Kundalini Mahashakti 1 August 2020

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कुँडलिनी महाशक्ति अंधविश्वास नहीं…….
जैन आचार्यों ने कुँडलिनी शक्ति का उल्लेख तेजोलेश्या के रूप में किया। आचार्यश्री महाप्राज्ञ के अनुसार यह शक्ति सूर्य के प्रतिनिधि की तरह मनुष्य के काय कलेवर में विद्यमान रहती है। ब्रह्माँड में सूर्य जितना प्रचंड, ऊर्जावान् और अग्नि से भरा हुआ है, अंतर्जगत् का सूर्य भी अपने स्वरूप और स्थिति के अनुसार उतना ही प्रदीप्त है।

उन्नीसवीं शताब्दी में हुए एक प्रसिद्ध समाज सुधारक संत ने कुँडलिनी की खोज अद्भुत तरह से की। स्वभाव से ही खंडनवादी और तर्क-विवाद में गहरी रुचि रखने वाले इन संत की दृष्टि में अध्यात्म और साधना का अर्थ कतिपय मानसिक-शारीरिक अभ्यास ही था। अध्यात्म क्षेत्र को इन अभ्यासों तक ही सीमित मान लें तो उसका विस्तार बीस प्रतिशत ही रह जाता है। बाकी अस्सी प्रतिशत स्वरूप नकारना पड़ता है। यह स्वरूप स्थूल साधनाओं के अभ्यासों के बाद अंतर्जगत् में उतरने के साथ शुरू होता है। अस्सी प्रतिशत इस भाग को रहस्य और गुह्य लोक भी कह सकते हैं। कुँडलिनी भी इसी लोक से संबंधित है। उन संत महापुरुष के अनुसार रहस्य या गुह्य विद्या जैसी कोई चीज होती ही नहीं है। अगर इस तरह का दावा किया जाता है, तो वह पाखंड और अविद्या के सिवा कुछ नहीं है।

योग, आध्यात्मिक तंत्र और रहस्यवाद के नाम पर निश्चित ही जालसाजियाँ हुई हैं, लोगों को बेवकूफ बनाया और अपना उल्लू सीधा किया गया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि समूची गुह्य विद्याएँ ही झूठी और ठगी के लिए गढ़ी गई हैं। उन महात्मा की धारणा थी कि कुँडलिनी आदि का कोई अस्तित्व नहीं है। यह सिद्ध करने के लिए वे गंगा तट पर गए। एकाँत स्थान में अपने शिष्यों के साथ बैठे और इस विषय पर प्रवचन करने लगे। प्रवचन करते-करते उन्होंने गंगा की धारा में बहकर आता हुआ एक मुरदा देखा। अपने एक शिष्य से कहकर उसे खींचकर किनारे पर लगाया। कहने लगे कुँडलिनी के रूप में योग की कोई महान् शक्ति यदि शरीर के मूलाधार चक्र नामक स्थान पर विद्यमान है, तो उसका अस्तित्व दिखाई देना चाहिए। किसी-न-किसी रूप में तो वह मौजूद होगी। इतना कहकर स्वामी जी ने चाकू से मूलाधार चक्र वाला स्थान चीरा और शिष्यों को बताया, देखिए यहाँ कोई कुँडलिनी नहीं है।

बहुत लोगों की मान्यता है कि कुँडलिनी क्योंकि दिखाई नहीं देती, अतः उसका अस्तित्व नहीं है। इनमें आत्मिक दृष्टि से बड़ी ऊँचाई तक गए संत-महात्मा भी शामिल हैं। उनकी इस आध्यात्मिक स्थिति पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता, लेकिन उनकी अपनी प्रतीति नहीं है। वे इसे स्थूल रूप में देखना चाहते हैं, इसलिए कुँडलिनी के अस्तित्व से इनकार करते हैं, यह दृष्टिकोण गलत है।

परमात्मा की शक्ति का अनुभव विभिन्न लोगों को विभिन्न रूपों में होता है। जरूरी नहीं कि दो सिद्ध संतों को एक ही रूप में हो। यह अनुभूति इतनी भिन्न भी होती है कि दोनों के अनुयायी मिलें तो एक-दूसरे के इष्ट अभीष्ट को गलत ठहराने लगें। ईसा के अनुयायियों को नृत्य करते और मुरली बजाते श्रीकृष्ण गलत प्रतीक लग सकते हैं। बहुत से आलोचकों को श्रीकृष्ण का नटवर नागर रूप विलासी लोगों के मन की उपज ही लगता है, क्योंकि इस बहाने वे अपने मन की कुत्साओं पर आवरण डाल सकते हैं। मुहम्मद साहब के अनुयायियों को ईसा का उपदेश धर्म विरोधी ला सकता है कि अपने शत्रु को क्षमा कर दो। यह उपदेश तब धर्म विरुद्ध ही होगा कि कोई तुम्हारे बायें गाल पर थप्पड़ मारे, तो दायाँ भी उसके आगे कर दो।

मुहम्मद साहब का धर्म तलवार का धर्म है और वह पापियों के प्रति …. को एक सीमा के बाद कमजोरी मानता है। कबीर के लिए तुलसी के राम ‘मन का भरम’ है, क्योंकि उनकी अनुभूति के अनुसार परमात्मा का सगुण साकार रूप है ही नहीं है। वह गुण और आकार से परे हैं, सीमा से भी परे। तुलसी के लिए धनुर्धारी राम परब्रह्म का ही स्वरूप हैं। आध्यात्मिक अनुभूतियों का स्वरूप व्यक्ति, स्वभाव और अंतस् की स्थिति के अनुसार अलग-अलग होता है। एक अनुभव के आधार पर दूसरे को गलत नहीं ठहराया जा सकता।

कुँडलिनी शक्ति को भ्रम, भटकाव और ठगी का आधा बताने वालों के मन में इस विद्या के दुरुपयोग से जन्मा …. ही मुख्य रहा होगा। मध्यकाल से बीसवीं सदी तक गुह्य विद्याओं का जैसा दुरुपयोग हुआ, उसका एक शिकार कुँडलिनी शक्ति भी रही। अब भी लोग इसे आनन-फानन में जगा देने और देखते-ही-देखते महान् योगी बना देने का आश्वासन बाँटते घूमते हैं। इस तरह के दुरुपयोग या बाजारवाद से सावधान रहना चाहिए। यह मानकर चलना चाहिए कि कुँडलिनी ऊर्जा का विराट् सागर है, तो इसे घड़े में पानी भरने की तरह समेटा नहीं जा सकता, न ही अधिकार जताया जा सकता है।

कुँडलिनी के विषय में फैली दोनों तरह की भ्राँतियों का निराकरण होना चाहिए। वह न तो पाखंड, छलावा और कोरा रहस्यवाद है, न ही हाथ मिलाकर, सिर थपथपाकर किया जा सकने वाला शक्ति का विस्फोट। योग शास्त्रों और गुह्य विद्याओं के आधुनिक वैज्ञानिकों ने शरीर में जहाँ कुँडलिनी का वास बताया है, वह एक प्रतीक मात्र है। योग ग्रंथों और उपनिषदों में शरीर विज्ञान का जैसा चित्रण किया गया, वह सूक्ष्मशरीर का वर्णन है। स्थूलशरीर और उसके अंगों से तालमेल नहीं बिठाना चाहिए। उदाहरण के लिए, योग ग्रंथों में हृदय को सीने में उस स्थान पर बताया गया है, जहाँ छाती की अस्थियाँ मिलती हैं और उनके मिलन स्थल पर एक …. है, योगियों और रहस्यदर्शियों के अनुसार यह केंद्र समस्त भाव संवेदनाओं का केंद्र है। शरीर विज्ञान की दृष्टि से इस मान्यता में कोई दम नहीं है। हृदय सीने के भाग में स्थित एक गुब्बारे जैसा माँस पिंड है। जो शरीर में रक्त संचार और शुद्धि का कार्य करता है, उसमें भाव संवेदना जैसी कोई गतिविधि ही नहीं है।

शरीर के जिस भाग में कुँडलिनी का वास बताया गया है, उसे भी इसी उदाहरण से समझना चाहिए। कुँडलिनी और हृदय आदि ही नहीं योग ग्रंथों में वर्णित सभी केंद्रों और मर्मस्थलों को भी इसी आधार पर देखना चाहिए। सूक्ष्मशरीर और उसके अंग-अवयवों को, स्थूलशरीर के अंग-अवयवों पर आधार स्थिति की तरह नहीं मानना चाहिए। वे आधार प्रतीक और संकेत मात्र हैं।

स्थूलशरीर और अस्तित्व की परवर्ती सत्ताओं के बारे में स्पष्ट हो जाने के बाद कुँडलिनी शक्ति का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। उपनिषदों में सबसे पहले इसका उल्लेख योगाग्नि के रूप में आया है। श्वेताश्वेतर उपनिषद् में इसे योगाग्नि के रूप में निरूपित किया गया है। कठोपनिषद् में यमराज इस विद्या का उपदेश नचिकेता को देते हैं। वहाँ इसे अग्निविद्या और नाचिकेत अग्नि के रूप में बताया गया है। इसका संधान साधक के पाप-तापों को जलाकर राख कर देता है। वह अपने भीतर छाए आनंद को उद्घाटित कर लेता है। यमराज ने अग्नि विद्या का उपदेश देते हुए नचिकेता से कहा है कि यह तुम्हारे हृदय में ही निहित है। जिसके शरीर में यह अग्नि प्रज्वलित हो जाती है, उसके शरीर में न रोग होता है और न मन में क्षोभ। कहना न होगा कि अग्नि दिव्य स्तर की है। लौकिक जगत् में उपयोग की जाने वाली अग्नि से इसका संबंध प्रतीक और संकेत जैसा ही है। मनीषियों ने इसे ‘दिव्य अग्नि’ और ‘स्पिरिट फायर’ कहा है।

कुँडलिनी शक्ति को पश्चिम के तंत्रविदों ने सर्पेंट फायर और सर्पेंट पॉवर भी कहा है। यह कुँडलिनी शक्ति का ही अंग्रेजी अनुवाद है। ‘थियोसोफिकल सोसायटी’ की जननी मैडम ब्लैवटस्की कुँडलिनी को विश्वव्यापी विद्युतीय शक्ति या ‘कॉस्मिक इलेक्ट्रिसिटी’ कहा करती थी। उनके अनुसार यह ऊर्जा प्रकाश से भी तीव्र गति से बहती है। कुँडलिनी या दिव्य विद्युत की गति उन्होंने 5,55000 किलोमीटर प्रति सेकेंड बताई है, जबकि प्रकाश की गति 297000 किलोमीटर प्रति सेकेंड है। मैडम ब्लैवटस्की आज होतीं तो संभवतः कुँडलिनी शक्ति की गति को वैद्युतीय तरंगों में भी बतातीं।

जैन आचार्यों ने कुँडलिनी शक्ति का उल्लेख तेजोलेश्या के रूप में किया। आचार्यश्री महाप्राज्ञ के अनुसार यह शक्ति सूर्य के प्रतिनिधि की तरह मनुष्य के काय-कलेवर में विद्यमान रहती है। ब्रह्माँड में सूर्य जितना प्रचंड, ऊर्जावान् और अग्नि से भरा हुआ है, अंतर्जगत् का सूर्य भी अपने स्वरूप और स्थिति के अनुसार उतना ही प्रदीप्त है। तप, संयम और ध्यान-धारणा से तेजोलेश्या को प्रचंड-प्रदीप्त किया जा सकता है।

कुँडलिनी के पौराणिक और यौगिक रूपकों को साधना विज्ञान की आवश्यकता कहा जा सकता है। तथ्यों के निरूपण की यह अपनी शैली है। ऊर्जा का विराट् कुँड, सर्प, विद्युत, चक्र, नाड़ियाँ, सोई हुई सर्पिणी की फुफकार, अपनी पूँछ को मुँह में दबा और खुला रखकर मूलाधार चक्र पर लिपटी सर्पिणी, सुमेरु शिखर, अलग-अलग चक्रों की पंखुड़ियाँ, उनकी संख्या, विशिष्ट अक्षर, बीज शक्ति आदि पारिभाषिक पदों को उनके शब्दों से नहीं समझाया जा सकता। इन चक्रों के विवेचन में जाने से पहले कुँडलिनी महाशक्ति के सामान्य परिचय को ध्यान में रख लेना चाहिए।

संक्षेप में कुँडलिनी महाशक्ति विश्वव्यापी प्राण ऊर्जा या दिव्य शक्ति का वह अंग है, जो व्यक्ति की अपनी सत्ता में विद्यमान होता है। वह सक्रिय भी हो सकता है और प्रसुप्त या निष्क्रिय भी। यह ऊर्जा जिस अंश तक जाग्रत् अथवा सक्रिय रहती है, व्यक्ति उतना ही तेजस्वी, समर्थ और प्रतिभाशाली दिखाई देता है। थियोसोफिस्ट विद्वान् प्रो. हेनरी लिंडाल ने प्राण ऊर्जा को भौतिक जगत् में काम करने वाली विद्युत शक्ति के उदाहरण से समझाने की चेष्टा की है। उन्होंने लिखा है कि पृथ्वी के चारों ओर विद्युत चुँबकीय धाराओं का एक जाल-सा फैला हुआ है। तीन लाख वोल्ट से ज्यादा औसत सामर्थ्य वाले इस जाल या सागर का एक अंश प्रत्येक जीवधारी के हिस्से में आया है। यह अंश कुँडलिनी शक्ति के रूप में मेरुदंड में स्थित होता है।

मेरुदंड अर्थात् शरीर सत्ता का आधारभूत ढाँचा यदि यह नहीं हो तो शरीर लुँज-पुँज हो जाए। जीवन की सभी गतिविधियाँ ठप्प पड़ जाएँ। रेंगने वाले जीवों के अलावा सभी प्राणियों में मेरुदंड होता है। ध्यान रहे इस उल्लेख को स्थूल शरीर में पीठ के बीच रहने वाली रीढ़ की हड्डी से यथातथ्य जोड़कर न देखा जाए। वह संबंध एक अंश तक ही उपयुक्त है। प्रो. लिंडाल के अनुसार, जीवन के सामान्य क्रिया–कलापों में मानवीय विद्युत प्राण ऊर्जा अथवा दिव्य शक्ति का निरंतर व्यय होता रहता है। इस ऊर्जा का उद्गम स्रोत मस्तिष्क है। बिजलीघर की तरह इसी केन्द्र में प्राण ऊर्जा का उत्पादन, संचय और वितरण …. है, लेकिन यह केंद्र अपने आप में पूरा नहीं है। जब तक एक सूक्ष्म नाड़ी से शरीर सत्ता के निम्नतर भाग से जुड़ा होता है। यह नाड़ी सुषुम्ना कही जाती है। शरीर को काट-पीटकर इसे स्थूल आँखों से नहीं देखा जा सकता।

सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से प्राणशक्ति का संचित और सक्रिय कोष कामकेंद्र से जुड़ा होता है। मस्तिष्क में अथवा सहस्रार चक्र के इर्द-गिर्द लहराते सागर को कामकेंद्र में उठने वाले कंपन गतिशील करते रहते हैं। यों भी कह सकते हैं कि मस्तिष्क में उठने वाली तरंगें कामकेंद्र को चलित या शांत-संयमित करती रहती हैं। प्रो. लिंडाल लिखते हैं कि मस्तिष्क में स्थित केंद्र को उत्तरी ध्रुव मानें तो सुषुम्ना के आधार कामकेंद्र को उत्तरी ध्रुव कहा जा सकता है। नए जीवन की संरचना अथवा प्रजनन की …. इस केंद्र पर है। शरीर के अन्य अवयवों की …. हिस्सा ज्यादा संवेदनशील और सक्षम है। …. संवेदनशील और महत्त्वपूर्ण होने के कारण शरीर में …. सुरक्षा पर भी सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाता है। …. वस्त्रों का आविष्कार किया और इन अंगों को …. और लज्जा ही …. इस क्षेत्र की सुरक्षा भी है।

थियोसोफी आँदोलन के प्रमुख विचारक और वैज्ञानिक सी.डब्लू. लेडबीटर ने लिखा है कि ब्रह्माँडव्यापी प्राण ऊर्जा या दिव्य विद्युत को मस्तिष्क में धारण करने के लिए जरूरी है कि उसे अधोगामी न होने दिया जाए। मस्तिष्क में संचित होने वाली ऊर्जा यदि काम-कौतुक में बहती रहे तो वह महाशक्ति जीवन में कभी कोई विशेषता नहीं ला सकेगी। वह शक्ति केवल कामकेंद्र से ही बरबाद नहीं होती, भोग और विलास के सभी क्षेत्रों से नष्ट होती है। जीवनचर्या में संयम और अनुशासन पर इसीलिए जोर दिया गया है।

जाग्रत स्थिति में कुँडलिनी व्यक्तित्व में ओजस् का प्राण प्रवाह उत्पन्न करती है। जाग्रत् और संचित प्राण ऊर्जा शरीर में सक्रियता और सामर्थ्य, मन में साहस, धैर्य और आत्मिक उत्कर्ष की संभावना साकार करती है। जिस व्यक्तित्व में ओजस् का प्राण प्रवाह उफनता रहता है,

       

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