
जड़ी बूटिया :खिन्नी की जड़
दान : चावल , श्वेत वस्त्र , कपूर , चांदी , शुद्ध , सफ़ेद चन्दन , वंश फल , श्वेत पुष्प , चीनी , वृषभ , दधि , मोती आदि।

मंगल से सम्बंधित :
रोग : पित्त , वायु , कर्ण रोग , गुणगा , विशुचिका , खुजली , रक्त सम्बन्धी बीमारिया , प्रदर , राज , अंडकोष रोग , बवासीर आदि।
रत्न – उपरत्न : मूंगा , विद्रुम
जड़ी बूटिया : अनंत मूल की जड़
दान : लाल मक्का , लाल मसूर , लाल वस्त्र , लाल फल , लाल पुष्प।

बुध से सम्बंधित :
रोग : खांसी , ह्रदय रोग , वातरोग , कोढ़ , मन्दाग्नि , श्वास रोग , दम , गूंगापन
रत्न उपरत्न : पन्ना , संग पन्ना , मरगज तथा ओनिक्स
जड़ी बूटिया : विधारा की जड़
दान : हरी मुंग , हरे वस्त्र , हरे फल , हरी मिठाई , कांसा पीतल , हाथी दांत , स्वर्ण कपूर , शस्त्र , षटरस भोजन , घृत आदि।

वृहस्पति से सम्बंधित :
रोग : कुष्ठ रोग , फोड़ा , गुल्म रोग , प्लीहा , गुप्त स्थानों के रोग
जड़ी बूटिया : नारंगी या केले की जड़
दान : चने की दल , पीले वस्त्र , सोना , हल्दी , घी , पीले वस्त्र , अश्व , पुस्तक , मधु , लवण , शर्करा , भूमि छत्र आदि।

शुक्र से सम्बंधित :
रोग : प्रमेह , मंद बुद्धि , वीर्य विकार , नपुंसकता , वीर्य का इन्द्रिय सम्बन्धी रोग
रत्न उपरत्न : सफ़ेद पुखराज , ओपल, जरकन,हिरा, करगी , सिग्मा
जड़ी बूटिया : सरपोखा की जड़
दान : चावल , चांदी , घी , सफ़ेद वस्त्र , चन्दन , दही , गंध द्रव्य , चीनी , गाय , जरकन , सफ़ेद पुष्प आदि।

शनि से सम्बंधित :
रोग : उन्माद , वात रोग , भगंदर , गठिया , स्नायु रोग , टीबी , केंसर , अल्सर
रत्न उपरत्न : नीलम , नीलिमा , जमुनिया , नीला कटहल
जड़ी बूटिया : बिच्छु बूटी की जड़ या शमी की जड़
दान : काले चने , काले कपडे , जामुन फल , कला उड़द , काली गाय , गोमेद , कालेजूते , तिल , उड़द , भैस , लोहा , तेल , उड़द , कुलथी , काले पुष्प , कस्तूरी सुवर्ण।

राहू से सम्बंधित :
रोग : अनिंद्रा , उदर रोग , मस्तिष्क रोग, पागलपन
जड़ी बूटिया : सफ़ेद चन्दन
रत्न उपरत्न : गोमेद , तुरसा , साफा
दान : अभ्रक , लौह , तिल , नीला वस्त्र , छाग , ताम्रपत्र , सप्त धान्य , उड़द , कम्बल , जोऊ , तलवार।

केतु से सम्बंधित :
रोग : चर्म रोग , मस्तिष्क तथा उदर सम्बन्धी रोग , जटिल रोग , अतिसार , दुर्घटना , शल्य क्रिया आदि
रत्न उपरत्न : वैदूर्य , लहसुनिया , गोदंती संगी
जड़ी बूटिया : असगंध की जड़
दान : कस्तूरी तिल , छाग , कला वस्त्र , ध्वज , सप्त धान्य , उड़द , कम्बल।

रोग की हालत में ग्रह का प्रकोप अर्थात ग्रह की महादशा, अन्तर्दशा लगी हुई समझनी चाहिए |
उच्च राशि का है तो उसे मजबूत किया जाता है।मंत्र जाप, रत्न ,एवं जड़ी बूटिया धारण करनी चाहिए |*इससे रोग हल्का होगा और ठीक होने लगेगा | रत्न उपरत्न सम्बंधित ग्रह के वार व नक्षत्र में धारण करने चाहिए |
यदि कोई ग्रह नीच का है तो उसका दान संकल्प करके ब्रह्मण या जरूरतमंद को श्रद्धापूर्वक देना चाहिए

।। अहँकार ।।

अहँकार नही तो संसार नही , मेरे तेरे का यह संसार अहंकार के आधार पर ही चलता है । अहंकार के अनेकों रूप है अनेको वेश है – क्षण क्षण पल पल रूप बदलना , वेश धरना , इसका स्वभाव जो है । कभी तो वह स्वार्थ का चोला धारण करता है तो कभी धर्म का बाना पहनता है , यही अहँकार कभी हँसता है तो कभी रोता है ,कभी प्रेम करता है तो कभी द्वेष करता है , कभी जागता है तो कभी सोता है ।

जहां जहां पुरुष जाता है वहां वहां अहंकार उसके साथ ही साथ चलता है , कभी तो वह आगे आगे चलता है तो कभी पीछे पीछे , कभी दाँये तो कभी बाँये , कभी नीचे तो कभी ऊपर । सामान्य पक्षी तो अनजाने मे ही फँस जाता है परंतु अहँकार एक एैसा विचित्र पक्षी है जो जानते बूझते – देखते ही देखते फँसता है । व्याध के जाल मे फँस कर प्राणी रोता है परंतु अहँकार के जाल मे फँस कर प्राणी हँसता है । अहँकार के राज्य मे तो रोना ही रोना है , वह हँसना भी रोना ही है । अहँकार का रखवारा हाँकते हाँकते गिराता है और फिर गिरे हुये को उठा कर फिर हाँकता है । कौन मुक्त हो पाया है इस अहँकार से , जो मानता है स्वंय को ‘ निरहँकारी ‘ वास्तव मे तो उससे बडा अहँकारी इस संसार मे नही है ।

‘ अहँकार के ही देवता हैं “ महादेव “ ‘

           ।। महादेव ।।

नव ग्रहों के कारकतत्व।

सूर्य👉पिता, आत्मा, प्रताप, आरोग्यता, आसक्ति, अनुशासन ,समय का पाबंद , सरकार का विचार करें।
चन्द्रमा👉 मन, बुद्धि, राजा की प्रसन्नता, माता और धन का विचार करें।
मंगल👉 पराक्रम, रोग, गुण, भाई, भूमि, शत्रु और जाति का विचार करें।
बुध👉 विद्या, बन्धु, विवेक, मामा, मित्र और वचन का विचार करें।
गुरु👉 बुद्धि, शरीर पुष्टि, पुत्र और ज्ञान का विचार करें।
शुक्र👉 स्त्री, वाहन, भूषण, काम, व्यापार तथा सुख का विचार करें।
शनि👉 आयु, जीवन, मृत्युकारण, विपत्ति और सम्पत्ति का विचार करें।
राहु👉 पितामह (पिता का पिता) तथा रोग का विचार करें।
केतु👉 मातामह (नाना) का तथा रोग का विचार करें।

नव ग्रहो से सम्बंधित रिश्ते नाते।

1.सूर्य :- पिता, सरकार।
2.चंद्र :- माता ,दादी ,बुजुर्ग औरत ,सास ।
3.मंगल :- भाई ,पडोसी ।
4.बुध :- बहन ,बेटी,बुआ ,मासी ,फूफी,साली ।
5.बृहस्पति :-बाप ,दादा ,बुजुर्ग ,धर्म स्थान का पंडित या पाठी बुजुर्ग,ससुर, पुत्र।
6.शुक्र :- पत्नी।
7.शनि :- चाचा ,मजदूर इंसान।
8.राहु :- ससुराल।
9.केतू :- पुत्र , भांजा ,भतीजा,मामा।
[ वर्तमान चिंतन ..समझ सकते है तो समझिए !!

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था.युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फ़टे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे, और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी. गिद्ध, कुत्ते, सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में द्वापर का सबसे महान योद्धा देवब्रत भीष्म शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था अकेला.तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची, “प्रणाम पितामह”

भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी। बोले, ” आओ देवकीनंदन… स्वागत है तुम्हारा. मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था”
कृष्ण बोले, ” क्या कहूँ पितामह! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप”
भीष्म चुप रहे.कुछ क्षण बाद बोले, ” पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव? उनका ध्यान रखना, परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है”
कृष्ण चुप रहे.
भीष्म ने पुनः कहा, ” कुछ पूछूँ केशव? बड़े अच्छे समय से आये हो, सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय।”
कृष्ण बोले- कहिये न पितामह!
एक बात बताओ प्रभु! तुम तो ईश्वर हो न..
कृष्ण ने बीच में ही टोका, “नहीं पितामह! मैं ईश्वर नहीं। मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह, ईश्वर नहीं।”
भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े। बोले, ” अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण, सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा। पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया, अब तो ठगना छोड़ दे रे…”
कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले, ” कहिये पितामह!”
भीष्म बोले, “एक बात बताओ कन्हैया! इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या?”

  • “किसकी ओर से पितामह? पांडवों की ओर से?”
  • “कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया, पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था? आचार्य द्रोण का वध, दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार, दुःशासन की छाती का चीरा जाना, जयद्रथ के साथ हुआ छल, निहत्थे कर्ण का वध, सब ठीक था क्या? यह सब उचित था क्या?”
  • इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह! इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया। उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम, उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन, मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह!
  • “अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण? अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है, पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है। मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण!”
  • “तो सुनिए पितामह! कुछ बुरा नहीं हुआ, कुछ अनैतिक नहीं हुआ। वही हुआ जो हो होना चाहिए।”
  • ” यह तुम कह रहे हो केशव? मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है? यह क्षल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया? “
  • “इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह, पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है। हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है। राम त्रेता युग के नायक थे, मेरे भाग में द्वापर आया था। हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह।”

-” नहीं समझ पाया कृष्ण! तनिक समझाओ तो…”

-” राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह! राम के युग में खलनायक भी ‘रावण’ जैसा शिवभक्त होता था। तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण और कुम्भकर्ण जैसे सन्त हुआ करते थे। तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे। उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था। इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया। किंतु मेरे युग के भाग में में कंस, जरासन्ध, दुर्योधन, दुःशासन, शकुनी, जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं। उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह। पाप का अंत आवश्यक है पितामह, वह चाहे जिस विधि से हो।”

  • “तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव? क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा? और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा?”

-” भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह। कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा। वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा, नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा। जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह! तब महत्वपूर्ण होती है विजय, केवल विजय। भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह।”

-“क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव? और यदि धर्म का नाश होना ही है, तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है?”

-“सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह! ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता, सब मनुष्य को ही करना पड़ता है। आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न! तो बताइए न पितामह, मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या? सब पांडवों को ही करना पड़ा न? यही प्रकृति का संविधान है। युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से। यही परम सत्य है।”

भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे। उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी। उन्होंने कहा- चलो कृष्ण! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है, कल सम्भवतः चले जाना हो… अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण!”

कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले, पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था।

जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है।

“ दुःख – दुःख – दुःख …. ! “

यह जो हम सुख – दुःख मानते हैं संसार में , यह ” मेरे नारायण ” , सोलह आने मानसिक है । बाहर का निमित्त – वह गाली दे गया , वह मार गये , वह बिछुड़ गये , वह पैसा ले गये – इसका कुछ मतलब नहीं है । जैसे घड़ी को शॉक – प्रुफ बनाकर रखते हैं न कि इस पर कोई चोट न लगे , ऐसे ही आप मन को शॉक – प्रुफ बनाईये – शॉक – प्रुफ बनाईये । आपके मन को शोक , कोई भय , कोई संयोग , कोई वियोग छू न सके – ऐसे मन की रचना कीजिये । इसकी रचना कैसे होगी । आपको दो बात बताते हैं ।
चिति शक्ति – चिति चेतन और चित्त – ये दोनों जब एक हो जाते हैं , तब सारे दुःख होते हैं । जब चिति चित्त से अलग हो जाती है , तब कोई दुःख नहीं होता है । यह अलगाव करने से नहीं होता है । यह अलगाव समझने से होता है । परन्तु , वह समझना बिना साधन के नहीं होता । साधन से अपने मन को समझने योग्य बनायें । चिति चेतन , साक्षी चेतन , द्रष्टा चेतन , प्रत्यग् चेतन का चित्त से अलगाव समझें । चिति चेतन और चित्त के अलगाव को समझें । यह अलगाव देखें कि यह चित्त है । चित्त और मेरे मेरे बीच में एक सन्धि है । चित्त के साथ मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है ।
दुःख वह होता है , जिससे हमारा कलेजा मैला लगता है । वासना में दुर्गन्ध होती है । वासना में कड़वापन होता है । वासना में कुरूपता होती है । वासना का स्पर्श चोट पहुँचाता है । वासना की आवाज में बहुत गाली होती है । वासना आपको गाली देती हुई आती है । आपने कभी ध्यान दिया ? अरे ओ दुःखी ! ओ अज्ञानी ! ओ मुर्ख ! तूँ वहाँ चल । तब सुख मिलेगा । अथात् तूँ दुःखी है । तेरे कोई घर नहीं है । तू बहुत छोटा है । तू वहाँ चल , तब सुख मिलेगा । वह आपको झोपड़ीपट्टी में रहनेवाला बताती है कि तू दुःखी है। यह वासना आपके पास गाली देते हुए आती है । आप पहचानते नहीं हैं । वासना आपको अज्ञानी पहले बना लेती है , मृत्युशील बना लेती है और फिर कहती है – अरे ! ओ दुःखी! वहाँ चल । वहाँ तुम्हें सुख मिलेगा । हम तुमको वहाँ सुख देंगे । यह वासना आपके पास आपको गाली देती हुई , आपका तिरस्कार करते हुए तब आपके पास आती है।
दुःख अर्थात् दूषित हृदयाकाश । दु अर्थात् दूषित । ख अर्थात् हृदयाकाश । जिससे आपका हृदयाकाश दूषित हो जाता , उसका नाम है ” मेरे नारायण ” , – दुख । ” दुष्टं ख यस्मात् तत् दुःखं। ” “ दुष्टानि खानि इन्द्रियाणि यस्मात् तत् दुःखं । ” दुःख क्या है ? जिससे हमारी इन्द्रियों में मलिनता आ जाये , हमारे हृदय में मलिनता आ जाये , अन्धेरा लगे , कुछ सूझे नहीं और जिसको हम मिटाना चाहें ।
नारायण ! यह दुःख जो है , यह एक बड़ा भारी अनर्थ देता है , क्लेश देता है । जब हम मान बैठेंगे कि इस चीज से हमको दुंख मिला , तो उस चीज से द्वेष हो जायेगा । अपने को उसकी जलन होगी । इस दुश्मन ने हमारा पैसा चुरा लिया , इसने हमारे घर में आग लगा दी , इसने हमको डण्डा मार दिया , इसने हमको बड़ा दुःख दिया , तो उसके प्रति हृदय में द्वेष होगा । इतना ही नहीं । और भी इसका अनर्थ है । यदि आप किसी के मर जाने को समझते हैं कि मृत्यु ने हमको बहुत दुःख दिया – और की बात छोड़ दे । यह समझ लें कि मृत्यु के कारण हमको बड़ा दुःख हुआ , तो आप अपनी मृत्यु से भी डरने लग जायेंगे । मृत्यु का भय आपके घर में , आपके हृदय में घर बना लेगा ।
मृत्यु दुःख नहीं देती है । हमने – आपने हजारों मरते हुए और जलते हुए देखा है । जिसको हम अपना समझते हैं उसकी मृत्यु से दुःख होता है । सम्बन्ध दुःख देता है । मृत्यु दुःख नहीं देती है । आदमी दुःख नहीं देता है देह सम्बन्ध दुःख देता है । हम दूसरों की लाठी नहीं पकड़ सकते , पर हम अपने दिल को पकड़ सकते हैं । अरे ओ दिल ! भीतर की ओर देख । तेरे अन्दर परमशिव परमात्मा प्रकाशित हो रहे हैं । तेरे भीतर परमशिव महेश्वर बैठे हैं और वह तुझे देख रहे हैं । उनके देखते देखते तू रोता है ? भगवान् के सामने जाकर तू मुस्कराता नहीं है । भगवान् तुमको देख रहे हैं । परमात्मा परमशिव महेश्वर तुमको देख रहे हैं । प्रत्यक् चैतन्य तुमको देख रहा है । तू रोता है ? मुस्कराता नहीं है ?
दुःख वह चीज होती है , जिसको हम बिलकुल नापसन्द करते हैं और मिटाना चाहते हैं । यह जो दुःखाभाव की इच्छा है , यह किसके लिए है ? दुःख नहीं मिलेगा – दुःख का अभाव हो जायेगा , तो कौन खुश होगा ? यह अन्य इच्छा के अधीन दुःखाभाव की इच्छा नहीं है । अन्येच्छाधीन स्वारसिक दुःखाभाव की इच्छा है । दुःख बताना चाहते हैं ।
दौमर्नस्य क्या है ? हम चाहते थे कि ऐसा हो , ऐसा हो , ऐसा हो । हम चाहते थे कि चाँदनी रात हो , नदी का किनारा हो , ठंडी हवा हो । प्रेयसी हो , प्रियतम । क्या मजा होगा ? हैं ? हम तो चाहते थे ऐसे , लेकिन , वहाँ चाँदनी की जगह बदली घेर आयी । घनघोर अंधेरा रात हो आयी । ठंडी हवा की जगह आँधी चलने लग गयी । नदी की जगह पर हम गड्ढे में गिर गये । जैसा चाहते वैसा नहीं हुआ । इच्छा का विभाग हुआ ? तब क्या हुआ ? मन बिगड़ गया । अब क्या करें ? बादल पर बन्दुक छोड़ें ? तूफान के सामने कोई पहाड़ खड़ा करें ? प्रिया – प्रियतम नहीं आये , तो नया गढ़ लें ? क्या करेगे ? दुनिया के प्रेयसी – प्रियतम नहीं आये , तो क्या नया गढ़ेंगे ? मन भीतर ही भीतर घुटता है और कुछ कर सकते नहीं । तो , ऐसा क्यों हुआ ?
नारायण । असल में हुआ इसलिये कि हम जो चाहते थे , उसके मुताबिक नहीं हुआ । इसमें न होना दोष है कि वैसा हो , ऐसा चाहना दोष है । आप विचार करें ऐसा चाहना दोष है । वैसा न होना दोष नहीं है । वैसा होना तो प्रकृति के अधीन था । सब ईश्वर के अधीन था । चाँदनी रात का होना , नदी का होना, ठंडी बयार का होना सब परमेश्वर के हाथ में था । वह तो आपके हाथ में नहीं था । संसार की वासना के अधीन होकर वैसी इच्छा की और वह इच्छा हमको तकलीफ देने लग गई । तो दौमर्नस्य हो गया । दौमर्नस्य अर्थात् अपने मन का
दुश्मन बन जाना दूसरे का दुश्मन बनना नहीं । अपने मन का शत्रु बन जाना यही दुःख है ।
[ 🔯दालचीनी के औषधीय गुण ✍️

👨‍👩‍👧दालचीनी के औषधियों गुणों से पाएं इन भयंकर बिमारियों से निजात ,जानिए कैसे ?
दालचीनी एक अत्यधिक स्वादिष्ट प्राकृतिक औषधि (मसाला )है। यह हजारों वर्षों से इसके औषधीय गुणों के लिए बेशकीमती माना जाता है। राजाओं के लिए यह उपहार के रूप में लाया जाता था। आधुनिक विज्ञान ने अब पुष्टि की है कि दालचीनी सामान्य जीवन में भी बहुत ही महत्वपूर्ण है ।
🔯यहां दालचीनी के7 स्वास्थ्य लाभ हैं जो वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा समर्थित हैं।दालचीनी शक्तिशाली

👨‍👩‍👧1.औषधीय गुणों के लिए बेशकीमती
🔯दालचीनी एक मसाला है जिसे वैज्ञानिक रूप से दालचीनी के रूप में जाना जाने वाले पेड़ों की आंतरिक छाल से बनाया जाता है। दालचीनी के दो मुख्य प्रकार हैं- सीलोन दालचीनी: “सच्चा” दालचीनी के रूप में भी जाना जाता है। कैसिया दालचीनी: आज और अधिक सामान्य विविधता और लोग आमतौर पर “दालचीनी” के रूप में संदर्भित करते हैं।
✍️दालचीनी के पेड़ों के तनों को काटकर दालचीनी बनाई जाती है। भीतरी छाल को तब निकाला जाता है और लकड़ी के हिस्सों को हटा दिया जाता है। जब यह सूख जाता है, तो यह स्ट्रिप्स बनाता है जो रोल में दालचीनी कहा जाता है। ये डंडे दालचीनी पाउडर बनाने के लिए जमीन हो सकते हैं।
👨‍👩‍👧दालचीनी की विशिष्ट गंध और स्वाद तैलीय भाग के कारण होता है, जो यौगिक सिनामाल्डिहाइड में बहुत अधिक होता है।वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि यह यौगिक स्वास्थ्य और चयापचय पर दालचीनी के सबसे शक्तिशाली प्रभावों के लिए जिम्मेदार है।

🔯2. एंटीऑक्सिडेंट है दालचीनी -एंटीऑक्सिडेंट आपके शरीर को मुक्त कणों से होने वाले ऑक्सीडेटिव नुकसान से बचाते हैं। दालचीनी शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट के साथ भरी हुई है, जैसे कि पॉलीफेनोल।
🔯एक अध्ययन में कि 26 मसालों की एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि की तुलना में, दालचीनी स्पष्ट विजेता के रूप में आती है, यहां तक ​​कि लहसुन और अजवायन की तरह “सुपरफूड्स” भी। वास्तव में, यह इतना शक्तिशाली है कि दालचीनी को एक प्राकृतिक खाद्य संरक्षक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
👊3. दालचीनी में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण-
🔯सूजन अविश्वसनीय रूप से महत्वपूर्ण है। यह आपके शरीर को संक्रमण से लड़ने और ऊतक क्षति की मरम्मत में मदद करता है।हालांकि, सूजन तब समस्या बन सकती है जब यह आपके शरीर के अपने ऊतकों के क्रॉनिक और निर्देशित हो। इस संबंध में दालचीनी उपयोगी हो सकती है।
😴अध्ययनों से पता चलता है कि इस मसाले और इसके एंटीऑक्सिडेंट में शक्तिशाली विरोधी भड़काऊ गुण हैं।दालचीनी में एंटीऑक्सिडेंट विरोधीप्रभाव है, जो रोग के जोखिम को कम करने में मदद कर सकते हैं।
🔯4.हृदय रोग के जोखिम को काट सकती है दालचीनी
👨‍👩‍👧दालचीनी को हृदय रोग के कम जोखिम से जोड़ा गया है, जो दुनिया में समय से पहले मौत का सबसे आम कारण है। टाइप 2 मधुमेह वाले लोगों में, प्रति दिन 1 ग्राम या लगभग आधा चम्मच दालचीनी रक्त मार्करों पर लाभकारी प्रभाव दिखाता है।
👨‍👩‍👧यह कुल कोलेस्ट्रॉल, “खराब” एलडीएल कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स के स्तर को कम करता है, जबकि “अच्छा” एचडीएल(HDL ) कोलेस्ट्रॉल स्थिर रहता है।

👊हाल ही में, एक बड़े समीक्षा अध्ययन ने निष्कर्ष निकाला है कि प्रति दिन सिर्फ 120 मिलीग्राम की एक दालचीनी खुराक का ये प्रभाव हो सकता है।
🔯इस अध्ययन में, दालचीनी ने “अच्छा” एचडीएल कोलेस्ट्रॉल के स्तर को भी बढ़ाया। जानवरों के अध्ययन में, दालचीनी को रक्तचाप को कम करने के लिए दिखाया गया है। कुल मिलाजुला कर देखेंगे तो ये सभी कारक आपके हृदय रोग के खतरे को काफी कम कर सकते हैं। दालचीनी कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड्स और रक्तचाप सहित हृदय रोग के लिए कुछ प्रमुख जोखिम कारकों में सुधार कर सकती है।

👨‍👩‍👧5.आपके हार्मोन इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता में सुधार कर सकता है दालचीनी
इंसुलिन प्रमुख हार्मोन में से एक है जो चयापचय और ऊर्जा उपयोग को नियंत्रित करता है।यह आपके रक्तप्रवाह से आपकी कोशिकाओं तक रक्त शर्करा के परिवहन के लिए भी आवश्यक है।
समस्या यह है कि कई लोग इंसुलिन के प्रभाव के लिए प्रतिरोधी हैं। इसे इंसुलिन प्रतिरोध के रूप में जाना जाता है, चयापचय सिंड्रोम और टाइप 2 मधुमेह जैसी गंभीर स्थितियों की एक बानगी।
🔯अच्छी खबर यह है कि दालचीनी नाटकीय रूप से इंसुलिन प्रतिरोध को कम कर सकती है। साथ ही इस महत्वपूर्ण हार्मोन को अपना काम करने में मदद करती है। इंसुलिन संवेदनशीलता में वृद्धि करके, दालचीनी रक्त शर्करा के स्तर को कम कर सकती है।
[ 💐मूली खाने के फायदे / लाभ

🥀1- मूली में विटामिन ‘बी’ और ‘सी’ होते हैं, जो पेट के लिये बहुत लाभप्रद हैं ।
🌺2- पीलिया रोग के लिए मूली अमृत के समान है।
3🌹- मूली के पत्ते भी बहुत गुणकारी होते हैं । पत्तों के बिना मूली देर से पचती है ।
इसलिए मूली के साथ पत्ते अवश्य खाने चाहिए।
🏵️4- मूली का भोजन में विशेष उपयोग होता है । इसका अचार, मुरब्बा, सलाद,साग और चटपटे व्यंजनों के रूप में प्रयोग किया जाता है ।
🌹5- विटामिन ‘ए’, ‘बी’ और ‘सी’ की कमी के कारण हमारे शरीर में ब्रांको निमोनिया, यक्ष्मा, मूत्राश्मि, रतौंधी, बेरी-बेरी, मस्तिष्क वात, तन्तुओं का शोथ, हृदय दौर्बल्य, स्कर्वी रोग, अग्निमांद्य, रक्ताल्पता और श्वासादि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। मूली के पत्ते इन रोगों को नष्ट करने में सहायक होते हैं, क्योंकि इनमें मूली से अधिक विटामिन ‘सी’ की अपेक्षा ‘ए’ और ‘बी’ प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं ।
🌺6- एक औस भोज्य पदार्थ में इनके अन्दर 1.19 ग्राम प्रोटीन, 0.17 ग्राम वसा, 1.78 ग्राम कार्बोज और 13 ग्राम कैलोरीज पाई जाती है ।
7🍂- मूली, गाजर, प्याज को समान मात्रा में मिलाकर सलाद के रुप में दोनों समय भोजन के साथ अच्छी तरह चबा-चबा कर खाएं। शारीरिक दुर्बलता दूर होती है। शरीर में ताकत आती है। शरीर सुडौल व गठीला बनता है।
8- 🌾मूली के सेवन से कब्ज, पीलिया, खुजली, मधुमेह, आंत संबंधी बीमारियां, अम्लता, गुर्दे की खराबी जैसी व्याधियां दूर होती हैं।
🍃9- मूली खाने से दांत मजबूत होते हैं। उसके पत्ते विशेष रूप से लाभदायक हैं। अगर पत्तों को धीरे-धीरे चबा कर खाया जाए, तो बदहजमी दूर होती है। वहीं काले नमक के साथ खाने से खट्टी डकारें दूर होती हैं।
🍂10- मूली पथरी के रोग में विशेष उपयोगी है। उसके ताजे पत्तों का रस पीने से पथरी गलने लगती है। मूली के बीज चार चम्मच (छोटा) दो कप पानी में डालकर उबालें। जब आधा कप पानी शेष बचे, तब उतार कर छान लें और ठंडा कर सुबह या शाम दिन में एक बार पीएं। कुछ दिनों तक यह प्रयोग करने से पथरी गलकर मूत्र मार्ग से बाहर हो जाती है। पेट दर्द होने पर एक कप मूली के रस में नमक, काली मिर्च डालकर पीने से कुछ ही देर में आराम मिलता है।
🌼11- अगर आपको कब्ज की शिकायत बनी रहती है, तो मूली का सेवन नियमित रूप से करें। कब्ज दूर होगा।
🌾12- अगर आपको बवासीर है, तो यह प्रयोग कर सकते हैं। आधा गिलास मूली के रस में दो बड़े चम्मच अदरक व नींबू का रस मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से बवासीर से शीघ्र मुक्ति मिलती है। उस दौरान अधिक मिर्च-मसाले व चिकनाई युक्त भोजन का परित्याग करें
🌹13- मूली का सेवन जाड़े में सुबह धूप के समय करें। उससे विशेष लाभ होता है। जाली वाली, अधिक तेज मूली न खाएं। कोशिश करें कि मूली को अकेला न खाएं। और न ही अधिक मात्रा में उसका सेवन करें। सेवन के उपरांत थोड़ा-सा गुड़ अवश्य खाएं।
1🍂4- अगर आपको पेशाब में जलन की शिकायत है, तो मिश्री व मूली को साथ-साथ चबाएं। पेशाब खुलकर आएगा।
💐15- अगर पेट में कीड़े हैं, तो मूली को उबालकर उसमें सेंधा नमक डालें। छानकर सुबह पी लें। कीड़े नष्ट होकर निकल जाएंगे।
🌻16- अगर सिर में जुएं हों, तो मूली के रस में नींबू का रस निचोड़ कर सिर में लगाएं, जुएं नष्ट हो जाएंगे।
🍂17- मूली के पत्तों का गाजर के साथ सेवन करने से आंखों की ज्योति बढ़ती है।
🥀18- पीलिया रोग होने पर ताजी मूली तथा उसके पत्तों का अधिक मात्रा में सेवन करें।

🌸मूली से रोगों का उपचार :

🏵️1- पथरी में मूली के फायदे- मूली के बीजों का 1 1/2-1 1/2 माशा चूर्ण प्रतिदिन सवेरे-शाम जल के । साथ लेने से पथरी में लाभ होता है । पेशाब करते समय जलन और पीड़ा मिटाने के लिए इसके स्वरस को प्रयोग करना चाहिए ।
मूली के साथ नमक और काली मिर्च सेवन करने से अमाशय की पीड़ा में लाभ होता है । इसके पत्तों का रस 4 तोला और अजमोढ़ 3 माशा दिन में दो बार सेवन करने से कुछ दिनों में पथरी गल जाती है।

🥀2- हिचकी में मूली के फायदे- सूखी मूली के टुकड़ों को पानी में उबालकर काढ़ा पीने से हिचकी और श्वास रोग में लाभ होता है।
इसके बीजों को गर्म पानी के साथ लेने से गला साफ होता है।

🌹3- बिच्छू दंश में मूली के फायदे- मूली के टुकड़े में नमक मिलाकर बिच्छू के दंश पर लगाने से पीड़ा शान्त होती है । कई लोगों का मत है कि हमेशा मूली सेवन करने वाले को बिच्छू का | विष नहीं चढ़ता ।

🌾4- बवासीर में मूली के फायदे –इसके पत्तों का रस पेट की पीड़ा, अफारा और अर्श (बवासीर) में लाभ करता है । मूली के 2 तोला रस में 5 तोला गाय का घी मिलाकर कुछ दिनों तक सेवन करने से बवासीर में लाभ होता है ।
• मूली के कन्द को नित्य खाते रहने से बबासीर शान्त रहती है ।
• मूली के पत्तों का स्वरस ढाई तोला तक नित्य पीने से अर्श (बबासीर) की पीड़ा शान्त रहती है।
• मूली के पत्तों का महीन चूर्ण तक्र के साथ सेवन करने से अर्श (बबासीर) के सभी कष्ट अति शीघ्र मिट जाते हैं ।

🌸5- कंठमाला में मूली के फायदे – बकरी के दूध में इसके बीजों को पीसकर लेप करने से कंठमाला में लाभ होता है।स्नेहा समूह

🌻6- कान दर्द में मूली के फायदे-मूली के 3 तोला रस में 1 तोला तिल्ली का तेल सिद्ध करके कान में डालने से कान की पीड़ा शान्त होती है ।

🌾7- दाद में मूली के फायदे- मूली के बीजों को नींबू के रस में पीसकर लगाने से दाद में लाभ होता है ।

🍃8- मूत्रकष्ट में मूली के फायदे- इसके बीजों का चूर्ण 3 माशा जल के साथ लेने से मूत्र कष्ट में लाभ होता है ।
• मूली बीजों का चूर्ण 3 माशा फटे हुए दूध के जल से सुबह शाम सेवन करने से मूत्रकृच्छ रोग मिट जाता है।

🌸9- सूजाक में मूली के फायदे- इसके बीजों को अपामार्ग की क्षार के साथ पानी में पीसकर लेप करने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है । मूली के बीजों का चूर्ण 6 माशा जल के साथ देने से

1🌼0- मोटापा में मूली के फायदे – दो बड़े चम्मच मूली के रस में शहद मिलाकर बराबर मात्रा में पानी के साथ पिएं। ऐसा करने से 1 माह के बाद मोटापा कम होने लगेगा।

🍁11- मूत्राशय की पथरी में मूली के फायदे- आंवले का चूर्ण मूली के साथ खाने से मूत्राशय की पथरी निकल जाती है।
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🍂12- पेट के रोग में मूली के फायदे- मूली की चटनी, अचार, सब्जी या मूली पर नमक, काली मिर्च डालकर खाने से पेट के सभी रोग दूर । होते है।

🍁13-कान दर्द में मूली के फायदे-एक मूली के बारीक टुकड़े करके उसे सरसों के तेल में पकाएं। फिर इसे छानकर शीशी में भर लें। कान दर्द में इसकी 2-4 बूंदे दिन में 3-4 बार टपकाने से जल्दी ही आराम मिलता है।

🌺14-पीलिया(कामला/पांडु) में मूली के फायदे- मूली के स्वरस में शक्कर मिलाकर पिलाने से कामला रोग शर्तिया ठीक हो जाता है । इसका सेवन 15 दिनों से 1 माह तक (रोगमुक्त होने तक) करना चाहिए । अन्य किसी औषधि की आवश्यकता नहीं पड़ती है ।
मात्रा–बच्चों को 6 माशा से 1 तोला तक और बड़ों को ढाई तोला से 5 तोला तक सुबह-शाम सेवन करायें ।

🌻15-स्त्री रोग में मूली के फायदे- मूली के बीजों का चूर्ण 3 माशा सुबह-शाम ताजा जल से सेवन करने से मासिक धर्म (माहवारी) खुलकर होने लगता है ।

🌾मूली खाने के नुकसान –

🌺1- मूली के अधिक मात्रा में सेवन करने से भूख में कमी हो सकती है साथ ही यह मुँह, गले में दर्द और सूजन को भी जन्म दे सकता है ।
🌻2- भूलकरभी मूली के साथ मछली का सेवन न करें यह विरुद्ध आहार है ।
,🌺3- मूली खाने के पहले या तुरंत बाद दूध का सेवन आरोग्य शास्त्रों में निषिद्ध है ।
[🌸जामुन की गुठली का ऐसे करें सेवन, होंगे ये कमाल के सेहत लाभ

1 जामुन की गुठली डायबिटीज के मरीजों के लिए एक रामबाण औषधि है। इसके पाउडर को रोजाना सुबह एक चम्मच गुनगुने पानी के साथ लें। बेशक इससे आपको लाभ होगा।

2 महिलाओं में मासिक धर्म की समस्या और दर्द में जामुन की गुठली का पाउडर लाभकारी होता है। रोजाना एक चम्मच पाउडर लेने से मासिक धर्म में ज्यादा परेशानी नहीं होगी।

3 दांत व मसू़ड़ों से संबंधित समस्याओं में जामुन की गुठली के पाउडर को मंजन की तरह प्रयोग करें, इससे आपको लाभ होगा।

4 मूत्र वहन संबंधी समस्याओं में यह चूर्ण बेहद लाभकारी होता है। इसे बार- बार पेशाब आने की समस्याओं में भी लाभ होता है और इंफेक्शन भी ठीक होता है।

5 गुर्दे की पथरी होने पर जामुन की गुठली का चूर्ण लाभदायक होता है। रोजाना सुबह शाम इस चूर्ण को एक चम्मच की मात्रा में पानी के साथ लें।

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[ प्रश्न:- आनंद का मुख्य श्रोत क्या है?

आनंद का मुख्य श्रोत है मनुष्य का अंत:करण। कोई भी आनंद बाहर से भीतर अपने आप नहीं उतरता।वह भीतर का अंत:करण ही कृष्ण है।जो लगातार बाहरी विषयों को आकर्षित करता है खींचता है।बस यही भेद है जो मनुष्य समझ नहीं पाता कृष्ण और आकृषण में।हम आकर्षित होने की क्रिया को समझ नहीं पाते।संवय के भीतर झांक नहीं पाते अपने अंत:करण को कृष्ण को समझ नहीं पाते देख नहीं पाते। क्योंकि जीव की सरंचना ही ऐसी की है प्रकृति ने कि वह बाहरी विषयों को ही देख और समझ पाने में सक्षम है।वह समझ ही नहीं पाता है कि आकृषण हो कैसे रहा है।जबकि आकृषण की सीधी सी व्याख्या है।अगर कोई विषय या वस्तु किसी तरफ खिंचती हो तो कोई शक्ति उसे खींज रही होती है।बस इस कृष्ण को समझना होगा जानना होगा फिर सब समझ आने लगता है कि मैं किसी की तरफ नहीं खिंच रहा।किसी को अपनी तरफ खींच रहा हुं।न जानने की स्थिति में हमें लगता है विषय हमें खींच रहे हैं। जानने पर हमें अनुभव होने लगता है यह सब तो अपने आप हो रहा है न इसे मै ही कर रहा हुं और न ही कोई दुसरा मेरे लिए कर रहा है।और हम उस विषय व कारण से ही मुक्त हो जाते हैं।करता होने पर ही गलत सही पाप पुण्य का असमंजस बना रहता है। मुक्त होने पर ये आभास होने पर कि सब अपने आप हो रहा है आप करता नहीं रहते तो पाप पुण्य आदि विषय भोगों से मुक्त हो जाते हैं।यह मुक्ति ही आनंद है और अंत:करण में ही स्थीत हो जाना ठहर जाना ही परमानन्द है। कृष्णमय बन जाना ही असली आनंद है।

जय श्री कृष्ण
प्रेम से बोलो “जय श्री कृष्ण
विनम्र निवेदन …एक बार श्रीमद्भगवद्गीता अवश्य पढ़े अपने जीवन में । 🙏
परम भगवान श्री कृष्ण सदैव आपकी स्मृति में रहें
श्री कृष्ण शरणं मम
ये महामंत्र नित्य जपें और खुश रहें। 😊
सदैव याद रखें और व्यवहार में आचरण करें। ईश्वर दर्शन अवश्य होंगे।
श्री कृष्ण शरणं मम
श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञान परिवार
[ दया का महत्व

एक क्षण में , एक दिन में , एक साल में सभी समय लाभ हो सकता है। यह साधक पर निर्भर करता है। साधक यह निश्चय कर ले कि आज से साधना में गड़बड़ नहीं होगी फिर उसके अन्दर विकार अवगुण आ ही कैसे सकता है , यदि निश्चय दृढ़ नहीं होगा तभी यह सम्भव है। किसी ब्यक्ति को समुद्र में डूबते समय कोई जहाज का रस्सा मिल जाय तो भला उसे वह क्यों छोड़ेगा , रस्से को छोड़ना ही उसके लिए मृत्यु होगी। उसी प्रकार जो ईश्वर की शरण में निश्छल भाव से सच्चे मन से चला गया जिसे भगवतभक्ति में अध्यात्म में आनन्द आने लगा वह फिर उसे कैसे छोड़ सकता है और सांसारिक सुख क्यों तलाश करेगा।जब मनुष्य को शान्ति एवं आनन्द मार्ग मिल जाय तो कोई भी समझदार ब्यक्ति उस मार्ग को नहीं छोड़ सकता। प्रभु की कृपा है योगक्षेम वहन करने वाले प्रभु बिना मांगे ही हर प्रकार की सहायता करते हैं , तो उनसे बड़ा दाता कौन मिल सकता है।
यदि भूल बस असावधानी के कारण यदि कोई एक बार गिर जाता है तो पुनः पूरी सावधानी से रास्ते पर चलता है , जैसे किसी का दरवाजा नीचा है एक बार सर में चोट लग जाती है तो दोबारा सावधान होकर ही चलता है। प्रभु की दया का प्रभाव अपरिमित है, जो जानने में नहीं आ सकती उसके लिए कुछ भी असम्भव या अदेय नहीं है जो वह न दे सके। जो साधन की कमी प्रतीत होती है , वह प्रभु की दया पर रख दें तो वह एक क्षण में सारी पूर्ति कर सकते हैं । प्रभु की दया का स्वरूप समझने से वह विकसित हो जाती है। अज्ञानता के परदे को हटाने से उसका रहस्य खुल जाता है। वह कृपा प्रत्यक्ष हो जाती है। हर देश , हर काल , हर वस्तु में प्रभु की दया को पूर्ण देखो। न दिखे तो भी देखो अभ्यास से दिखने लगेगा। जैसे विवाह के समय वर कन्या को ध्रुव तारा दिखाया जाता है , यदि बादल हैं तो वैसे ही ध्रुवतारा का स्थान पश्चिमोत्तर दिखाकर मान लिया जाता है कि देख लिए। उसी प्रकार हर क्षण हर वस्तु हर कार्य में प्रभु की विलक्षण कृपा का अनुभव और विश्वास करो। वह कृपा आपको प्रत्यक्ष दिखने लगेगी।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।
यह अलौकिक अर्थात अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है , परन्तु जो पुरुष मुझको ही निरन्तर भजते हैं , वे इस माया का उलंघन कर जाते हैं अर्थात संसार से तर जाते हैं।
प्रभु की दया असीमित है उनकी दया से ही मनुष्य परमपद को प्राप्त कर लेता है फिर उन्हीं का होकर रह जाता है अर्थात संसार के आवागमन ये दाल रोटी , अमीरी गरीबी सभी झंझट से मुक्त होकर उन्हीं में विलीन होकर परम आनन्द में खो जाता है। एक महात्मा एक गृहस्थ के घर गये । गृहस्थ ने कहा कि महाराज बड़ी दया की , किन्तु घर में चार दिन से अन्न का दाना ही नहीं है , हम लोग भूखे बैठे हैं । महात्मा ने कहा कि तुम्हारे समान धनी तो कोई नहीं है। गृहस्थ ने कहा कि महराज आपकी बात समझ में नहीं आई । महात्मा ने एक पत्थर की तरफ संकेत करके कहा कि ये क्या है ? गृहस्थ ने बताया कि यह चटनी पीसने का पत्थर है। महात्मा ने कहा तुम्हारे पास जो लोहे का सामान हो वह ले आओ । उस पत्थर से छूते ही लोहा सोना बन गया। वह पारस पत्थर था। जैसे पारस की बात बताई गई । महात्मा दया करने वाले थे , उस गृहस्थ में श्रद्धा की कमी ही थी । यहाँ प्रभु की दया पारस पत्थर है और हम लोहा उनके स्पर्श उनकी दया से हम अवश्य सोना बन सकते हैं किन्तु उसके लिए हमें उन प्रभु पर पूर्ण श्रद्धा विश्वास बनाये रखने की परम आवश्यकता है। अपनी हर सफलता असफलता में भी उसी की दया का अनुभव करना चाहिए।

क्षमा करें लेख में अगर कही त्रुटी हो तो।

जय श्री कृष्ण
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[ #साधना से संबंधितआवश्यक बातें◆
ये बातें छोटी-छोटी तो अवश्य हैं, परन्तु आपको यदि इन बातों का ज्ञान नहीं है तो आपको साधना में असफलता का मुँह देखना पड़ सकता है। अतः इन्हें अवश्य याद रखें —–
१. जिस आसन पर आप अनुष्ठान, पूजा या साधना करते हैं, उसे कभी पैर से नहीं सरकाना चाहिए। कुछ लोगों की आदत होती है कि आसन पर बैठने के पहले खड़े-खड़े ही आसन को पैर से सरका कर अपने बैठने के लिए व्यवस्थित करते हैं। ऐसा करने से आसन दोष लगता है और उस आसन पर की जाने वाली साधनाएँ सफल नहीं होती है। अतः आसन को केवल हाथों से ही बिछाएं।
२. अपनी जप माला को कभी खूँटी या कील पर न टाँगे, इससे माला की सिद्धि समाप्त हो जाती है। जप के पश्चात् या तो माला को किसी डिब्बी में रखे, गौमुखी में रखे या किसी वस्त्र आदि में भी लपेट कर रखी जा सकती है। जिस माला पर आप जाप कर रहे हैं, उस पर किसी अन्य की दृष्टि या स्पर्श न हो, इसलिए उसे साधना के बाद वस्त्र में लपेट कर रखे। इससे वो दोष मुक्त रहेगी। साथ ही कुछ लोगों की आदत होती है कि जिस माला से जप करते हैं, उसे ही दिन भर गले में धारण करके भी रहते हैं। जब तक किसी साधना में धारण करने का आदेश न हो, जप माला को कभी धारण ना करे।
३. साधना के मध्य जम्हाई आना, छींक आना, गैस के कारण वायु दोष होना, इन सभी से दोष लगता है और जाप का पुण्य क्षीण होता है। इस दोष से मुक्ति हेतु आप जप करते समय किसी ताम्र पात्र में थोडा जल तथा कुछ तुलसी पत्र डालकर रखे। जब भी आपको जम्हाई या छींक आए या वायु प्रवाह की समस्या हो तो इसके तुरन्त बाद पात्र में रखे जल को मस्तक तथा दोनों नेत्रों से लगाए, इससे ये दोष समाप्त हो जाता है। साथ ही साधकों को नित्य सूर्य दर्शन कर साधना में उत्पन्न हुए दोषों की निवृत्ति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।इससे भी दोष समाप्त हो जाते हैं, साथ ही यदि साधना काल में हल्का भोजन लिया जाए तो इस प्रकार की समस्या कम ही उत्पन्न होती है।
४. ज्यादातर देखा जाता है कि कुछ लोग बैठे-बैठे बिना कारण पैर हिलाते रहते हैं या एक पैर के पंजे से दूसरे पैर के पंजे या पैर को आपस में अकारण रगड़ते रहते हैं। ऐसा करने से साधकों को सदा बचना चाहिए। क्यूँकि जप के समय आपकी ऊर्जा मूलाधार से सहस्त्रार की ओर बढ़ती है, परन्तु सतत पैर हिलाने या आपस में रगड़ने से वो ऊर्जा मूलाधार पर पुनः गिरने लगती है। क्यूँकि आप देह के निचले हिस्से में मर्दन कर रहे हैं और ऊर्जा का सिद्धान्त है, जहाँ अधिक ध्यान दिया जाए, ऊर्जा वहाँ जाकर स्थिर हो जाती है। इसलिए ही तो कहा जाता है कि जप करते समय आज्ञा चक्र या मणिपुर चक्र पर ध्यान लगाना चाहिए। अतः अपने इस दोष को सुधारे।
५. साधना काल में अकारण क्रोध करने से बचे, साथ ही यथा सम्भव मौन धारण करे और क्रोध में अधिक ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने से बचे। इससे संचित ऊर्जा का नाश होता है और सफलता शंका के घेरे में आ जाती है।
६. साधक जितना भोजन खा सकते हैं, उतना ही थाली में ले। यदि आपकी आदत है अन्न जूठा फेंकने की तो इस आदत में सुधार करे। क्यूँकि अन्नपूर्णा शक्ति तत्त्व है, अन्न जूठा फेंकने वालों से शक्ति तत्त्व सदा रुष्ट रहता है और शक्ति तत्त्व की जिसके जीवन में कमी हो जाए, वो साधना में सफल हो ही नहीं सकता है। क्यूँकि शक्ति ही सफलता का आधार है।
७. हाथ पैर की हड्डियों को बार-बार चटकाने से बचे। ऐसा करने वाले व्यक्ति अधिक मात्रा में जाप नहीं कर पाते हैं, क्यूँकि उनकी उँगलियाँ माला के भार को अधिक समय तक सहन करने में सक्षम नहीं होती है और थोड़े जाप के बाद ही उँगलियों में दर्द आरम्भ हो जाता है। साथ ही पुराणों के अनुसार बार-बार हड्डियों को चटकाने वाला रोगी तथा दरिद्री होता है। अतः ऐसा करने से बचे।
८. मल त्याग करते समय बोलने से बचे। आज के समय में लोग मल त्याग करते समय भी बोलते हैं, गाने गुनगुनाते हैं, गुटखा खाते हैं या मोबाइल से बातें करते हैं। यदि आपकी आदत ऐसी है तो ये सब करने से बचे, क्यूँकि ऐसा करने से जिह्वा संस्कार समाप्त हो जाता है और ऐसी जिह्वा से जपे गए मन्त्र कभी सफल नहीं होते हैं। आयुर्वेद तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से भी ऐसा करना ठीक नहीं है। अतः ऐसा ना करे।
९. यदि आप कोई ऐसी साधना कर रहे है, जिसमें त्राटक करने का नियम है तो आप नित्य बादाम के तैल की मालिश अपने सर में करे और नाक के दोनों नथुनो में एक-एक बूँद बादाम का तेल डाले। इससे सर में गर्मी उत्पन्न नहीं होगी और नेत्रों पर पड़े अतिरक्त भार की थकान भी समाप्त हो जाएगी।साथ ही आँवला या त्रिफला चूर्ण का सेवन भी नित्य करे तो सोने पर सुहागा।
१०. जप करते समय अपने गुप्तांगों को स्पर्श करने से बचे।साथ ही माला को भूमि से स्पर्श न होने दे। यदि आप ऐसा करते हैं तो जाप की तथा माला की ऊर्जा भूमि में समा जाती है।
११. जब जाप समाप्त हो जाए तो आसन से उठने के पहले आसन के नीचे थोड़ा जल डाले और इस जल को मस्तक तथा दोनों नेत्रों पर अवश्य लगाए। ऐसा करने से आपके जप का फल आपके पास ही रहता है। यदि आप ऐसा किये बिना उठ जाते हैं तो आपके जप का सारा पुण्य इन्द्र ले जाते हैं। ये नियम केवल इसलिए ही है कि हम आसन का सम्मान करना सीखें, जिस पर बैठ कर जाप किया, अन्त में उसे सम्मान दिया जाए।
मित्रों, ये कुछ नियम थे, जिनका पालन हर साधक को करना ही चाहिए। क्यूँकि ये छोटी-छोटी त्रुटियाँ हमें सफलता से कोसों दूर फेंक देती है। भविष्य में भी ऐसी कई छोटी-छोटी बातें आपके समक्ष रखने का प्रयत्न किया जाएगा। तब तक आप इन नियमों के पालन की आदत डालने चाहिए l

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