Failed in Sadhna

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‘ साधना – अनुष्ठान -असफलता

रामचरितमानस मे लिखा है–

कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भये सदग्रंथ।
दंभिन्ह निजमति कल्पि करि प्रगट किये बहु पंथ।।
(उत्तरकांड–97 क)

अर्थात्–कलियुग के पापों ने सब धर्मों को ग्रस लिया, सद्ग्रंथ लुप्त हो गये, दंभियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना कर-करके बहुत-से पंथ प्रकट कर दिये।

देश भर में ऐसे बने हुए सद्गुरुओं की संख्या सैकड़ों-हजारों में होगी, जिनमें से दर्जनों तो लाखों-करोड़ों रुपये निर्लज्जतापूर्वक पानी की तरह बहा कर बनाये-सजाये बड़े-बड़े मंचों से अपना कथित आध्यात्मिक ज्ञान बघारते रहते हैं। इन्हीं में से कुछेक अब विभिन्न चैनलों के माध्यम से धर्म के नाम पर अपना कोरा भ्रमजाल फैला रहे हैं। जबकि इन्हें धर्म के वास्तविक स्वरूप तथा ईश्वर-भक्ति का लेशमात्र भी न तो कोई ज्ञान ही होता है और न इससे इनका किसी भी तरह का दूर तक कोई सम्बंध।

तंत्र , मंत्र , यंत्र , यज्ञ ,पाठ ,पूजा , अनुष्ठान जैसे अनेक विधान असफल क्यों रहते है ? मेसेंजरमे अनेक उत्सुक धर्मप्रेमिओ के इस विषय के आसपास अनेक सवाल होते है । ये सत्य भी है । ऐसे कही लोग है जिन्होंने बड़े बड़े नामधारी संप्रदायों के स्वामिओ से दीक्षित होकर कोई विधान किया और लाभ की जगह हानि हुई , अति भारी नुकसान हुवा । कोई कोई उपासको ने तो 5 करोड़ जाप के तीन तीन साल पुरुश्चरण भी किया और परिणाम शून्य । समय , धन का व्यय ओर धर्म के प्रति अश्रद्धा हो जाती है । इन सारी फसाद का जड़ है अपक्व ज्ञान और लंपट गुरुओ का मार्गदर्शन। धर्मप्रेमी उत्सुक लोगी को इस विषयमे परहेज करने लायक कुछ बाते :-

1 किसी भी पुस्तक , इंटरनेट , फ़ेसबुक पर उपासक विद्वानों द्वारा विविध समस्याओ केलिए जो विधान बताये जाते है वो हिन्दू सनातन धर्म की महान शक्तिओ से अवगत कराने केलिए होता है । वो पूर्ण विधान नही होता । क्योंकि बिना जाने पहचाने किसिभी व्यक्ति को इतने शक्तिशाली विधान नही दिए जाते । जिसकी लायकी नही है उनको नुकसान भी हो सकता है ।

2 स्वार्थी ओर नीच व्यक्ति इस विधान से सिद्धि शक्ति प्राप्त करके उनका खराब उपयोग भी कर सकता है । पुराणोंमें अनेक कथा है कि वरदान प्राप्त करके समाज पर जुल्म किया हो । इसलिए ये कीलित ( मात्र माहिती ) कर दिया होता है

3 ऐसे भी कही लोग है जो इंटरनेट और फेसबुक से पोस्ट उठाके उनकी प्रोफाइल में खुद के नामसे शेर कर देते है । कोई व्यक्ति वो पढ़कर विधान करे और किसी गलती से उनका नुकसान होता है तो ऐसे व्यक्ति के साथ साथ पोस्ट करनेवाला भी फल भुगतता है ।

4 कोई भी साधु , ब्राह्मण , उपासक आपकी समस्या और आपका स्तर जानने के बाद व्यक्तिगत रूपसे आपको जो उपासना विधान करने को कहे वो कीजिये । ( आप खुद तय मत कीजिये कि आपको ये ये विधान करना है )समय समय पर उनका मार्गदर्शन मिलता रहेगा , क्योंकि सबकी अनुभूतियां अलग अलग होती है इसलिए वो सब विधानमे नही लिखा जाता । इसलिए मार्गदर्शक जरूरी है ।

5 देवी देवता का कोई भी स्वरूप जाग्रत होने लगता है तब हमारे आसपास अलग अलग घटनाए होने लगती है । पशु , पक्षी , मनुष्य अनेक स्वरूप में वो देव शक्ति ही हमारे पास आती है । तब उन्हें कैसे पहचाने या क्या करना है ये जानकारी मार्गदर्शक दे सकते है । भिक्षु भोजन , गाय , कुत्ते को रोटी , ब्राह्मण दक्षिणा बिगैरे बिगरे उन देव की तृप्ति केलिए कहा जाता है ।

6 किसी भी साधना उपासना करने से पहले कुल परम्परा का या गुरुदीक्षा से मिले कोई एक देव की शक्ति आपके पास जागृत होनी चाहिए । हमारे साथ रही वो जागृत देव शक्ति ही हमे अन्य देवी देवता की उपासनामे सफलता दिलाती है ।

7 सिर्फ पुस्तको के प्रयोगों से अगर सफलता मिलती तो हमारे पुस्तको का उपयोग करके कही विधर्मी हमे तबाह कर देते ।

8 ज्यादातर लोग अनेक मार्गदर्शकों से जुड़े होते है , ओर अलग अलग अनेक विधान एक साथ करते होते है । अश्रद्धा का मूल कारण ये भी है । जब एक मार्गदर्शक , एक देव , एक विधान पर पूर्ण श्रद्धा हो तब ही सफल हो सकते है ।

धर्म की जानकारी केलिए विविध विषय , विविध विधान पढ़िये वो अच्छी बात है । अनेक साधु उपासको को पढ़िये ये भी ज्ञानवर्धक है , पर रदय पूर्वक जिन एकमे आपकी श्रद्धा हो उस मार्ग पर ही प्रयत्न कीजिये । कलियुग है चारोतरफ तर्कटी स्वामिओ ओर उपासको व्यापार लेके खड़े है । आपको गेरेन्टी के साथ सफलता दिलाने की बाते करते है पर जरा ये भी सिचिये की वो अगर ऐसा सिद्ध पुरुष है तो उनको ये सब करने की क्या जरूरत है ?

जीवमात्र को शिव प्राप्त करने का अधिकार है , पर मार्ग सही होना चाहिए । कर्म करना , भक्ति करना वो हमारा कार्य है और फल देना वो ईश्वर का कार्य है । ईश्वर हमे जो दे वही हमारे लिए कल्याणकारी है ऐसा जब भाव होता है , तब ही देवकृपा होती है । कब मिलेगा , कितना मिलेगा ऐसे तर्क वितर्क व्यर्थ है , क्योंकि धर्म कोई व्यापार नही है कि इतना किया तो इतना मिलना ही चाहिए । हरेक आत्मा ही ईश्वर का अंश है । देव शक्ति हमारे देहमे ही जागृत होती है ।

        

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