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ध्यान बुद्धि को सूक्ष्म करने की प्रक्रिया है।
जैसे—जैसे ध्यान करते हैं, बुद्धि के विकार गिरते चले जाते हैं। एक घड़ी आती है जब बुद्धि परिशुद्ध हो जाती है। उसमें कुछ भी विकार, कोई भी फारेन एलिमेंट, कोई भी विजातीय तत्व नहीं रह जाता। विचार तक नहीं रह जाता। बुद्धि इतनी निर्मल हो जाती है कि विचार भी नहीं करती। सिर्फ होती है। सिर्फ एक ज्योति होती है। उस ज्योति में जरा भी धुआ नहीं होता। शुद्ध प्रकाश रह जाता है-आलोक। उस शुद्ध आलोक से ही व्यक्ति माया के पर्दे में छिपे हुए ब्रह्म को जानने में समर्थ हो पाता है।
बुद्धिमान साधक को चाहिए कि पहले वाक् आदि समस्त इंद्रियों को मन में निरुद्ध करे ,उस मन को ज्ञानस्वरूप बुद्धि में विलीन करे; ज्ञानस्वरूप बुद्धि को महान आत्मा में विलीन करे और उसको शांतस्वरूप परमपुरुष परमात्मा में विलीन करे।
यह प्रक्रिया है बुद्धि के सूक्ष्म और शुद्ध होने की। शुरू करना है वाक् से, वाणी से, विचार से, शब्द से। हमारी बुद्धि विकृत है क्योंकि इतने विचारों का बोझ है! विचार ही विचार हैं। जैसे आकाश में बादल ही बादल छाए हों, आकाश खो जाए, दिखाई भी न पड़े, सूर्य का कोई दर्शन न हो, ऐसी हमारी बुद्धि है। विचार ही विचार छाए हैं। उसमें वह जो बुद्धि की प्रतिभा है, जो आलोक है, वह खो गया, छिप गया।
एक बादल हट जाए तो आकाश का टुकड़ा दिखाई पड़ना शुरू हो जाता है। छिद्र हो जाएं बादलों में तो प्रकाश की रोशनी आनी शुरू हो जाती है, सूरज के दर्शन होने लगते हैं।
ठीक ऐसे ही बुद्धि जब तक विचार से बहुत ज्यादा आवृत है.. और एक पर्त नहीं है विचार की, हजारों पर्तें हैं। जैसे कोई प्याज को छीलता चला जाए तो पर्त के भीतर पर्त, पर्त के भीतर पर्त। ठीक ऐसे विचार प्याज की तरह हैं। एक विचार की पर्त को हटाएं दूसरी पर्त सामने आ जाती है। दूसरे को हटाएं, तीसरी आ जाती है। एक विचार को हटाएं दूसरा विचार मौजूद है, दूसरे को हटाएं तीसरा मौजूद है।
पर्त दर पर्त हैं विचार,यह हमने जन्मों में इकट्ठे किए हैं, जन्मों—जन्मों में। यह धूल है जो हमारी लंबी यात्रा में हमारे मन पर इकट्ठी हो गई है।

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