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स्वस्थ्य भारत-समृद्ध भारत

छाछ की वैज्ञानिक उपयोगिता-1
ताजा छाछ सात्विक एंव आहार की दृष्टि से अति श्रेष्ठ खाद्य मानी गई है। हमारे जहां खट्टी छाछ में बेसन के घोल के साथ कढ़ी बनायी जाती है। यह कढ़ी स्वादिष्ट तो रहती ही है, इससे यह हरेक बालक, वृद्ध, युवा और प्रौढ़ तथा सभी समुदाय के स्त्री-पुरूष को खूब पंसद आती है। बल्कि यह सहज पचने योग्य भी रहती है। कढ़ी तैयार करते समय उसमें जो मैथी आदि का छौंक लगाया जाता है, उनसे भी इसकी पौष्टकता और औषधीय गुणवत्ता बढ़ती है। ऐसी कढ़ी उदर पीड़ित रोगियों के साथ-साथ अर्जीण, मोटापे से पीड़ित और अस्थि रोगों से त्रस्त लोगों के लिए विशेष बन जाती है। मेथी और छाछ के परस्पर मेल से तैयार कढ़ी भूख में वृद्धि करती है, अतः जिन्हें अजीर्ण की शिकायत रहती है, उन्हें तो अवश्य कढ़ी का सेवन करना चाहिए। कढ़ी सेवन से उनकी यह परेशानी स्थायी रूप में समाप्त हो जाती है।
कढ़ी रूप में छाछ और मेथी आदि के प्रभाव से आंत्र संस्थान में हाइड्ोक्लेारिक एसिड़ की तीव्रता एंव उसका रिसाव धीमा पड़ता है। इसलिए इससे अम्ल पित्त् जैसे- खट्टे डकार आना, छाती में भारीपन और गैस आदि बनने की संभावना नहीं रहती। आमतौर पर देखा जाता है कि कढ़ी सेवन के पश्चात् लोगों को न तो खट्टी डकार आती है और न सामान्य डकार। अतः जिन लोगों को गैस ज्यादा बनती है, बार-बार मलद्वार से गैस छोड़ने पर शर्मिन्दी झेलनी पड़ती है, उन्हें मेथी की छौंक वाली कढ़ी सेवन से मुक्ति मिलती है।
मेथी वाली कढ़ी यूरिक एसिड़ की शिकायत करने वालों और अस्थि सन्धियों में ऐंठन, तनाव और पीड़ा आदि की शिकायत वालों के लिए भी लाभप्रद है। कढ़ी से उनके शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा नहीं बढ़ती, बल्कि बढ़ी हुई मात्रा भी धीरे-धीरे घटने लगती है।
छाछ से कढ़ी ही नहीं बनती, बल्कि छाछ से लस्सी बनाकर भी प्रयोग में लायी जाती है। उत्तर-भारत, विशेषकर पंजाब, हरियाणा, हिमाचल-प्रदेश, जम्मू, उत्तर-प्रदेश आदि में तो छाछ की लस्सी बहुत लोकप्रिय है। इसे तैयार करने के लिए छाछ में चीनी और ठंडा करने के लिए बर्फ मिलायी जाती है।
पंजाब की लस्सी तो दुनिया भर में प्रसिद्ध है। पंजाब में अमृतसर और विभाजन पूर्व लाहौर की लस्सी बहुत प्रसिद्ध एंव प्रिय रही है। पर अब जहां छाछ (दही) की लस्सी तैयार करते समय उसमें मीठे स्वाद के लिए शक्कर की जगह सफेद चीनी और खोये की बर्फी, पेडा आदि के साथ केला भी मिलाया जाता है। ऐसी लस्सी स्वाद में तो विशेष बनती है, उसका गाढ़ापन भी देखते ही बनता है। परंतु इससे लस्सी का वास्तविक महत्व एक तरह समाप्त हो जाता है। स्वाद के लिए लस्सी में प्रयुक्त किये जाने वाले केला, सफेद चीनी, पेड़ा और बर्फ आदि के प्रयोग से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। ऐसी लस्सी लाभ ही जगह हानिप्रद ज्यादा साबित होती है।
दरअसल, प्राकृतिक रूप से लस्सी पित्त्, दाह, तृषा और गर्मी की उष्णता दूर करने में बहुत उपयोगी है। ग्रीष्म ऋतु में जब गर्मी की तपस झुसलाने लगती है और प्यास के मारे मुंह सूखने लगता है, उस समय छाछ की लस्सी बहुत मददगार सिद्ध होती है। यह प्यास के साथ-साथ शरीर की गर्मी को भी शान्त करने का कार्य करती है। लेकिन जब लस्सी तैयार करते समय उसमें सफेद चीनी, खोया आदि का प्रयोग किया जाता है तो उसकी पौष्टिकता एक तरह समाप्त हो जाती है।
लस्सी का प्रयोग करते समय एक बात का विशष ध्यान रखना जरूरी है। लस्सी तैयार करते समय एक तो इसमें सफेद चीनी की जगह देसी शक्कर का प्रयोग करना चाहिए, दूसरे इसे ठंडा करने के लिए इसमें बर्फ की जगह ठंडे पानी का प्रयोग होना चाहिए। वैसे ज्यादा हितकारी तो यही है कि दही को मिट्टी के बर्तन में जमाया जाए, ताकि उसमें शीतलता का समावेश पहले से मौजूद रहे। अतिशीतल बर्फ और परिष्कृत चीनी के प्रयोग से लस्सी का वास्तविक गुण पूरी तरह समाप्त होकर यह पाचन के लिए भी भारी सिद्ध होती है। इससे यह आंत्र संस्थान पर अतिरिक्त बोझ डालने वाली साबित होती है। परिष्कृत चीनी तो वैसे भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इसी तरह लस्सी में केला मिलाकर या खोया आदि से तैयार पेडे, बर्फी आदि मिलाना भी परस्पर गुण-विरोधी सिद्ध होता है। छाछ, दही अथवा लस्सी में दूध का मिश्रण भी पथ्य की दृष्टि से निषेद्य माना गया है।
इसी तरह ठंडी छाछ की लस्सी का प्रयोग सुबह और दोपहर के समय करना तो उपयुक्त और स्वास्थ्यकारी है, किंतु बहुत से लोग संध्या और देर रात्रि में सोने से पूर्व भी लस्सी का प्रयोग करते है। ऐसा करना भी स्वास्थ्य के नियमों के विपरीत माना जाता है। संध्या और रात्रि के समय दही अथवा लस्सी का प्रयोग अम्ल पित्त्, अजीर्ण और अल्सर तक का कारण बनता है।
लस्सी को लेकर सम्पन्न हुए कुछ प्रयोगों से अनुभव में आया है कि देर रात अथवा संध्याकाल के समय लस्सी का प्रयोग करना स्वास्थ्य के प्रतिकूल रहता है। इस समय जठराग्नि मंद रहती है और उदर की पाचन क्रिया अत्यधिक धीमी पढ़ जाती है। इस समय जठर अम्ल का रिसाव अत्यधिक न्यूनता से होता है। अतः इस समय मीठी लस्सी, दही और अन्य गरिष्ठ भोजन करने से पाचन क्रिया पर अतिरिक्त बोझ पड़ने लगता है। इतना ही नहीं, आंत्र संस्थान में जठर अम्ल का रिसाव भी धीरे-धीरे अत्यधिक मात्रा में होने लगता है। लस्सी आदि के प्रयोग से इस समय आम का उत्पादन होने लगता है। यह आम अन्ततः अस्थि जोड़ों पर अपना असर डालता है। इस तरह कई तरह के विकारों की शुरूआत होती है। इसलिए अच्छा तो यही है कि रात्रि के समय छाछ, लस्सी अथवा दही की जगह एक गिलास गुनगुने दूध का प्रयोग किया जाए। अगर यह दूध भी बिना शक्कर या चीनी के लिए लिया जाए तो और उत्त्म है। अथवा दूध में सफेद चीनी की जगह देसी गुड़ का प्रयोग किया जाए। रात्रिकालीन दुग्धहार पाचक के साथ-साथ उदरांत्र क्रिया को सहज बनाये रखता है। इससे प्रातःकाल शौच का कार्य भी सहज सम्पन्न होता है। ऐसे दुग्धपान से अर्श, बवासीर और भगंदर जैसे रोगों की संभावना भी सदैव के लिए समाप्त हो जाती है।
अतः जो लोग लस्सी के शौकीन है, उन्हें एक-दो बात ठीक से समझ लेना चाहिए। एक बात तो यह समझ लेनी चाहिए कि लस्सी में सफेद चीनी का प्रयोग बिलकुल न किया जाए। चीनी और दही का परस्पर कोई मेल नहीं रहता। यह सफेद चीनी स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल रहती है। यह डायरिया, गठिया, हृदय रोग, एलर्जी और डायबिटीज तक के लिए सीधे जिम्मेदार है। सफेद चीनी से दांतों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। इसके प्रयोग से दांत पीले पड़ने लगते है और शीघ्र गिरने लग जाते है।
एक प्राचीन मान्यता के अनुसार अगर कुशा की जड़ को दही की मीठी लस्सी से नित संचित किया जाए, तो वह समूल सूखकर नष्ट हो जाता है। अन्यथा कुशा सरकंडा (हाथी घास) की तरह एक ऐसी जंगली वनस्पति है कि उसे पूरी तरह समाप्त करना लगभग असंभव रहता है। इसकी घास को कितनी भी बार काटा जाए, कितनी भी बार जड़ खोदकर उखाड़ दिया जाए, खाद-पानी से चाहे कितना भी दूर रखा जाए, फिर भी भूमि में विद्यमान इसकी छोटी से छोटी जड़ भी वर्षा की हल्की फुहार पड़ते ही जिंदा होकर फूलने लगती है और शीघ्र झाड़ी रूप धारण कर लेती है। कुश की जड़ महीनों और वर्षों तक सूखी जमींन में धंसी रह सकती है और सुअवसर की प्रतीक्षा करती है। लेकिन इस जटिल वनस्पति की जिंदगी भी मीठी छाछ सहज ही समाप्त कर देती है। इसलिए छाछ और सफेद चीनी के संयोग को ठीक से समझ लेना चाहिए। छाछ का यह संयोग वर्षा काल के तीन महीने तो और भी विषाक्त बन जाता है।
अगर, फिर भी बहुत जरूरी बन जाए तो छाछ में परिष्कृत चीनी की जगह देसी शक्कर या शुद्ध शहद का प्रयोग किया जा सकता है। यह दोनों प्राकृतिक मिठास सफेद चीनी के मुकाबले सहज है। यही आपके लिए ज्यादा अनुकूल रहेगा। लेकिन इनकी जगह अगर सेंधा नमक, काला नमक और भुना जीरा प्रयोग किया जाए, तो यह स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहद अनुकल सिद्ध होता है। सेंधा नमक/ काला नमक एंव जीरा युक्त छाछ का प्रयोग ही सर्वत्र देखा जाता है।
छाछ, दही या लस्सी सेवन से ही एक समय पूरे उत्त्री भारत, विशेषकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्त्र-प्रदेश के लोग ज्यादा स्वास्थ्य, ज्यादा सुदृढ़ और बल प्रधान माने जाते थे। पंजाब, हरियाणा के गबरूओं के चर्चे तो अब तक सुनने को मिलते है। पुरूष ही नहीं वरन् यहाॅं की महिलाओं की कद-काठी और शारीरिक लंबाई देश भर में सर्वाधिक मानी जाती थी। जहां के लोग शारीरिक रूप से ज्यादा स्वस्थ्य और तंदुरूस्त होते थे। इन लोगों का शारीरिक विकास संपूर्णतः के साथ होता था। पुरूष ही नहीं, बल्कि स्त्रियों के शरीर, रूप-रंग, सुड़ौलता और आर्कषण देखते ही बनता था। इस सुदृढ और बलिष्ठ शरीर के पीछे सबसे मुख्य कारण यही था कि यहाॅं दूध, दही, छाछ और उससे तैयार लस्सी जैसे उत्पाद का सर्वाधिक प्रयोग होता है। ज्ञातव्य है कि इसी भू-भाग में सर्वाधिक संख्या में पशुपालन का कार्य भी होता रहा है। सर्वाधिक दूध, दही, मक्खन, घी, लस्सी आदि का प्रयोग भी यही होता है।
कहते है कि 1935 के आसपास अंग्रेजों ने यहाॅं के लोगों के स्वास्थ्य और शारीरिक कद-काठी से विस्मित होकर इसका राज जानने के लिए एक अध्ययन कराया था। इस कार्य के लिए एक विशष आयोग बनाया गया। उस आयोग ने भी कई महीनों के गहन अध्ययन-परीक्षण के पश्चात् यही निष्कर्ष निकाला कि दूध, दही का अधिक प्रयोग ही यहां की तंदु्रस्ती का रहस्य है।
दरअसल, दूध, दही आदि प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्ेट के साथ-साथ कैल्शियम, फाॅस्फोरस, मैग्नीशियम, मैगनीज, विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘डी’, विटामिन ‘बी’ समूह आदि के उत्त्म स्त्रोत रहते है। बल्कि शरीर भी इन्हें शीघ्रता से पचा लेता है। इनके पाचक अंश भी शरीर में शीघ्रता से अवशोषित हो जाते है। कैल्शियम, फाॅस्फेारस, विटामिन ‘डी’ आदि तो शारीरिक विकास, विशषकर अस्थियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। अतः पर्याप्त मात्रा में उपयोगी कैल्शियम, फाॅस्फोरस और विटामिन ‘डी’ के सहजता से उपलब्ध होने के कारण शारीरिक विकास भली भांति होता है और शरीर सहज ही अपनी पूर्णतः प्राप्त करता है। इतना ही नहीं, दूध और दूध के उत्पाद (विशषकर गौदुग्ध) से शारीरिक विकास के लिए जरूरी समझे जाने वाले कई तरह के हाॅर्मोन और स्टीराइड़ भी सहज उपलब्ध होते है। क्योकि गाय, भैंस जैसे पशु अपने स्तनों मंे दुग्ध का उत्पादन मुख्यतः अपने नवजात शिशुओं के लिए करते है। जन्मोरांत कई महीने तक इनके शिशु पूरी तरह अपनी मां के दूध पर आश्रित रहते है। इस दौरान इनके शिशु बड़ी तीव्रता से बढ़ते है। जन्म के समय गाय के बछड़े/ बछिया का वजन 40 किलो के लगभग रहता है, जो मात्र दो वर्ष के भीतर ही 100.150 किलो तक पहंुच जाता है। जबकि इनके विपरीत मानव शिशु का वजन जन्म के समय मात्र ढाई से तीन किलो के लगभग रहता है, जो 18 साल की उम्र तक पहंुचते-पहंुचते मात्र 60 से 50 किलो तक रहता है।
इस तरह गाय-भैंस के दूध में शारीरिक विकास की गति को तीव्र बनाये रखने वाले अनेक पोषक तत्वों के साथ-साथ वृद्धिकारक हाॅर्मोन और स्टीराइड़ आदि भी पर्याप्त मात्रा में विद्यमान रहते है। दूध में विद्यमान रहने वाले यही हाॅर्मोन और स्टीरायड़ शारीरिक विकास और कद-कठी का निर्धारण करते है, अतः गाय-भैंस के बच्चे के शारीरिक विकास में कोई अवरोध नहीं आता। उनका शारीरिक विकास अपनी सामान्य कद-काठी पाकर रहता है। ऐसा पौष्टिक और वृद्धिकारक दुग्ध और उससे बने पदार्थ उत्तर भारतीय में काफी प्रचलित है। इसलिए इनका शारीरिक आकार, शरीर की ऊॅंचाई और कद-काठी अन्य भारतीयों के मुकाबले ज्यादा देखी जाती है। दुग्धाहार यहां के लोगों की सेहत का मुख्य राज है। इसी कद-काठी के बल पर यहां के लोग सेना, पुलिस और खेल-कूद आदि में अपनी विशष पहचान बनाने में सफल होते रहे हैं।
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