Maa Chinnmasta

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माता छिन्नमस्तिका जन्मोत्सव विशेष
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दस महा विद्याओं में छिन्नमस्तिका माता छठी महाविद्या॒ कहलाती हैं. इस वर्ष देवी छिन्नमस्तिका जयंती 7 मई 2020, के दिन मनाई जाएगी. यह जयंती भारत वर्ष में धूमधाम के साथ मनाई जाती है. माता के सभी भक्त इस दिन माता की विशेष पूजा अर्चना करते हैं।

छिन्नमस्तिका देवी को मां चिंतपूर्णी के नाम से भी जाना जाता है. देवी के इस रूप के विषय में कई पौराणिक धर्म ग्रंथों में उल्लेख मिलता है. मार्कंडेय पुराण व शिव पुराण आदि में देवी के इस रूप का विशद वर्णन किया गया है इनके अनुसार जब देवी ने चंडी का रूप धरकर राक्षसों का संहार किया।

छिन्नमस्ता जयंती का महत्व है
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हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, छिन्नमस्ता माता देवी काली का एक अद्वितीय अवतार हैं क्योंकि उन्हें जीवन हरने वाली के साथ साथ जीवन दाता भी माना जाता है।

ऐसा माना जाता है कि जो भक्त देवी छिन्नमस्ता की पूजा करते हैं, उनको उनकी सभी कठिनाइयों से छुटकारा मिलता है।

देवी छिन्नमस्ता की पूजा करने से भक्तों की आध्यात्मिक के साथ-साथ सामाजिक ऊर्जा में भी वृद्धि होती है।

यह भी माना जाता है कि देवी की पूजा करने से, भक्त संतान, कर्ज और यौन समस्याओं से संबंधित विभिन्न मसलों से खुद को बचा सकते हैं।

व्यक्ति अपनी सभी इच्छाओं को पूरा करने और दुश्मनों पर विजय पाने के लिए और आर्थिक समृद्धि के लिए भी देवता की पूजा करते हैं।

राहु के कष्ट से मुक्ति
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क्यों देवी छिन्नमस्ता आपको राहुकृत पीड़ा से मुक्ति दिल सकती हैं। दोनों के ही सिर कटे हुए हैं, लेकिन फरक ये है कि दोनों के सर कटने का कारण अलग अलग है। राहुचोरी से अमृत पी रहे थे इसलिए उनका सिर कटा और देवी छिन्नमस्ता ने अपनी सहचरियों की भूख मिटाने के लिए अपना सिर खुद काटा और उनकी भूख मिटाई। जमीन और आसमान का फरक है दोनों के उद्देश्यों में, दोनों का सर कटा हुआ है, उगता हुआ सूरज भी लाल रंग का होता है और डूबता हुआ सूरज भी लाल रंग का, लेकिन बड़ा फरक है दोनों में, डूबते हुए सूरज को कोई नही पूछता। और अगर सूरज डूबने के कारण अंधेरा हो जाए तो उस अंधेरे को फिर उगता सूरज ही खत्म कर सकता है। राहु के मिथुन राशि में गोचर के कारण कोरोना फैल रहा है, मानव जाति के आगे अंधेरा छा गया है, राहुअंधकार है तो देवी छिन्नमस्ता उसे विदीर्ण करने वाली सूर्य हैं। उनकी जयंती पर उनकी उपासना अमृत की तरह सेव्य है।

आज के दिन विशेष संयोग ये है कि आज रात 8 बजकर 38 मिनट तक सिद्धि योग रहेगा। किसी भी प्रकार की सिद्धि प्राप्त करने, प्रभु का नाम जपने के लिए यह योग बहुत उत्तम है। इस योग में जो कार्य भी शुरू किया जाएगा वह सिद्ध होगा अर्थात सफल होगा। साथ ही आज दोपहर 1 बजकर 51 मिनट तक सारे काम बनाने वाला रवि योग भी रहेगा।

आज, यानी वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी के साथ अगर स्वाति नक्षत्र,शनिवार का दिन, सिद्धि योग एवं वणिज करण हो तो कई गुना पुण्य प्राप्त होता है। आज शनिवार तो नहीं है लेकिन वणिज करण आज शाम 7 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। अर्थात आज दोपहर 1 बजकर 51 मिनट के बाद से स्वाति नक्षत्र, जो राहुका अपना नक्षत्र और राहुकि पीड़ा से मुक्ति दिलाने में सहायक है आज रात 8 बजकर 38 मिनट तक रहेगा जबकि सिद्धि योग और शाम 7:45 तक वणिज करण रहेगा। लिहाजा आज दोपहर 1 बजकर 51 मिनट से शाम 7 बजकर 45 मिनट के बीच इस अति शुभ संयोग में कोई भी उपाय करने से आपको कई गुना पुण्य प्राप्त होगा। इतनी शुभ घड़ी, दिन, तिथि और मुहूर्त में आपको जगत के कल्याण के लिए देवी छिन्नमस्ता के मंत्र का जाप जरूर करना चाहिए।

दस महाविद्या में एक देवी “छिन्नमस्तिका” साधना
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पौरिणीक कथा
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एक बार देवी पार्वती हिमालय भ्रमण कर रही थी उनके साथ उनकी दो सहचरियां जया और विजया भी थीं, हिमालय पर भ्रमण करते हुये वे हिमालय से दूर आ निकली, मार्ग में सुनदर मन्दाकिनी नदी कल कल करती हुई बह रही थी, जिसका साफ स्वच्छ जल दिखने पर देवी पार्वती के मन में स्नान की इच्छा हुई, उनहोंने जया विजया को अपनी मनशा बताती व उनको भी सनान करने को कहा, किन्तु वे दोनों भूखी थी, बोली देवी हमें भूख लगी है, हम स्नान नहीं कर सकती, तो देवी नें कहा ठीक है मैं स्नान करती हूँ तुम विश्राम कर लो, किन्तु सनान में देवी को अधिक समय लग गया, जया विजया नें पुनः देवी से कहा कि उनको कुछ खाने को चाहिए, देवी स्नान करती हुयी बोली कुच्छ देर में बाहर आ कर तुम्हें कुछ खाने को दूंगी, लेकिन थोड़ी ही देर में जया विजया नें फिर से खाने को कुछ माँगा, इस पर देवी नदी से बाहर आ गयी और अपने हाथों में उनहोंने एक दिव्य खडग प्रकट किया व उस खडग से उनहोंने अपना सर काट लिया, देवी के कटे गले से रुधिर की धारा बहने लगी तीन प्रमुख धाराएँ ऊपर उठती हुयी भूमि की और आई तो देवी नें कहा जया विजया तुम दोनों मेरे रक्त से अपनी भूख मिटा लो, ऐसा कहते ही दोनों देवियाँ पार्वती जी का रुधिर पान करने लगी व एक रक्त की धारा देवी नें स्वयं अपने ही मुख में ड़ाल दी और रुधिर पान करने लगी, देवी के ऐसे रूप को देख कर देवताओं में त्राहि त्राहि मच गयी, देवताओं नें देवी को प्रचंड चंड चंडिका कह कर संबोधित किया, ऋषियों नें कटे हुये सर के कारण देवी को नाम दिया छिन्नमस्ता, तब शिव नें कबंध शिव का रूप बना कर देवी को शांत किया, शिव के आग्रह पर पुनह: देवी ने सौम्य रूप बनाया, नाथ पंथ सहित बौद्ध मतावलम्बी भी देवी की उपासना करते हैं, भक्त को इनकी उपासना से भौतिक सुख संपदा वैभव की प्राप्ति, वाद विवाद में विजय, शत्रुओं पर जय, सम्मोहन शक्ति के साथ-साथ अलौकिक सम्पदाएँ प्राप्त होती है, इनकी सिद्धि हो जाने ओपर कुछ पाना शेष नहीं रह जाता,
दस महाविद्यायों में प्रचंड चंड नायिका के नाम से व बीररात्रि कह कर देवी को पूजा जाता है।
देवी के शिव को कबंध शिव के नाम से पूजा जाता है। छिन्नमस्ता देवी शत्रु नाश की सबसे बड़ी देवी हैं,भगवान् परशुराम नें इसी विद्या के प्रभाव से अपार बल अर्जित किया था।
शास्त्रों में देवी को ही प्राणतोषिनी कहा गया है। देवी की स्तुति से देवी की अमोघ कृपा प्राप्त होती है।

माँ का स्तुति मंत्र
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छिन्न्मस्ता करे वामे धार्यन्तीं स्व्मास्ताकम,

प्रसारितमुखिम भीमां लेलिहानाग्रजिव्हिकाम,

पिवंतीं रौधिरीं धारां निजकंठविनिर्गाताम,

विकीर्णकेशपाशान्श्च नाना पुष्प समन्विताम,

दक्षिणे च करे कर्त्री मुण्डमालाविभूषिताम,

दिगम्बरीं महाघोरां प्रत्यालीढ़पदे स्थिताम,

अस्थिमालाधरां देवीं नागयज्ञो पवीतिनिम,

डाकिनीवर्णिनीयुक्तां वामदक्षिणयोगत:।

गृहस्थ साधक को सदा ही देवी की सौम्य रूप में साधना पूजा करनी चाहिए। देवी योगमयी हैं ध्यान समाधी द्वारा भी इनको प्रसन्न किया जा सकता है। इडा पिंगला सहित स्वयं देवी सुषुम्ना नाड़ी हैं जो कुण्डलिनी का स्थान हैं। देवी के भक्त को मृत्यु भय नहीं रहता वो इच्छानुसार जन्म ले सकता है। देवी की मूर्ती पर रुद्राक्षनाग केसर व रक्त चन्दन चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है

महाविद्या छिन्मस्ता के इन मन्त्रों से आधी व्यादी सहित बड़े से बड़े दुखों का नाश संभव है।

देवी माँ का स्वत: सिद्ध महामंत्र
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ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचिनिये ह्रीं ह्रीं फट स्वाहा।

इस मंत्र से काम्य प्रयोग भी संपन्न किये जाते हैं व देवी को पुष्प अत्यंत प्रिय हैं इसलिए केवल पुष्पों के होम से ही देवी कृपा कर देती है,आप भी मनोकामना के लिए यज्ञ कर सकते हैं,जैसे-

१. मालती के फूलों से होम करने पर बाक सिद्धि होती है व चंपा के फूलों से होम करने पर सुखों में बढ़ोतरी होती है

२. बेलपत्र के फूलों से होम करने पर लक्ष्मी प्राप्त होती है व बेल के फलों से हवन करने पर अभीष्ट सिद्धि होती है

३. सफेद कनेर के फूलों से होम करने पर रोगमुक्ति मिलती है तथा अल्पायु दोष नष्ट हो 100 साल आयु होती है

४. लाल कनेर के पुष्पों से होम करने पर बहुत से लोगों का आकर्षण होता है व बंधूक पुष्पों से होम करने पर भाग्य बृद्धि होती है

५. कमल के पुष्पों का गी के साथ होम करने से बड़ी से बड़ी बाधा भी रुक जाती है

६ .मल्लिका नाम के फूलों के होम से भीड़ को भी बश में किया जा सकता है व अशोक के पुष्पों से होम करने पर पुत्र प्राप्ति होती है

७ .महुए के पुष्पों से होम करने पर सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं व देवी प्रसन्न होती है

महाअंक-देवी द्वारा उतपन्न गणित का अंक जिसे स्वयं छिन्नमस्ता ही कहा जाता है वो देवी का महाअंक है -“४”

विशेष पूजा सामग्रियां
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मालती के फूल, सफेद कनेर के फूल, पीले पुष्प व पुष्पमालाएं चढ़ाएं केसर, पीले रंग से रंगे हुए अक्षत, देसी घी, सफेद तिल, धतूरा, जौ, सुपारी व पान चढ़ाएं, बादाम व सूखे फल प्रसाद रूप में अर्पित करें, सीपियाँ पूजन स्थान पर रखें, भोजपत्र पर ॐ ह्रीं ॐ लिख करा अर्पण करें, दूर्वा,गंगाजल, शहद, कपूर, रक्त चन्दन चढ़ाएं, संभव हो तो चंडी या ताम्बे के पात्रों का ही पूजन में प्रयोग करें।

पूजा के बाद खेचरी मुद्रा लगा कर ध्यान का अभ्यास करना चाहिए सभी चढ़ावे चढाते हुये देवी का ये मंत्र पढ़ें-

ॐ वीररात्रि स्वरूपिन्ये नम:

देवी के दो प्रमुख रूपों के दो महामंत्र

१)देवी प्रचंड चंडिका मंत्र-ऐं श्रीं क्लीं ह्रीं ऐं वज्र वैरोचिनिये ह्रीं ह्रीं फट स्वाहा

२)देवी रेणुका शबरी मंत्र-ॐ श्रीं ह्रीं क्रौं ऐं

सभी मन्त्रों के जाप से पहले कबंध शिव का नाम लेना चाहिए तथा उनका ध्यान करना चाहिए

सबसे महत्त्वपूर्ण देवी का महायंत्र होता है।जिसके बिना साधना कभी पूर्ण नहीं होती इसलिए देवी के यन्त्र को जरूर स्थापित करे व पूजन करें।

यन्त्र पूजन की विधि
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पंचोपचार पूजन करें-धूप,दीप,फल,पुष्प,जल आदि चढ़ाएं।

ॐ कबंध शिवाय नम: मम यंत्रोद्दारय-द्दारय

कहते हुये पानी के 21 बार छीटे दें व पुष्प धूप अर्पित करें

देवी को प्रसन्न करने के लिए सह्त्रनाम त्रिलोक्य कवच आदि का पाठ शुभ माना गया है

यदि आप विधिवत पूजा पाठ नहीं कर सकते तो मूल मंत्र के साथ साथ नामावली का गायन करें

छिन्नमस्ता शतनाम का गायन करने से भी देवी की कृपा आप प्राप्त कर सकते हैं

छिन्नमस्ता शतनामावली
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प्रचंडचंडिका चड़ा चंडदैत्यविनाशिनी,

चामुंडा च सुचंडा च चपला चारुदेहिनी,

ल्लजिह्वा चलदरक्ता चारुचन्द्रनिभानना,

चकोराक्षी चंडनादा चंचला च मनोन्मदा,

देवी के कुछ इच्छा पूरक मंत्र
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1) देवी छिन्नमस्ता का शत्रु नाशक मंत्र

ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं वज्र वैरोचिनिये फट

लाल रंग के वस्त्र और पुष्प देवी को अर्पित करें, नवैद्य प्रसाद,पुष्प,धूप दीप आरती आदि से पूजन करें, रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें, देवी मंदिर में बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है, काले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें, दक्षिण दिशा की ओर मुख रखें
, अखरोट व अन्य फल प्रसाद रूप में चढ़ाएं

2) देवी छिन्नमस्ता का धन प्रदाता मंत्र

ऐं श्रीं क्लीं ह्रीं वज्रवैरोचिनिये फट

गुड, नारियल, केसर, कपूर व पान देवी को अर्पित करें, शहद से हवन करें, रुद्राक्ष की माला से 7 माला का मंत्र जप करें।

3) देवी छिन्नमस्ता का प्रेम प्रदाता मंत्र

ॐ आं ह्रीं श्रीं वज्रवैरोचिनिये हुम

देवी पूजा का कलश स्थापित करें, देवी को सिन्दूर व लोंग इलायची समर्पित करें, रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें, किसी नदी के किनारे बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है, भगवे रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें, उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, खीर प्रसाद रूप में चढ़ाएं

4) देवी छिन्नमस्ता का सौभाग्य वर्धक मंत्र

ॐ श्रीं श्रीं ऐं वज्रवैरोचिनिये स्वाहा

देवी को मीठा पान व फलों का प्रसाद अर्पित करना चाहिए, रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें, किसी वृक्ष के नीचे बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है, संतरी रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें, पूर्व दिशा की ओर मुख रखें, पेठा प्रसाद रूप में चढ़ाएं

5) देवी छिन्नमस्ता का ग्रहदोष नाशक मंत्र

ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं वं वज्रवैरोचिनिये हुम

देवी को पंचामृत व पुष्प अर्पित करें, रुद्राक्ष की माला से 4 माला का मंत्र जप करें, मंदिर के गुम्बद के नीचे या प्राण प्रतिष्ठित मूर्ती के निकट बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है। पीले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें, उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, नारियल व तरबूज प्रसाद रूप में चढ़ाएं,

देवी की पूजा में सावधानियां व निषेध कार्य
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बिना “कबंध शिव” की पूजा के महाविद्या छिन्नमस्ता की साधना न करें, सन्यासियों व साधू संतों की निंदा बिलकुल न करें, साधना के दौरान अपने भोजन आदि में हींग व काली मिर्च का प्रयोग न करें, देवी भक्त ध्यान व योग के समय भूमि पर बिना आसन कदापि न बैठें, सरसों के तेल का दीया न जलाएं

विशेष गुरु दीक्षा
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महाविद्या छिन्नमस्ता की अनुकम्पा पाने के लिए अपने गुरु से आप दीक्षा जरूर लें आप निम्न में से कोई भी एक दीक्षा ले सकते हैं।

छिन्नमस्ता दीक्षा, वज्र वैरोचिनी दीक्षा, रेणुका शबरी दीक्षा, वज्र दीक्षा, पञ्च नाडी दीक्षा, सिद्ध खेचरी दीक्षा, छिन्न्शिर: दीक्षा, त्रिकाल दीक्षा, कालज्ञान दीक्षा, कुण्डलिनी दीक्षा आदि।

श्री चिंतपूर्णी माता की आरती
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चिंतपूर्णी चिंता दूर करनी, जग को तारो भोली माँ
जन को तारो भोली माँ, काली दा पुत्र पवन दा घोड़ा || भोली माँ ||
सिन्हा पर भाई असवार, भोली माँ, चिंतपूर्णी चिंता दूर || भोली माँ ||
एक हाथ खड़ग दूजे में खांडा, तीजे त्रिशूल सम्भालो, || भोली माँ ||
चौथे हाथ चक्कर गदा, पाँचवे-छठे मुण्ड़ो की माला, || भोली माँ ||
सातवे से रुण्ड मुण्ड बिदारे, आठवे से असुर संहारो, || भोली माँ ||
चम्पे का बाग़ लगा अति सुन्दर, बैठी दीवान लगाये, || भोली माँ ||
हरी ब्रम्हा तेरे भवन विराजे, लाल चंदोया बैठी तान, || भोली माँ ||
औखी घाटी विकटा पैंडा, तले बहे दरिया, || भोली माँ ||
सुमन चरण ध्यानु जस गावे, भक्तां दी पज निभाओ || भोली माँ ||

शुभम भवतु

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6 thoughts on “Maa Chinnmasta”

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