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पिछली पोस्ट का शेष् भाग…..
छाछ की वैज्ञानिक उपयोगिता-2

यद्यपि, अफसोस इस बात का है कि पिछले चार-पाॅंच दशक से इन राज्यों के खानपान पर गहरा दुष्प्रभाव पड़ा है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में अंजाने ही यहां का खानपान और रहन-सहन एकदम बदलने लगा है। एक तो यहाॅं अब प्राकृतिक जैविक अनाज की जगह रासायनिक खाद और कीटनाशकों की मदद से उगाया जाना वाला अन्न, दाल, चावल, साग-सब्जियां उपयोग होने लगी है। इसी तरह देसी गुड़, शक्कर, राव और प्राकृतिक शहद आदि की जगह भी रासायनिक प्रक्रिया से तैयार परिष्कृत सफेद चीनी और रसायन युक्त गुड़ आदि प्रयोग में लाये जाते है। सबसे गहरा और दुष्कारी प्रभाव तो दुग्धपान पर पड़ा है। दूध भी अब रासायनिक मिश्रण वाला या विदेशी गाय का प्रयोग होने लगा है। इन सबका मिला जुला प्रभाव ही है कि वर्तमान में सबसे अधिक अस्वस्थ्य, बीमार, निर्बल और दवा आश्रित लोग इसी उत्त्री क्षेत्र में देखे जाते है।
अगर शारीरिक वजन, मोटापे की बात की जाए, तो पंजाब इस मामले में भी शिखर पर है। मोटापे के बाद डायबिटीज, हृदय रोगियों की बात की जाए तो इस मामले में भी पंजाब, दिल्ली, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के लोग प्रथम स्थान पर आते है। इसी तरह आर्थराइटिस, अस्थि संन्धि शोथ, गठिया आदि के रोगी भी इस क्षेत्र में काफी देखे जा रहे है। इतना ही नहीं, पथरी, कैंसर ग्रस्त रोगियों की संख्या भी यहाॅं तेजी से बढ़ रही है।
खानपान में बदलाव, विशषकर रासायनिक दूध अथवा विदेशी जर्सी, होलिस्टीन, गर्नसी, ब्राडन स्वीस आदि गाय के दूध के बढ़ते उपयोग का सीधा दुष्प्रभाव शारीरिक विकास और लोगों की कद-काठी पर देखा जा रहा है। ऐसा रासायनिक मिश्रित दूध अथवा विदेशी जर्सी, होलिस्टीन, गर्नसी, ब्राडन स्वीस आदि गाय के कारण ही पंजाबी गबरू और पंजाबी जट्टी का शारीरिक विकास पूर्णतः नहीं हो पा रहा है। इसके फलस्वरूप धीरे-धीरे यहाॅं के लोगों की शारीरिक ऊंचाई घट रही है। जिस कठ-काठी के लिए पंजाबी पूरे भारत में विशष रूप से पहचाने जाते थे, अब उनकी यही पहचान मिट रही है। बल्कि अब लोगों की लंबाई बढ़ने की जगह पेट का आकार निरंतर बढ़ रहा है। मटके की तरह फूले पेट यहां की पहचान बनती जा रही है। युवतियों की लंबाई भी अब निरंतर घट रही है। यद्यपि कद-काठी में इस बदलाव के लिए कई अन्य तरह के कारक हो सकते है और यह एक शोध का विषय है। लेकिन इसके पीछे रसायन आधारित अथवा जर्सी-होलिस्टीन आदि का दूध और उससे तैयार उत्पादों का दिनोंदिन बढ़ता प्रचलन भी एक प्रमुख कारण बन रहा है।
पंजाब, हरियाणा और उत्तर-प्रदेश आदि में गाय-भैंस पालन प्राचीनकाल से एक प्रमुख शौक रहा है। एक समय जहाॅं घर-घर में गाय रखी जाती थी। भैंस का पालन तो ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में किसान और डेयरी पालकों द्वारा किया जाता था, परंतु शहरी क्षेत्रों में ज्यादातर लोग अपने घर गाय ही पालते थे। अभी केवल 30.35 वर्ष पहले की बात है जब पंजाब के शहरी क्षेत्र में घर-घर गाय बंधी देखी जाती थी। शहरों की छोटी-छोटी गलियों तक में प्रत्येक घर के बाहर खूॅंटे से बंधी एक-दो गाय अवश्य मिल जाती थी। प्रत्येक घर की निचली मंजिल में प्रायः एक-दो छोटे कक्ष गायों के लिए सुरक्षित रखे जाते थे। गौपालक भी अपनी गायों की पूरी सेवा, पूरी देखभाल करते थे। उन्हें खाने के लिए हरा चारा, खल, चैकर आदि तो दिया ही जाता था, उनके लिए स्वच्छ पानी की समुचित व्यवस्था रहती थी। अनेक पशु पालक तो अपनी गायों को गर्मी से बचाने के लिए पंखे-कूलर तक की व्यवस्था रखते थे। ग्रीष्म ऋतु में गायों को शीतलता का अहसास दिलाने के लिए शर्बत तक दिया जाता था, जबकि शीत ऋतु के दौरान उन्हें शीत से बचाये रखने के लिए गुड़, चना, तिल, अलसी और अन्य गर्म वस्तुओं के साथ-साथ कच्चा कोयला जलाकर ताप दिया जाता था। ताकि उन्हें प्रतिकूल वातावरण से सुरक्षित रखा जा सके।।
इस तरह कुछ दशक पहले तक प्रत्येक घर में इतना दूध, दही, मक्खन और छाछ हो जाया करता था कि जिससे स्वंय उनके घर की जरूरत तो पूरी होती ही थी, आस-पडौस के लोग भी दूध, दही का पूरा उपयोग करते थे। दूध, दही बेचना सामाजिक कुरीती के रूप में देखा जाता है, बल्कि आस-पडौस में भर-भर कर छाछ, दही बांटा जाता था।
पंजाब प्रांत की लाल सिंधी और साहिवाल नस्ल की गाय तथा हरियाणा प्रांत की दज्जल और हरियाणवी नस्ल की गाय की अपनी एक विशष पहचान है। गाय की यह नस्ल दूध ही अधिक मात्रा में नहीं देती, बल्कि यह मानव के शारीरिक और मानसिक विकास के साथ-साथ उसके स्वास्थ्य पर अनूकल प्रभाव रखती है। इनका दूध बहुत ही पौष्टिक और निरोगता बनाये रखने वाला है। क्योकि इनके दूध में सभी उपयोगी पोषक तत्व तो पर्याप्त मात्रा में रहते ही है, साथ निरोगता प्रदान करने वाले अनेक बहुमूल्य तत्व भी पाये जाते है।
परंतु दुर्भाग्यवश विगत कुछ दशक से अंजाने या भ्रमित होकर जहां के पशुपालक, विशषकर किसान, डेयरी पालक और आमजन सभी अपनी लाल सिंधी, सहिवाल और हरियाणवी और दज्जल नस्ल की गाय बेचकर उनकी जगह या तो गाढ़े दूध (हाई गे्रविटी मिल्क) के लालच में मुर्रा नस्ल की भैंस पालने लगे या फिर अधिक मात्रा में दूध के लालच में देसी नस्ल की जगह विदेशी नस्ल की आयात की हुई जर्सी, होलिस्टीन, फ्रिजियन आदि नस्ल की गाए रखने लगे। यद्यपि इसमें किसान और पशुपालकों को कोई गलती नहीं थी, उन्हें तो वास्तव में देसी और विलायती गाय में कोई अन्तर ही दिखाई नहीं दिया और न वह गाय-भैंस के दूध में ही कोई अंतर समझ सके। उनके लिए तो प्रत्येक सफेद तरल ही दूध जैसा बन गया। गुण-दोश की बात तो बहुत दूर, समय रहते न तो किसी सरकार और न ही किसी सरकारी तंत्र, किसी अखबार अथवा कोई आहार विशषज्ञ ही इस अंतर को समझ सका। ज्यादातर आहार विशषज्ञ और सरकारी तंत्र तो ज्यादा गाढ़े दूध की गुणवत्ता और विशषता ही बताते रहे।
दरअसल, एक तरह से सभी श्वेत तरल को दूध ही मानते रहे। उस समय न तो सरकारी तंत्र और न ही सरकारी स्वास्थ्य विभाग देसी-विलायती दूध, देसी गाय-भैंस और विलायती गाय के दूध के फर्क को समझ सका और न आज तक इनके अंतर को जान पाया है। स्कूल, काॅलेज और डाॅक्टरी पुस्तकों तक में यही लिखा जाता रहा, यही बताया जाता रहा, कि प्रोटीन का एकमात्र प्रमुख स्त्रोत मांस, मछली, अण्डा और दूध ही है। शाकाहारी लोगों के लिए तो दूध ही एकमात्र प्रोटीन का स्त्रोत बनकर रह गया। जबकि हाई ग्रेविटी वाले गाढ़े दूध को श्रेष्ठ बताया जाने लगा और देसी नस्ल की गाय के कम गाढे़ दूध (कम फेट युक्त) को पौष्टिक दूध को कमतर सिद्ध किया जाने लगा। भैंस अथवा जर्सी नस्ल की होलिस्टीन गाय के अधिक ग्रेविटी वाला दूध ज्यादा पोष्टिक और स्वास्थ्य हितकारी घोषित किया जाने लगा। इस दुष्कारी षड़यंत्र, इस भ्रम जाल में फंसकर भोले भाले लोग और देहाती पशुपालक किसान अपनी देसी नस्ल की गाय की जगह भैंस या अधिक दूध के लालच में विदेशी नस्ल की गाए रखने लगे। इस तरह समाज में भी पौष्टिक और स्वास्थ्य हितकारी दूध की जगह गाढ़ा रासायनिक दूध या विदेशी नस्ल की गाय का दूध प्रचलित होता गया।
उसके बाद से ग्रेविटी मीटर, दूध का गाढ़ापन नापने और फैट की मात्रा जाॅंचने वाला यंत्र भी जगह-जगह रखा जाने लगा। एक तरह यह ग्रेविटी मीटर दुग्ध पालकों को डराने का एक मुख्य हथियार ही बन गया। इस ग्रेविटी मीटर को एक योजनावद्ध तरह से लोकप्रिय बनाया गया। इसकी मदद से एक तरफ यहां लोगों में भैंस का दूध या विदेशी गाय के दूध को लोकप्रिय किया गया, तो दूसरी तरफ कम ग्रेविटी वाला देसी गाय का स्वास्थ्यवर्द्धक दूध अलोक प्रिय बनाया गया। इस तरह कम ग्रेविटी के कारण हमारी अपनी गाय का पौष्टिक दूध भैंस या विदेशी गाय के दूध से निम्न स्तरीय माना जाने लग। दूसरी तरफ भैंस और विदेशी गाय के दूध को अधिक गाढ़ा, अधिक फेट युक्त और ज्यादा पौष्टिक बताकर स्वास्थ्य के लिए अनुकूल सिद्ध किया गया। धीरे-धीरे अंजाने में ही यह बात लोगों के मन में घर करती गई। इस तरह अधिक चिकनाई वाला दूध की तरह प्रतीत होने वाला यह तरल शारीरिक स्वास्थ्य की वस्तु बन गया।
यद्यपि आगे चलकर अधिक फैट के कारण यही दूध लोगों के शरीर पर बुरा प्रभाव डालने भी सिद्ध हुआ। इसी के कारण समाज में मोटापा, ह्नदय रोगियों, मधेमुह, गठिया, एलर्जी आदि के मामले तेजी से बढ़ने लगे। दरअसल अधिक ग्रविटी वाला यही दूध शरीर में पहंुचकर बुरी कोलेस्ट्ाॅल और ट्ाइग्लिसराइड नाम से कुख्यात लो-डिन्सेटी प्रोटीन का स्तर बढ़ने का कारण सिद्ध होने लगा। रक्त में कोलेस्ट्ाॅल और ट्ाइग्लिसराइड जैसी लो-डिन्सेटी प्रोटीन का स्तर बढ़ने के फलस्वरूप रक्त वाहिनियां मोटा और संकरी होने लगी और उसके फलस्वरूप हृदय जन्य बीमारियों के साथ-साथ हृदयाघात का खतरा निरंतर बढ़ता गया। रक्त वाहिनियों के कठोर और सख्त बनने से ही रक्तचाप बढ़ने लगा। इतना ही नहीं, इसी कारण यकृत और वृक्क संबंधी विकार भी तेजी से बढ़ने लगे।
एक तरह मोटोपा, हृदय, वृक्क, यकृत आदि अंगों से संबंधित रोगों के लिए उच्च और संतृप्त वसा को जिम्मेदार ठहराया गया। अतः जब लोगों के शरीर-रक्त में कोलेस्ट्ाॅल एंव ट्ाइग्लिसराइड आदि का स्तर बढ़ने लगा तो फिर प्रोटीन के यही श्रेष्ठ स्त्रोत, मांस, मछली और दूध बुरी कोलेस्ट्ाॅल के लिए भी जिम्मेदार ठहराये जाने लगे। इस तरह रक्त वाहिनियों के मोटा व संकरा होने को रोकने के मांसाहार की जगह दूध और उसके उत्पाद को बंद कराने का अभियान शुरू हो गया। जबकि समस्त समस्या का मूल कारण जर्सी, गर्नसी, ब्राडन स्वीस आदि गाय का दूध, सफेद चीनी और रिफाइण्ड तेल के साथ मांसाहार थे।
संतृप्त वसा (सैच्युरेटिड फैट) के सबसे बड़े स्त्रोत लाल मांस जैसे- बीफ, चिकन और पाॅर्क का मांस, पाम आयल, काॅटन सीड आॅयल, सूर्यमुखी आॅयल आदि के साथ जर्सी गाय का दूध, दुग्ध पाउडर, चीज, सफेद चीनी आदि रहते है। लेकिन अपना पैक्ड़-प्रक्रिया युक्त आहार और उन्हें डिब्बा बंद करके बाजार में बेचने वाली कंपनियां अपने पैसे के बल पर स्वास्थ्य विशषज्ञों का मुंह बंद करके, सारा का सारा दोष प्राकृतिक तेल, (देसी गाय के) दूध, घी आदि के सिर मंढ़ने में कामयाव होती रही। इस दुष्प्रभाव का सबसे बड़ा नुक्सान हमारी देसी गाय को उठाना पड़ा। इसके बाद से लोग वास्तविक दूध की जगह किसी भी तरह का दूध पीने लगे या फिर आहार विशेषज्ञों की सलाह पर दूध, घी आदि छोड़कर कृत्रिम रसायन आधारित टाॅनिक्स पर आ गए।
रिफाण्ड आॅयल और विदेशी गाय के दूध, दुग्ध पाउडर और उसके घी आदि के मुकाबले देसी मुर्रा नामक भैंस का दूध और उसका घी पोषक तत्वों की दृष्टि से ज्यादा श्रेष्ठ है। लेकिन भैंस का यह दूध और उससे तैयार उत्पाद भी देसी गाय के दूध और उसके उत्पाद के मुकाबले पौष्टिक गुणों की दृष्टि में निम्न स्तर के साबित होते है। भैंस का दूध शारीरिक बल, वीर्य वृद्धि की दृष्टि से तो उत्त्म साबित होता है। यह दूध शारीरिक ग्रोथ में भी मदद करता है। भैंस के दूध में गाय के दूध की तरह शारीरिक विकास के लिए सभी जरूरी पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में रहते है, किंतु भैंस का दूध मानसिक विकास के मामले में गौदुग्ध के सामने बिलकुल नहीं ठहरता। भैंस के दूध से शरीर में बल-वीर्य की तो अवश्य वृद्धि होती है, परंतु दूसरी तरफ यह दूध शरीर में आलस्य का भाव जाग्रत करता है। इसके प्रयोग से मानसिक क्षमता का विकास पूरी तरह नहीं होता। भैंस के दूध से बौद्धिक क्षमता, पढ़ा-लिखाई, स्मरण क्षमता बढ़ाने और निर्णय क्षमता के विकास में कोई मदद नहीं मिलती, बल्कि इसके नियमित प्रयोग से व्यक्ति चंचल और शान्त स्वभाव की जगह आलसी और एक तरह झगड़ालू स्वभाव का बनता जाता है। इस कारण सारे दिन व्यक्ति के मन पर निद्रा और आलस्य का आवेश छाया रहता है। इसलिए भैंस का दूध कृषक, मजदूर, पहलवानी का शौक रखने वाले, खेल-कूद में हिस्सा लेने वाले, सैना और पुलिस में कार्यरत् लोगों के लिए तो कुछ हद तक अनुकूल आता है, परंतु बौद्धिक स्तर का कार्य करने वाले लोग जैसे- शिक्षक, विद्यार्थी, वैज्ञानिक, वकील, शोधार्थी और चिंतन-मनन के कार्य में डूबे करने वालों के लिए यह ज्यादा अनुकूल नहीं आता।
इस तरह अधिक ग्रेविटी के भ्रम जाल में फंसकर भैंस के दूध के प्रति लगाव बढ़ता गया। वैसे भी भैंस देसी गाय के मुकाबले दो से चार गुना अधिक दूध देती है। अतः गाय के मुकाबले भैंस पालना मुनाफे का सौदा साबित होने लगा तो दूसरी तरफ भैंस के मुकाबले गाय के दूध के लिए कम मूल्य दिया जाने लगा। तीसरी तरफ अधिक दूध देने के कारण पशुपालक और आमजन भी देसी गाय की जगह विलायती नस्ल की गाय के प्रति ज्यादा आकर्षित होने लगे। वैसे भी सामान्य जन शारीरिक आकृति देखकर देसी और हाइब्रिड नस्ल की विलायती गाय में कोई अंतर नहीं समझता। इतना ही नहीं, विलायती गाय देसी गाय के मुकाबले, भैंस की तरह छह गुना तक अधिक दूूध देने की क्षमता रखती है, तो धीरे-धीरे देसी गाय के खूटंें हर घर से उखड़ते गए और उनकी जगह विलायती गाय के खूंटे गाढ़ते गये।
अधिक दूध देने वाली विलायती गाय गांव-देहात में प्रतिष्ठा और शान की प्रतीक भी बनती चली गई, तो धीरे-धीरे चहुं ओर उसका ही साम्राज्य स्थापित होता गया। सरकार भी इसके लिए जनता को निरंतर प्रेरित करती रही। सरकारें देसी नस्ल की गाय के प्रति उदासीन होने लगी, तो देसी गाय ही नहीं बल्कि उसकी नस्ल ही लोप होने लगी। सरकारें देसी सांड (नंदी) की जगह विदेशी सांड या उनके आयात किये वीर्य से देसी गायों को गर्भवती करने का प्रचलन भी चल पड़ा। इस सबका मिलाजुला परिणाम यही रहा कि बिना प्रयत्न या सोच-विचारे ही भारतीय समाज, मुख्यतः उत्तर-भारत के पंजाब, हरियाणा, हिमाचल-प्रदेश, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर-प्रदेश जैसे अनेक राज्यों तक या तो भैंस का दूध इस्तेमाल होने लगा या फिर उसकी जगह विलायती गाय का दूध। यद्यपि अधिकांश मामलों में भैंस के दूध में विलायती गाय का दूध मिलाकर या उनके साथ दुग्ध पाउडर आदि मिलाकर इस्तेमाल किया जाने लगा है।
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