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श्रीराम के बाद सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय शासक हैं विक्रमादित्य। इनपर और लिखित और उपलब्ध साहित्य भी पर्याप्त मात्रा में हैं, इसके अलावा जनश्रुति और किस्से कहानियों में भी प्रबल उपस्थिति है विक्रमादित्य की। भारतीय सभ्यता-संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में उज्जयिनी-नरेश महाराजा विक्रमादित्य का अद्वितीय योगदान है। विक्रमादित्य की प्रचण्ड लोकप्रियता से प्रभावित होकर कालांतर में अनेक हिंदू राजाओं ने अपने नाम के आगे ‘विक्रमादित्य’ लगाकर अपना गौरव बढ़ाया। विक्रमादित्य के नाम से ‘विक्रम संवत्’ अपने देश और नेपाल में प्रचलित है। यद्यपि शक संवत् भारत का राष्ट्रीय पञ्चाङ्ग है, तथापि विक्रम संवत् आसेतुहिमाचल जन-जन का पञ्चाङ्ग है। इन सब तथ्यों के होते हुए भी इतिहासकारों के मध्य महाराजा विक्रमादित्य की ऐतिहासिकता को लेकर गम्भीर विवाद है और इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में उनको स्थान नहीं मिल पाया है। यह चिन्तनीय विषय है।

ज्योतिर्विदाभरण श्लोक क्रमांक. 22-14
“येनाप्युग्रमहीधराग्रविषये दुर्ग्गाण्यसह्यान्यहो
नीत्त्वा यानि नतीकृतास्तदधिपा दत्तानि तेषां
पुनः ।
इन्द्राम्भोध्यमरद्रुमस्मरसुरक्ष्माभृङ्गुणेनाञ्जसा
श्रीमद्विक्रमभूभृताखिलजनाम्भोजेन्दुना
मण्डले ॥”
“समृद्धि में सम्राट विक्रमादित्य देवराज इंद्र जितने समृद्धशाली थे , समुद्र जैसा गांभीर्यता थे उनमें , उदारशीलता में ठीक एक कल्पवृक्ष की तरह थे , पृथ्वी की रक्षक एवं सहायक थे मेरु पर्वत की तरह एवं अश्शूर एवं आक्रमणकारियों के लिए मृत्यु थे ।“

श्री कृष्णा मिश्रा ग्रन्थ रचित ज्योतिष फलारत्नामाला (श्लोक क्रमांक-:1-10) के अनुसार सूर्यवंशी राजपूत राजा ठाकुर अमसुवर्मन नेपाल के शासक विक्रमादित्य से 19 वर्ष पूर्व 101 ईस्वी पूर्व में नेपाल के शासक बने 82 ईस्वी पूर्व में सम्राट विक्रमादित्य अवन्ती राज्य के राजा बने परन्तु ठाकुर अमसुवर्मन के प्रिय थे सम्राट विक्रमादित्य । ठाकुर अमसुवर्मन सबसे ख़ास थे सम्राट विक्रमादित्य के दरबारी राजाओ में सम्राट विक्रमादित्य के लिए प्रजा हितेषी , देश एवं धर्म हितेषी हर व्यक्ति प्रिय थे । सर्वप्रथम ठाकुर अमसुवर्मन ने 57 ईस्वी पूर्व नेपाल में प्रजाओ को हर तरह की कर मुक्त कर के विक्रम संवत का आरंभ किया एवं सम्राट विक्रमादित्य ने नेपाल राज्य के प्रजाओ को ज़मीन दान दिए थे एवं 1,000 सोने की मोहर दान किये थे ।
ठाकुर अमसुवर्मन देश एवं धर्म की रक्षा के लिए हर युद्ध में सम्राट विक्रमादित्य के साथ सैन्यदल भेजते थे एवं कई युद्ध में महाराज अमसुवर्मन भी सम्राट विक्रमादित्य के साथ युद्ध अभियान में जाते थे ।

श्लोक नो.-: (15-24)
यो रूमदेशाधिपतिं शकेश्वरं
जित्वा गृहीत्वोज्जयिनीं महाहवे ।
आनीय सम्भ्राम्य सुमोच तन्त्वहो
श्रीविक्रमार्कः समसह्यविक्रमः ॥
तस्मिन् सदा विक्रममेदिनीशे
विराजमाने समवन्तिकायाम् ।
सर्व्वप्रजामण्डलसौख्यसम्प-
द्बभूव सर्व्वत्र च वेदकर्म्म ॥

तस्मिन्नति:- स्पष्टं ।

अर्थात
आपने रोम के सबसे क्रुर राजा कैलिगुला उर्फ़ जूलियस सीजर के बारे में तो सुना ही होगा । ये शासक रोम के सबसे क्रुर शासकों में शूमार है । लेकिन आप को फक्र होगा ये जानकर, कि इसी क्रुर शासक को राजपूत सम्राट विक्रमादित्य ने कुत्ते की तरह भारत की गलियों में घुमाया था ।

रोम के शासक जूलियस सीजर कितना क्रूर था यह आप इस बात से पता लगा सकते हैं सीजर के साम्राज्य का दूत ओक्टेवियन सम्राट विक्रमादित्य के पास सहायता मांगने आये थे रोम की भूमि तप चुकी थी सीजर के अत्याचार से प्रजा भुखमरी से मर रहे थे सम्राट विक्रमादित्य रोम की प्रजा को अत्याचार एवं क्रूरता से मुक्त करने के लिए जूलियस सीजर के विरुद्ध युद्ध घोषणा किया (इसपर हॉलीवुड की एक फिल्म भी बनीं, इस फिल्म में सीजर के उन अत्याचारों पर फिल्मांकन किया गया, जो वो लोगों के साथ किया करता था । सीजर का सिर्फ फिल्मांकन देखकर कई देशों की सरकारों ने वहां के देशों में फिल्म को पूरी तरह बैन कर दिया। सीजर की क्रूरता की वजह से ये फिल्म कई देशों में अब भी बैन है।) । कई झोलाछाप इतिहासकार कहते हैं सीजर भारत में आकर हिन्दुओं को बंदी बनाकर ले गया था यह पूर्णरूप से असत्य हैं भारत का सम्राट विक्रमादित्य जिन्होंने चारो दिशाओं में अपने १४ करोड़ सैनिक भारतवर्ष (प्राचीन भारतवर्ष को आज दो भागों में बांटा गया हैं प्रथम एशिया द्वितीय यूरेशिया) की सीमा में सुरक्षा सैन्यबल तैनात किये थे तो यह मिथ्या प्रचार कर सम्राट विक्रमादित्य को कमजोर दिखाना छोड़ दे क्योंकि रोमन इतिहासकार Abbott Frost (1901). A History and Description of Roman एवं इतिहासकार Diana Heichelheim. Rome Against Ceasar , The Great Roman Civil War. ने इस बात की पुष्टि कर चुके हैं की (Lord of Eurasia’s Firelord dynasty ruler defeated Gaius Julius Caesar in the year of 78 B.C which fought in the bank of Rubicon River, the boundary between the Cisalpine Gaul province to the north and Italy proper to the south) इससे पता चलता हैं रोम के शासक जूलियस सीजर एवं सम्राट विक्रमादित्य के मध्य लड़े गये युद्ध मिस्र के दक्षिणी भाग में लड़ा गया था । रोम शासक जूलियस सीजर को परास्त कर बन्दी बनाकर उज्जैन में घुमाया था (७८ इसा पूर्व में) तथा बाद में छोड़ दिया, इसे रोमन लेखकों ने बहुत घुमा फिराकर जलदस्युओं द्वारा अपहरण बताया है तथा उसमें भी सीजर का गौरव दिखाया है कि वह अपना अपहरण मूल्य बढ़ाना चाहता था। इसी प्रकार सिकन्दर की पोरस (पुरु वंशी राजा) द्वारा पराजय को भी ग्रीक लेखकों ने उसकी जीत बताकर उसे क्षमादान के रूप में दिखाया है । (Gaius Julius Caesar (13 July 100 BC – 15 March 44 BC) — In 78 BC, — On the way across the Aegean Sea, Caesar was kidnapped by pirates and held prisoner. He maintained an attitude of superiority throughout his captivity. When the pirates thought to demand a ransom of twenty talents of silver, he insisted they ask for fifty. After the ransom was paid, Caesar raised a fleet, pursued and captured the pirates, and imprisoned them. He had them crucified on his own authority.
Quoted from History of the Calendar, by M.N. Saha and N. C. Lahiri (part C of the Report of The Calendar Reforms Committee under Prof. M. N. Saha with Sri N.C. Lahiri as secretary in November 1952-Published by Council of Scientific & Industrial Research, Rafi Marg, New Delhi-110001, 1955, Second Edition 1992.
Page, 168-last para-“Caesar wanted to start the new year on the 25th December, the winter solstice day. But people resisted that choice because a new moon was due on January 1, 45 BC. And some people considered that the new moon was lucky. Caesar had to go along with them in their desire to start the new reckoning on a traditional lunar landmark.”)

परन्तु 18वि सताब्दी के रोमन इतिहासकारों ने सच्चाई को उजागर किया A History and Description of Roman इस तरह वर्णन किया गया हैं सन 78 ई.पूर्व रोम शासक जूलियस सीजर को एशिया के सम्राट परास्त कर बन्दी बनाकर एशिया ले गये एवं कई महीनो तक बंदी बनाकर रखने के बाद जूलियस सीजर को रिहा किया गया यह एक शिक्षा थी जूलियस सीजर जैसे क्रूर शासक को जिन्होंने रोम राज्यके प्रजाओं का शोषण किया उनपर अनगिनत अत्याचार किये , एशिया के सम्राट विक्रमादित्य ने
रोम राज्य के प्रजा को मुक्त किये एवं रोम राज्य की प्रजाओ द्वारा आग्रह करने पर रोम के राजगद्दी पर सम्राट विक्रमादित्य बैठे रोम राज्य पर सुधार किये कई तरह के प्रशासनिक एवं शिक्षा के लिए नए पाठशाला का भी निर्माण करवाया एवं किशन , श्रमिकों के उप्पर लगे हर तरह के कर को ख़तम कर एक अलौकिक युग की आरंभ किये थे रोम राज्य के राजा के अनुपस्तिथि में एशिया के सम्राट ने रोम के प्रजाओ को अपने संतान तुल्य प्रेम एवं स्नेह दिए , जूलियस सीजर की सजा पूरी होने के बाद रोम को जूलियस सीजर के हाथों सौंप दिया एवं सीजर से संधि लेख करवाया की रोम के प्रजा अब एशिया के सम्राट के प्रजा हैं उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होनी चाहिए प्रजा को किसी प्रकार का अत्याचार अगर प्रजा के साथ होता हैं तो उन्हें (जूलियस सीजर) को मृत्युदंड मिलेगी । इस संधि पर जूलियस सीजर को रिहा किया गया था ।

ज्योतिर्विदाभरण की कहानी ठीक होने के कई अन्य प्रमाण हैं-सिकन्दर के बाद सेल्युकस्, एण्टिओकस् आदि ने मध्य एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने की बहुत कोशिश की, पर सीजर के बन्दी होने के बाद रोमन लोग भारत ही नहीं, इरान, इराक तथा अरब देशों का भी नाम लेने का साहस नहीं किये। केवल सीरिया तथा मिस्र का ही उल्लेख कर संतुष्ट हो गये। यहां तक कि सीरिया से पूर्व के किसी राजा के नाम का उल्लेख भी नहीं है। बाइबिल में लिखा है कि उनके जन्म के समय मगध के २ ज्योतिषी गये थे जिन्होंने ईसा के महापुरुष होने की भविष्यवाणी की थी। सीजर के राज्य में भी विक्रमादित्य के ज्योतिषियों की बात प्रामाणिक मानी गयी।

महान् सम्राट विक्रमादित्यकी महान् गाथा अरब में भी गायी जाती थी ,उसका प्रमाण है सऊदी अरब में लगी विक्रमादित्य की प्रशंसा में स्वर्ण की प्लेट । इस स्वर्ण प्लेट अभिलेख में इस प्रकार महान् विक्रमादित्य की महिमा वर्णित है – अत्यन्त भाग्यशाली लोग हैं ,जो सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल में जन्मे अपनी प्रजा के कल्याण में रत वह एक कर्तव्यनिष्ठ ,दयालु एवं सच्चरित्र राजा थे । किन्तु उस समय खुदा को भूले हुए हम अरब इन्द्रिय विषय –वासनाओं में डूबे हुए थे । हम लोगोंमें षड्यन्त्र और अत्याचार प्रचारित था । हमारे देश को अज्ञान अंधकार ने ग्रसित कर रखा था , सारा देशमें ऐसा घोर अंधकार आच्छादित था । जैसे कि अमावस्या की रात्रि को होता है । किन्तु शिक्षाका वर्तमान उषाकाल एवं सुखद सूर्य प्रकाश उस सचरित्र सम्राट विक्रम की कृपालुता का परिणाम है । यद्यपि हम विदेशी ही थे ,फिर भी वह हमारे प्रति उपेक्षा नबरत पाये । जिसने हमें अपनी दृष्टिसे ओझल नहीं किया । उसने अपना पवित्र धर्म हम लोगोंमें फैलाया उसने अपने देश से विद्वान् लोग भेजे , जिनकी प्रतिमा सूर्य के प्रकाशके समान हमारे देश में चमकी । वे विद्वान् और दूरदृष्टा थे , जिनकी दयालुता व् कृपा से हम एक बार फिर खुदाके अस्तित्वको अनुभव करने लगे । उसके पवित्र अस्तित्वसे परिचित किये गये और सत्यके मार्ग पर चलाए गये । उनका यहाँ पदार्पण महाराज विक्रमादित्यके आदेश पर हुआ!” – – जिरहम बिन्तोई (सैरुअल ओकुल) इस स्वर्ण प्लेट अभिलेखका वर्णन ईरानी इतिहासकार साइक्सने “हिस्ट्री ऑफ़ पर्शिया ” में भी किया गया है , पर दुर्भाग्यसे भारतके इतिहास से महान् विक्रमादित्य का नाम तक मिटा दिया गया है ।
संदभृ सूची:-
References in literature about Vikramāditya

  1. Bhaviṣya purāṇa (15 chapters refer to him)
  2. Kathā-sarit-sāgara, Bṛhat-kathā, Vetāla-pañchavimśati, Simhāsana-battisi
  3. Sāhasānka charita (in 3 volumes)
  4. All surviving genealogies of Paramāra kings (that survived destruction by the British)
  5. Literatures by Nava-ratnas of Vikramāditya
  6. Description of Vikramāditya by Al-Biruni, Abul Fazal, Ferishta, Badauni and other Persian historians of India
  7. Records of Vikramāditya in “Devī-Chandragupta”
  8. A History and Description of Roman
  9. Abbott Frost (1901). A History and Description of Roman
  10. Diana Heichelheim. Rome Against Ceasar

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