Astrology tips 31 August 2019

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[मधुमेह व् ज्योतिष।
जब शुक्र या बृहस्पति 6 वें घर या 8 वें घर में गोचर करता है, तो व्यक्ति मधुमेह का शिकार हो सकता है।
शुक्र और बृहस्पति पर कुछ ग्रहों के पीडाकारक प्रभाव के कारण मधुमेह का शिकार हो सकते हैं ।

इनके अलावा, कई कारक हैं जो ज्योतिषीय रूप से मधुमेह की शुरुआत या बीमारी के विकास की संभावना का पता लगाते हैं।

उपचार
उन सभी के लिए कुछ उपचारात्मक उपायों का पालन किया जा सकता है जो मधुमेह से पीड़ित हैं ।
१- आप बृहस्पति और शुक्र से संबधित दान प्रक्रियाकर सकते हैं।
२- आप अपने ग्रहों से आशीर्वाद की प्राप्ति व् इन्हे बल प्रदान कर सकते हैं ।
३- शुक्र आपके चारों ओर स्वच्छ पानी का प्रतीक है। इसलिए ध्यान रखें कि आपके घर के पास या नालियों में पानी जमा न होने दें, क्योंकि जल जमाव और अवरुद्ध पानी बदबूदार हो जाएगा और शुक्र को कमजोर कर देगा।
रत्न
आप विस्तृत कुंडली दिखा कर ओपल या पीले रंग का पुखराज धारण कर सकते हैं।
[ #जीवन पथ में एक व्यक्ति असफल क्यों?

1- यह बहुत ही स्वाभाविक है कि अच्छे फल देने वाले ग्रहों और घरों के स्वामी बुरे घर यानी दुःस्थान में होते हैं तो व्यक्ति को जीवन में सफलता नहीं मिलेगी।
2- यदि एक योगकारक ग्रह 6, 8 या 12 वें घर में स्थित है और अशुभ ग्रहों के पहलू से प्रभावित है तो व्यक्ति अपने करियर में कभी सफल नहीं होगा।
३- जीवन पथ में संभव है कभी ऊपर और नीचे ।
४-मान लीजिए कि आप एक वृश्चिक लग्न के व्यक्ति हैं

५-आपकी कुंडली में 12 वें घर में 10 वें भाव के अधिपति भगवान सूर्य है, तो सूर्य एक नकारात्मक परिणाम देगा क्योंकि 12 वां घर त्रिक घर है और वृश्चिक के लिए 12 वां राशि तुला है और सूर्य इस राशि में दुर्बल है, इसलिए सूर्य अशुभ परिणाम देगा।
६-पहले हम ग्रहों व उनके प्रभाव पर गहन विचार करें कि कौन से ग्रह और घर कमजोर हैं, इसके बाद खोज करनी चाहिए कि ज्योतिषीय उपाय क्या है।
[ ASTROLOGY AND POVERTY

गरीबी का मतलब सिर्फ पैसा नही है, इसमे जीवन के और भी बहुत से पहलू हैं।

किसी व्यक्ति की कुंडली में कई अच्छे या बुरे संयोग होते हैं।

किसी व्यक्ति के जीवन में गरीबी पैदा कर सकती है, वह है उनके चंद्रमा का स्थान।

ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा बहुत महत्वपूर्ण है, सूर्य से भी अधिक।

चंद्रमा आपके मन, आपकी भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो आपको, ‘आप’ बनाता है।

जब यह क्षतिग्रस्त या विपरीत प्रभावी हो जाता है, तो यह न केवल लोगों के जीवन में अवसाद और तनाव लाता है, बल्कि यह उन्हें जीवन में बुरे निर्णय लेने देता है जिससे वित्तीय विफलता होती है।

वे कौन से सूत्र और संयोजन हैं जो किसी व्यक्ति को गरीबी रेखा से नीचे लाते हैं?

  1. केमद्रुम योग: यह ज्योतिष में एक संयोजन है जहां चंद्रमा चार्ट में अकेला बैठा है, जिसमें कोई ग्रह दूसरे से चंद्रमा और कोई ग्रह 12 वें से चंद्रमा तक नहीं है, जिसका अर्थ है; यदि आपका चंद्रमा 10 वें घर में है, और ज्योतिष में 12 घर हैं, तो 11 वें घर या 9 वें घर में कोई भी ग्रह नहीं होना चाहिए ताकि चंद्रमा को अकेला माना जाए। यदि कोई ग्रह चंद्रमा के साथ संयोजन में है जिसे इस योग का रद्द होना भी माना जाता है। हालाँकि, यदि सूर्य, राहु या केतु एक साथ हों या चंद्रमा से 2 वें और 12 वें स्थान पर हों, तो यह इस योग को रद्द नहीं करता है। यह योग किसी व्यक्ति की युवावस्था को प्रभावित कर सकता है।
  2. सूर्य और चंद्रमा का संयोजन: जब सूर्य और चंद्रमा दोनों एक ही घर में बैठे होते हैं, विशेष रूप से एक दूसरे से 5 डिग्री कम, तो यह गरीबी पैदा कर सकता है, क्योंकि, चंद्रमा जल है और सूर्य अग्नि है। जब पानी आग के पास होता है, तो यह सूरज की आग और ऊर्जा को बाहर निकाल सकता है, लेकिन जब पानी का उपयोग इस तरह के उद्देश्य के लिए किया जाता है, तो यह वाष्पित हो जाता है और चंद्रमा को निर्जलित छोड़ देता है। यह किसी भी अच्छे प्रभाव को रद्द करता है जो सूरज और चंद्रमा व्यक्ति को दे सकता है। इसके अलावा, जब भी सूर्य और चंद्रमा एक घर में होते हैं, तो यह एक चंद्रमा चक्र है जो अपने जीवन के पहले छमाही में अंधकार का प्रतिनिधित्व करता है।
  3. जब राहु सूर्य के साथ या सूर्य का पहलू होता है। राहु को आकाश में ग्रहण के रूप में जाना जाता है, और जब यह एक ही घर में सूर्य के साथ बैठा होता है, तो यह सूर्य के सामने एक ग्रहण बनाता है, 34 वर्ष की आयु तक इसके अच्छे गुणों को दूर करता है। लेकिन, 34 वर्ष की आयु के बाद यह व्यक्ति को उसके बोझ से मुक्त करता है क्योंकि ग्रहण कभी भी नहीं रहता है।
  4. यदि राहु 2 वें घर में है, तो वह भी 32 वर्ष की आयु तक किसी व्यक्ति को आर्थिक रूप से पीड़ित कर सकता है, क्योंकि उस समय तक पैसे बचाने में सक्षम नहीं होगा, यदि किसी व्यक्ति के दूसरे घर में राहु है, तो उन्हें किसी और के अधीन काम करने के बजाय व्यापार करना चाहिए।

ये कुछ कारक हैं जो किसी की कुंडली में गरीबी पैदा करते हैं, लेकिन ज्योतिष में किसी भी प्रकार की सटीक भविष्यवाणी करने के लिए एक संपूर्ण चार्ट का विश्लेषण करना पड़ता है।
[कुण्डली के छठे भाव मे शनि के फल और उपाये :
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कुण्डली का छठा भाव प्रतियोगिता, जल स्त्रोत ( कुया, तालाब, हैंडपंप ), मामा, बुआ, मौसी के सुख, शारीरिक संघर्ष ( योगा, जिम, व्ययाम ) , व्यवसायक इन्वेस्टमेंट , रोग, शत्रु और कर्ज से संबंधित है । शनि ग्रह कर्म कारक, अनुशासन और वैराग्य का ग्रह है । भले ही कुण्डली के छठे भाव को दुष्ट भाव कहा जाता है , लेकिन इस भाव मे शनि जैसा पापी ग्रह शुभ फल देता है । इसका कारण है कि कुण्डली के पापी भावो में पापी ग्रह ही शुभता देते हैं , और दूसरा पहलू है कि कालपुरूष कुण्डली में छठे भाव मे कन्या राशि आती है जो कि शनि के मित्र ग्रह बुध की राशि है । ऐसा जातक एक अच्छा व्यवसाय चलाने वाला होता है , यह व्यवसाय बुध से जुड़े हो सकते हैं जैसे कि मोबाईल सेवाओं से संबंधित कार्य , टैलकम कम्पनी , कॉल सेंटर होना , जल विभाग में नोकरी करना , अकाउंटस से संबंधित कार्य करना , प्रिंटिंग के कार्य करना , कागज़ बनाने की फैक्ट्री होना या फिर स्टॉक एक्सचेंज में ब्रोकर रहते हुए ऐसे जातक बहुत धन कमाते हैं । एक तरह से अगर यह भी कहे कि छठे भाव मे शनि सब से अच्छी स्थिति में होता है , शर्त यह है कि शनि इस भाव मे वक्री ना हो , क्योंकि शनि ग्रह दास परवीरती का ग्रह है , लेकिन छठे भाव का शनि जातक को राजा के समान पद देता है , और दूसरे लोगो को दास बना देता है , कि जातक दूसरों से कार्य लेता है । हालांकि एक जो नकारात्मक पहलू जो रहता है वो सेहत के मामले में , क्योंकि छठा भाव रोग का भी स्थान है , छठे भाव मे शनि वाला जातक चाय कभी नही छोड़ सकता , सुबह के समय चाय , फिर कार्यक्षेत्र में जितने लोगो से मिलना होगा उतनी बार चाय , फिर शाम की चाय , इस बुरी आदत की वजह से इनको पेट गैस की समस्या हो जाती है , इस वजह से इनका पाचन तंत्र हमेशा खराब रहता है । ये अपना कार्य खुद नही करते , जिसकी वजह से जल्दी ही थकने लगते हैं , विटामिन डी की शरीर मे कमी होने लगती है , घुटनो के दर्द इनको जल्दी परेशान करते हैं । अगर चन्द्रमा से भी छठे भाव मे नैसर्गिक अशुभ ग्रह ( मंगल, राहु , केतु ) हो तो जीवनसाथी से अलगाव की स्थिति बनती है , ससुराल पक्ष से किसी ना किसी तरह की समस्या बनी रहती है । अगर शनि शत्रु ग्रह से युति में हो तो यह शुभ फल प्राप्त नही होते, ऐसे में निम्न उपाये करें :

छ्ठेभावमेंविराजमानशनिकेदुष्प्रभावदूरकरनेकेउपाये

  • बकरी का बच्चा खरीद कर उसका दान किसी चरवाहे को करें ।
  • काले रंग के कुत्ते को शनिवार के दिन ब्रेड या दूध दें ।
  • तोता खरीद कर उसको पिंजरे से आज़ाद करवाये , पिंजरा कचरे में फेंक दें ।
  • शनि की चीज़ें ( काली उड़द, बादाम ) जल प्रवाह करें ।
  • काला वस्त्र,लोहा, जूते – चप्पल, नारियल, सरसो का तेल का दान गरीब को करें ।
  • घर के जल स्त्रोतों का ख्याल रखें, खराब टूटी को तुरंत बदलें ।
  • समय समय पर पितरों के निमित्त दान पुण्य करते रहें ।
    : बृहस्पति ग्रह सूर्य से 5वां और हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है। इसे गैस का दानव भी कहते हैं। पीले रंग के इस ग्रह को अंग्रेजी में ज्यूपिटर भी कहते हैं। बृहस्पति ग्रह अनेक नकारात्मक परिस्थिति को सकारात्मक बना देता है। जैसे शादी नहीं हो रही हो, नौकरी व्यवसाय में सफलता नहीं मिल रही हो, मुकदमे में विजय नहीं मिल रही हो। कोई बीमारी ठीक नहीं हो रही हो, घर ,प्रॉपर्टी,गाड़ी इत्यादि-इत्यादि काम में सफलता नहीं मिल रही हो,तलाक की स्थिति बन रही हो। यदि इन पर बृहस्पति देव की दृष्टि हो जाए तो आपका काम तुरंत होता है

ग्रहों में गुरु ग्रह को सबसे बड़ा और प्रभावशाली माना जाता है. अगर कुंडली में गुरु ग्रह (बृहस्पति) उच्च भाव में और मजबूत होता तो इंसान बहुत प्रगति करता है. गुरु वैवाहिक जीवन व भाग्य का कारक ग्रह है

गुरु ग्रह को मजबूत बनाने के लिए या फिर इस ग्रह के दोष कम करने के लिए कुछ आसान उपाय यहां बताए जा रहे हैं

ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह का महत्व
बृहस्पति या गुरु को वैदिक ज्योतिष में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह को ‘गुरु’ कहा जाता है। यह धनु और मीन राशि का स्वामी होता है और कर्क इसकी उच्च राशि है जबकि मकर इसकी नीच राशि मानी जाती है। गुरु ज्ञान, शिक्षक, संतान, बड़े भाई, शिक्षा, धार्मिक कार्य, पवित्र स्थल, धन, दान, पुण्य और वृद्धि आदि का कारक होता है। ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह 27 नक्षत्रों में पुनर्वसु, विशाखा, और पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र का स्वामी होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिस व्यक्ति पर बृहस्पति ग्रह की कृपा बरसती है उस व्यक्ति के अंदर सात्विक गुणों का विकास होता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति सत्य के मार्ग पर चलता है।

ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह का गोचर जन्मकालीन राशि से दूसरे, पाँचवें, सातवें, नौवें और ग्यारहवें भाव में शुभ फल देता है। जिन व्यक्तियों की जन्म कुंडली में बृहस्पति ग्रह मजबूत स्थिति में होता है तो जातक के जीवन में प्रगति होती है। हालाँकि इस दौरान जातक के मोटे होने की भी संभावना बनी रहती है। गुरु के आशीर्वाद से व्यक्ति को पेट से संबंधित रोगों से छुटकारा मिलता है। कुंडली में यदि कोई भाव कमज़ोर हो और उस पर गुरु की दृष्टि पड़ जाए तो वह भाव मजबूत हो जाता है।

ज्योतिष के अनुसार मनुष्य जीवन पर गुरु का प्रभाव
शारीरिक रूपरेखा तथा स्वभाव – जिस व्यक्ति के लग्न भाव में देव गुरु स्वयं स्थित हो तो वह व्यक्ति भाग्यशाली होता है। इसके प्रभाव से जातकों का व्यक्तित्व सुंदर और आकर्षक होता है। ऐसे व्यक्ति उच्च शिक्षित, ज्ञानवान और उदारवादी विचारों के होते हैं। गुरु के प्रभाव से व्यक्ति धार्मिक और दान पुण्य करने वाला होता है। व्यक्ति को भम्रण करने में आनंद आता है और आध्यात्मिक ज्ञान को पाने के लिए जातक आतुर रहता है। यदि जन्म कुंडली में गुरु प्रथम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति के जीवन में धन का आगमन होता है और वह रत्न व स्वर्ण को धारण करता है।

बली गुरु के प्रभाव – हम जानते हैं कि कर्क बृहस्पति ग्रह की उच्च राशि है। अतः गुरु इस राशि में बलवान होगा। बली गुरु के प्रभाव से व्यक्ति को विभिन्न क्षेत्रों में लाभ प्राप्त होगा। जातक शिक्षा के क्षेत्र में अव्वल रहेगा। उसके जीवन में धन की वृद्धि होगी। व्यक्ति का पूजा पाठ में मन लगेगा। जिस व्यक्ति का गुरु बलवान होता है वह ज्ञानी और ईमानदार होता है। वह सदैव सत्य के मार्ग पर चलता है। बली गुरु के कारण व्यक्ति को संतान सुख की प्राप्ति होती है।

पीड़ित गुरु के प्रभाव – बली चंद्रमा के कारण व्यक्ति को गुरु से शुभ फल प्राप्त होते हैं। लेकिन इसके विपरीत पीड़ित बृहस्पति जातकों के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। इसके कारण जातक को विभिन्न क्षेत्रों में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यदि कोई व्यक्ति शिक्षा क्षेत्र से जुड़ा है तो उसे इस क्षेत्र में परेशानियाँ आएंगी। पीड़ित गुरु के कारण व्यक्ति की वृद्धि थम जाती है और उसके मूल्यों का ह्लास होता है। पीड़ित गुरु व्यक्ति को शारीरिक कष्ट भी देता है। व्यक्ति को नौकरी तथा विवाह आदि में परेशानी का सामना करना पड़ता है। इस स्थिति में व्यक्ति को गुरु के ज्योतिषीय उपाय करने चाहिए।

रोग – ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह से व्यक्ति को पेट से सबंधित रोग, अपच, पेट दर्द, एसिडिटी, कमज़ोर पाचन तंत्र, कैंसर जैसी बीमारी होने का ख़तरा रहता है।

कार्यक्षेत्र – ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह अध्यापन, संपादन कार्य, पनवाड़ी, हलवाई, इत्र का कार्य, फिल्म निर्माण, पीली वस्तुओं का व्यापार, आभूषण विक्रेता आदि कार्यों से संबंध रखता है।

उत्पाद – स्टेशनरी से संबंधित वस्तुएँ, खाद्य उत्पाद, मक्खन, घी, मिष्ठान, संतरा, केला, हल्दी, पीले रंग के पुष्प, चना, दाल आदि वस्तुओं को बृहस्पति ग्रह से दर्शाया जाता है।

स्थान – स्टेशनरी की दुकान, अदालत, धार्मिक पूजा स्थल, विद्यालय, कॉलेज, विधानसभा आदि।

जानवर तथा पक्षी – ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह घोड़ा, बैल, हाथी, बाज, पालतू जानवर, मोर, व्हेल मछली, डॉल्फिन आदि पशु-पक्षियों तथा जानवरों को दर्शाता है।

जड़ – केले की जड़।

रत्न – पुखराज।

रुद्राक्ष – पाँच मुखी रुद्राक्ष।

यंत्र – गुरु यंत्र।

रंग – पीला

बृहस्पति से संबंधित मंत्र –
गुरु का वैदिक मंत्र
ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।
यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।।

गुरु का तांत्रिक मंत्र ॐ बृं बृहस्पतये नमः

बृहस्पति का बीज मंत्र ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः

धार्मिक दृष्टि से बृहस्पति ग्रह का महत्व
सनातन धर्म के अनुसार, बृहस्पति ग्रह को देव गुरु माना जाता है। महाभारत के अनुसार बृहस्पति महर्षि अंगिरा के पुत्र हैं। पौराणिक शास्त्रों के बृहस्पति ग्रह ब्रह्मा जी का भी प्रतिनिधित्व करता है। सप्ताह में बृहस्पतिवार का दिन गुरु को समर्पित है। अतः इस दिन गुरु की आराधना की जाती है। हिन्दू धर्म में केले के वृक्ष को गुरु के रूप में पूजा जाता है। बृहस्पति गुरु का वर्ण पीला है। शास्त्रों में गुरु को शील और धर्म का अवतार माना गया है।

खगोल विज्ञान में बृहस्पति ग्रह का महत्व
बृहस्पति ग्रह सौर मंडल में सबसे विशाल ग्रह है। इसका द्रव्यमान सूर्य के हज़ारवें भाग के बराबर है। हालाँकि इसका तापमान -145 डिग्री सेल्सियस है इसलिए यह बहुत ही ठण्डा ग्रह है। बृहस्पति को अंग्रेजी में जुपिटर नाम से जाना जाता है। इसमें हीलियम और हाइड्रोजन गैस है। इस ग्रह को सौर मंडल का “वैक्यूम क्लीनर“ भी कहा जाता है। यह पृथ्वी को विनाशकारी हमलों से बचाता है। खगोल विज्ञान के मुताबिक बृहस्पति के 64 प्राकृतिक उपग्रह हैं और इसका चुंबकीय क्षेत्र सभी ग्रहों में से सबसे शक्तिशाली है।

इस प्रकार आप समझ सकते हैं कि खगोलीय और धार्मिक दृष्टि के साथ ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह का महत्व कितना व्यापक है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में स्थित 12 भाव उसके संपूर्ण जीवन को दर्शाते हैं और जब उन पर बृहस्पति ग्रह का प्रभाव पड़ता है तो व्यक्ति के जीवन में उसका असर भी दिखाई देता है
[कुंडली में सन्यास के योग।

यदि जन्म -कुंडली में चार, पांच, छह या सात ग्रह एकत्रित होकर किसी स्थान में बैठे हों तो जातक प्रायः सन्यासी होता है । परन्तु ग्रहों के साथ बैठने से ही सन्यासी योग नहीं होता है वरन उन ग्रहों में एक ग्रह का बली होना भी आवश्यक है । यदि बली ग्रह अस्त हो तो भी ऐसा जातक सन्यासी नहीं होता है । वह केवल किसी विरक्त या सन्यासी का अनुयायी होता है ।

यदि बली ग्रह अशुभ ग्रहों की दृष्टि में होता है तो ऐसा जातक सन्यासी बनने का इच्छुक तो होता है लेकिन उसे दीक्षा नहीं मिलती है ।

सन्यास -योग के लिए मूल रूप से निम्न तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए

चार या चार से अधिक ग्रहों का एक स्थान पर बैठना ।

उनमें से किसी एक ग्रह का बली होना ।

बली ग्रह का अस्त न होना ।

हारे हुए बली ग्रह पर अन्य ग्रह की दृष्टि न पड़ती हो ।

उन ग्रहों में से कोई दशमाधिपति हो ।

कुछ और योग

यदि लग्नाधिपति पर अन्य किसी ग्रह की दृष्टि न हो लेकिन लग्नाधिपति की दृष्टि शनि पर हो तो सन्यास योग बनता है ।

यदि शनि पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो और शनि की दृष्टि लग्नाधिपति पर पड़ती हो तो सन्यास योग होता है ।

चन्द्रमा जिस राशि पर हो उस राशि के स्वामी पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो लेकिन उसकी दृष्टि शनि पर हो तो जातक शनि या जन्म राशि में से जो बली हो उसकी दशा -अन्तर्दशा में दीक्षा ग्रहण करता है ।

चन्द्रमा जिस राशि में हो ,उसका स्वामी निर्बल हो और उसपर शनि की दृष्टि पड़ती हो तो सन्यास-योग होता है ।

यदि शनि नवम भाव में हो उस पर किसी ग्रह की दृष्टि न हो तो जातक यदि राजा भी हो तो भी सन्यासी हो जाता है ।
यदि चन्द्रमा नवम भाव में हो और उसपर किसी भी ग्रह की दृष्टि न हो तो जातक राजयोग होते हुए भी सन्यासियों में राजा होता है ।

यदि लग्नेश वृहस्पति , मंगल या शुक्र में से कोई एक हो और लग्नेश पर शनि की दृष्टि हो तो और वृहस्पति नवम भाव में बैठा हो तो जातक तीर्थनाम का सन्यासी होता है

यदि लग्नेश पर कई ग्रहों की दृष्टि हो और दृष्टि डालने वाले ग्रह किसी एक राशि में ही हों तो भी सन्यास योग बनता है ।

यदि दशमेश अन्य चार ग्रहों के साथ केंद्र त्रिकोण में हो तो जातक को जीवन-मुक्ति होती है ।

यदि नवमेश बली होकर नवम अथवा पंचम स्थान में हो और उस पर वृहस्पति और शुक्र की दृष्टि पड़ती हो या वह वृहस्पति और शुक्र के साथ हो तो जातक उच्च स्तर का सन्यासी होता है ।

यदि सन्यास देने वाले ग्रह के साथ सूर्य,शनि और मंगल हों तो जातक दुनियादारी से घबराकर और जीवन से निराश होकर सन्यासी बन जाता है ।

त्रिषडाय भाव का परिचय।

जन्म कुंडली का तृतीय भाव, छटा भाव तथा एकादश भाव त्रिषडाय भाव होते हैं ।
शनि जैसे पापग्रह त्रिषडाय भाव में अच्छे माने जाते हैं।

तृतीय भाव से हम छोटे भाई – बहन , शौक , संचार , लेखन कार्य , छोटी यात्रायें , पराक्रम आदि देखते हैं ।

इससे दायां कंधा, बाजु , नौकर देखे जाते हैं ।

️तृतीय भाव का कारक ग्रह मंगल है ।

षष्टम भाव रोग ,शत्रु तथा ऋण का भाव है । इस भाव से हम कोर्ट – कचहरी , लडाई –झगडा , लोन ,हिंसा , चोर , संघर्ष, प्रतियोगिता , नौकर – चाकर , ईर्ष्या , कमर से नीचे बस्ति, मामा ,मौसी आदि देखते हैं ।

षष्टम भाव के कारक ग्रह शनि और मंगल हैं ।

इसी प्रकार एकादश भाव लाभ भाव होता है । इसी भाव से जातक को प्राप्ती होती है चाहे वह लाभ की प्राप्ती हो या ज्येष्ठ भ्राता , मनोकामना पूर्ति , मान- सम्मान की प्राप्ती , बायां कंधा, बायां कान, मित्रता , अपने बच्चों के जीवन साथी , सुख – समृधि आदि इसी भाव से विचार किये जाते हैं ।

एकादश भाव में स्थित सभी ग्रह जातक को लाभ देते हैं । यहां तक के इस भाव में वक्री ग्रह भी शुभ फल देते हैं । किंतु शुक्र को यहां शुभ नहीं माना गया ।️गुरु इस भाव के लिये कारक ग्रह है ।

त्रिषडाय भाव का प्रथम त्रिषडाय भाव तृतीय भाव है । यह प्रथम काम भाव भी है । काम अर्थात इच्छा पूर्ति की चेष्टा तथा इसका कारक मंगल जैसा कि बताया जा चुका है । तृतीय भाव का सम्बंध जातक में प्राप्ती की चेष्टा उत्पन्न करताहै । मंगल जातक में साहस देता है कि वह इस पथ पर आगे बढे ।

शायद इसी कारण से तृतीय भाव का कारक ग्रह मंगल जैसा तीव्र तथा पापी ग्रह है तथा इसीलिय यह कहा जाता है कि तृतीय भाव में पापी ग्रह स्थित हो तो जातक में ऊर्जा और साहस का संचार करते हैं।

षष्टम भाव अर्थ त्रिकोण का दूसरा त्रिकोण है । जहां प्रतिस्पर्धा भी है , लडाई –झगडा भी है, शत्रु भी है । कहने का अर्थ यह है कि षष्टम भाव तथा षष्ठेश भी धन से सम्बंध रखता है परंतु लडाई ‌झगडे से प्राप्त धन, लोन या ऋण से प्राप्त धन ।

शायद इसी कारण इसके कारक ग्रह मंगल अर्थात लडाई –झगडा व शनि अर्थात कोर्ट –कचहरी है। यदि षष्टम भाव / षष्ठेश का सम्बंध दशम भाव / दशमेश से हो जाये तो जातक दूसरों के
लडाई-झगडे से फायदा उठाता है क्योकि छटा भाव दशम भाव से नवम है तथा दशम भाव छटे भाव से पंचम भाव है।

इसी प्रकार यदि तृतीय भाव / भावेश का सम्बन्ध छटे भाव से हो जाता है तो जातक की ऊर्जा , हिम्मत , पराक्रम , जातक की संघर्ष शक्ति , प्रतियोगिता क्षमता से साथ जुड जाती है । तो जातक अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है।
विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत से काम लेता है। उसमें लक्ष्य तक पहुंचने की लगन होती है । जिसके लिये वह सदैव प्रयासरत रहता है ।

एकादश भाव काम त्रिकोण का अंतिम त्रिकोण भाव है । अत: इस भाव में इच्छायें हैं मनोकामनायें हैं। इस त्रिकोण के साथ जिस भी त्रिकोण अर्थात धर्म ,अर्थ , काम या मोक्ष का सम्बंध बनता है उससे सम्बंधित लाभ , हानि, इच्छापूर्ति होती है । इसलिये इस अंतिम काम त्रिकोण मे सभी ग्रह प्राप्ति तक पहुचाते हैं ।

त्रिषडाय भावों को शुभ नहीं माना जाता इसका कारण है ! शायद इसमें दो काम त्रिकोण भाव हैं तथा एक अर्थ त्रिकोण भाव है । इन तीनों का सम्बंध जातक को लाभ प्राप्ति के लिये प्रेरित करता है ! फिर चाहे वो जैसे भी प्राप्त हो । व्यक्ति में प्रतिस्पर्धा होती है ,दूसरों को पीछे छोड कर आगे पडने की प्रवृति होती है ।

उसके लिये वो नैतिक अनैतिक कैसे भी कदम उठा सकता है। उसमें ऊर्जा होती है परंतु उसमें कर्म नहीं होता । जातक को बिना मेहनत के , चोरी से , दूसरों से लडाई – झगडे से, लोन से तथा ऋण आदि से लाभ की प्राप्ति होती है ।

त्रिषडाय भाव में यदि दशम भाव भी जोड दिया जाये तो यह उपचय भाव बन जाता है । दशम भाव जातक का कर्म स्थान होता है । इससे हम नौकरी / व्यवसाय, उच्च पद, अधिकार आदि देखते हैं । त्रिषडाय भाव में दशम भाव जुडने से अब यह उतना अशुभ नहीं रह जाता । इसमें जातक का पुरूषार्थ जुड गया । यदि किसी जातक की जन्म कुंड्ली में उपचय भावों अर्थात तृतीय भाव,षष्टम भाव , दशम भाव तथा एकादश भाव का सम्बंध आ जाता है तो ऐसा जातक “ फर्श से अर्श तक ” पहुंच जाता है । वह ना खुद आराम से बैठता है और ना ही किसी को बैठने देता है ।

जातक जब अपने संघर्ष में , प्रतिस्पर्धा मे अपने कर्मों को साहसपूर्ण व ऊर्जापूर्ण रूप से जोडता है तो उसको श्रेष्ठ की प्राप्ति होती है ।

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